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हिन्दी साहित्य में आलोकधन्वा की कविता और काव्य-व्यक्तित्व एक
अद् भुत सतत घटना, एक ‘फ़िनोमेनॅन’ की तरह हैं। वे पिछली चौथाई सदी से भी अधिक से कविताएँ लिख रहे हैं लेकिन बहुत संकोच और आत्म-संशय से उन्होंने अब यह अपना पहला संग्रह प्रकाशित करवाना स्वीकार किया है और इसमें भी रचना-स्फीति नहीं है। हिन्दी में जहाँ कई वरिष्ठ तथा युवतर कवि ज़रूरत से ज़्यादा उपजाऊ और साहिब-ए-किताब हैं, वहाँ आलोकधन्वा का यह संयम एक कठोर वग्रत या तपस्या से कम नहीं है और अपने-आप में एक काव्य-मूल्य है। दूसरी तरफ़ यह तथ्य भी हिन्दी तथा स्वयं आलोकधन्वा की आन्तरिक शक्ति का परिचायक है कि किसी संग्रह में न आने के बावजूद ‘जनता का आदमी’, ‘गोली दागो पोस्टर’, ‘भागी हुई लड़कियाँ’ और ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ सरीखी कविताएँ मुक्तिबोध, नागार्जुन, रघुवीर सहाय तथा चन्द्रकान्त देवताले की काव्य-उपस्थितियों के समान्तर हिन्दी कविता तथा उसके आस्वादकों में कालजयी-जैसी स्वीकृत हो चुकी हैं। 1970 के दशक का एक दौर ऐसा था जब आलोकधन्वा की ग़ुस्से और बग़ावत से भरी रचनाएँ अनेक कवियों और श्रोताओं को कंठस्थ थीं तथा उस समय के परिवर्तनकामी आन्दोलन की सर्जनात्मक देन मानी गई थीं। आलोकधन्वा की ऐसी कविताओं ने हिन्दी कवियों तथा कविता को कितना प्रभावित किया है, इसका मूल्यांकन अभी ठीक से हुआ नहीं है। श्रोताओं और पाठकों के मन-मस्तिष्क में प्रवेश कर उन्होंने कौन-से रूप धारण किए होंगे, यह तो पता लगा पाना भी मुश्किल है।
कवि आलोचक यदि चाहते तो अपना शेष जीवन इन बेहद प्रभावशाली तथा लोकप्रिय प्रारम्भिक रचनाओं पर काट सकते थे—कई रचनाकार इसी की खा रहे हैं—किन्तु उनकी सर्जनात्मक प्रतिभा को यह मंजूर न था तो नितान्त अप्रगल्भ तरीक़े से अपना निहायत
दिलचस्प, चौंकानेवाला और दूरगामी विकास कर रही थी। उनकी शुरुआती विस्फोटक कविताओं के केन्द्र में जो इनसानी क़दरें थीं, वे ही परिष्कृत और सम्पृक्त होती हुई उनकी ‘किसने बचाया मेरी आत्मा को’, ‘एक ज़माने की कविता’, ‘कपड़े के जूते’ तथा ‘भूखा बच्चा’ जैसी मार्मिक रचनाओं में प्रवेश कर गईं। यों तो आलोकधन्वा हिन्दी के उन कुछ कवियों में से एक हैं जिनकी काव्य-दृष्टि तथा अभिव्यक्ति हमेशा युवा रहती हैं (और इसलिए वे युवतर कवियों के आदर तथा आदर्श बने रहते हैं), किन्तु लगभग अलक्षित ढंग से उन्होंने क्रमशः ऐसी प्रौढ़ता प्राप्त की है जो सायास और ओढ़ी हुई नहीं है और बुज़ुर्गियत की मुद्रा से अलग है। विषय-वस्तु, शिल्प, शैली तथा रुझानों में एक साथ सातत्य तथा विकास, सरलता तथा जटिलता, ताज़गी और परिपक्वता देखनी हों तो ‘छतों पर लड़कियाँ’, ‘भागी हुई लड़कियाँ’ और ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ को इसी क्रम में पढ़ना दिलचस्प होगा जिनमें भारतीय किशोरियों/स्त्रियों के स्निग्ध और त्रासद जीवन-सोपान तो हैं ही, आलोकधन्वा के कवि-जीवन तथा काव्य-चेतना के अग्रसर चरण भी साफ़ नज़र आते हैं।
अभिव्यक्ति के सभी ख़तरे उठाने की मुक्तिबोध की जिस जागरूक सर्जनात्मक प्रतिज्ञा को कुछ कवियों और अधिकांश आलोचकों ने एकांगी साहसिकता की पिष्टोक्ति बना डाला है, उसे आलोकधन्वा ने उसके सभी अर्थों में सही समझकर अपनी पिछली कविताओं से परे जाने का फ़ैसला किया है। किसी कवि के लिए अभिव्यक्ति का एक सबसे बड़ा जोखिम अपनी ही पिछली छवि में आगे या अलग जाने में रहता है और वह ऐसा किसी योजना या कार्यक्रम के तहत नहीं करता, बल्कि उसके द्वारा जिया तथा देखा जा रहा जीवन तथा उस जीवन की उसकी समझ उससे वैसा करवा ले जाते हैं। जब ‘गोली दागो पोस्टर’ और ‘जनता का आदमी’ का कवि एक असहायता जो कुचलती है और एक उम्मीद जो तकलीफ़ जैसी है तथा एक ऐसे अकेलेपन, एक ऐसे तनाव जिसमें रोने की भी इच्छा हुई लेकिन रुलाई फूटी नहीं की बात करता है तो वह दैन्य या पलायन नहीं, बल्कि उस विराट मानवता की इकाई होने का ही स्वीकार है जिसके ऐसी तकलीफ़ों से गुज़रे बिना कोई बदलाव सम्भव नहीं है, क्योंकि यही एहसास इस दुनिया को फिर से बनाने की संघर्ष-भरी अभिलाषा के केन्द्र में है।
आलोकधन्वा ने शुरू नागार्जुन की परम्परा में किया था और जहाँ वे आज खड़े हैं वह नागार्जुन और शमशेर बहादुर सिंह की मिली-जुली ज़मीन लगती है जिसे उन्होंने दोनों वरिष्ठों की अलग-अलग उर्वरता से आगाह रहते हुए अपने समय और काव्य-समझ के मुताबिक़ अपने लिए तैयार किया है। आलोकधन्वा में एक वैश्विक तथा भारतीय दृष्टि तो हमेशा से थी, धीरे-धीरे वह अपने आसपास के तथा व्यापक सचराचर पर भी गई। हम कह सकते हैं कि यदि पहले वे मात्र सिंहावलोकन के कवि थे तो अब उनकी निगाह चीज़ों और ब्योरों में भी जाती है और उनके ज़रिए वे आदमी और व्यक्ति होने के गहरे एहसास तक पहुँचते हैं और उसे अपनी कविता में चरितार्थ करते हैं। उनके काव्य-संसार में अब इनसान और इनसानी सरोकार तो हैं ही, पेड़, पगडंडी, पतंग, पानी, रास्ते, रातें, सूर्यास्त, हवाएँ, बिकरियाँ, पक्षी, समुद्र, तारे, चाँद भी हैं। वे पगडंडी, चौक, रेल जंक्शन से निजी और सार्वजनिक दुनिया में पहुँचते हैं, थियेटर, मैटिनी शो और पहली फ़िल्म की रोशनी में स्मृतियों में जाकर अपनी संवेदना तथा सृजनशीलता के स्रोत खोजते-पाते हैं और समुद्र की आवाज़ उनके लिए किसी रहस्यमय अनादि-अनन्त की नहीं, आन्दोलन और गहराई की है। अति-मुखरता के लिए तो इसमें अवकाश ही नहीं है, आविष्ट भावातिरेक से भी वे अपनी ऐसी कविताओं में बचे हैं। आलोकधन्वा ने एक ऐसी भाषा और ऐसी तराशी हुई अभिव्यक्ति हासिल की है जिनमें सभी अतिरिक्त और अनावश्यक छीलकर अलग कर दिया गया है और तब ‘शरद की रातें/इतनी हलकी और खुली/जैसे पूरी की पूरी शामें हों सुबह तक/जैसे इन शामों की रातें होंगी/किसी और मौसम में’ या ‘समुद्र मुझे ले चला उस दोपहर में/जब पुकारना भी नहीं आता था/जब रोना ही पुकारना था’ सरीखी क्लासिकी रंगत की पंक्तियाँ प्राप्त होती हैं। यह अकारण नहीं है कि कवि मीर का ज़िक्र करता है। आलोकधन्वा ‘जो घट रहा है’ उसके कवि थे और रहेंगे लेकिन अब उसके भी प्रवक्ता हैं जिसका ‘होना’ सामान्यतः नहीं माना-पहचाना जाता। उन्हें उम्मीद है कि ‘कभी लिखेंगे कवि इसी देश में/इन्हें भी घटनाओं की तरह’ जबकि सच यह है कि वे स्वयं उस सबको घटना बनाने की क्षमता प्राप्त कर चुके हैं जो निश्चेष्ट, अमूर्त तथा अचल लगता है। चेतन में चेतना तो सभी देख लेते हैं, उसके साथ जड़ में चैतन्य को स्थापित कर पाना आलोकधन्वा जैसे अनन्य, दुस्साहसी सर्जक के बूते की ही बात है जो इस प्रक्रिया में अपनी प्रतिबद्धता को सम्पूर्ण बनाने की राह पर अग्रगामी नज़र आता है।
—विष्णु खरे Hindi sahitya mein aalokdhanva ki kavita aur kavya-vyaktitv ekAd bhut satat ghatna, ek ‘finomenen’ ki tarah hain. Ve pichhli chauthai sadi se bhi adhik se kavitayen likh rahe hain lekin bahut sankoch aur aatm-sanshay se unhonne ab ye apna pahla sangrah prkashit karvana svikar kiya hai aur ismen bhi rachna-sphiti nahin hai. Hindi mein jahan kai varishth tatha yuvtar kavi zarurat se zyada upjau aur sahib-e-kitab hain, vahan aalokdhanva ka ye sanyam ek kathor vagrat ya tapasya se kam nahin hai aur apne-ap mein ek kavya-mulya hai. Dusri taraf ye tathya bhi hindi tatha svayan aalokdhanva ki aantrik shakti ka parichayak hai ki kisi sangrah mein na aane ke bavjud ‘janta ka aadmi’, ‘goli dago postar’, ‘bhagi hui ladakiyan’ aur ‘bruno ki betiyan’ sarikhi kavitayen muktibodh, nagarjun, raghuvir sahay tatha chandrkant devtale ki kavya-upasthitiyon ke samantar hindi kavita tatha uske aasvadkon mein kalajyi-jaisi svikrit ho chuki hain. 1970 ke dashak ka ek daur aisa tha jab aalokdhanva ki gusse aur bagavat se bhari rachnayen anek kaviyon aur shrotaon ko kanthasth thin tatha us samay ke parivartankami aandolan ki sarjnatmak den mani gai thin. Aalokdhanva ki aisi kavitaon ne hindi kaviyon tatha kavita ko kitna prbhavit kiya hai, iska mulyankan abhi thik se hua nahin hai. Shrotaon aur pathkon ke man-mastishk mein prvesh kar unhonne kaun-se rup dharan kiye honge, ye to pata laga pana bhi mushkil hai.
Kavi aalochak yadi chahte to apna shesh jivan in behad prbhavshali tatha lokapriy prarambhik rachnaon par kaat sakte the—kai rachnakar isi ki kha rahe hain—kintu unki sarjnatmak pratibha ko ye manjur na tha to nitant aprgalbh tariqe se apna nihayat
Dilchasp, chaunkanevala aur durgami vikas kar rahi thi. Unki shuruati visphotak kavitaon ke kendr mein jo insani qadren thin, ve hi parishkrit aur samprikt hoti hui unki ‘kisne bachaya meri aatma ko’, ‘ek zamane ki kavita’, ‘kapde ke jute’ tatha ‘bhukha bachcha’ jaisi marmik rachnaon mein prvesh kar gain. Yon to aalokdhanva hindi ke un kuchh kaviyon mein se ek hain jinki kavya-drishti tatha abhivyakti hamesha yuva rahti hain (aur isaliye ve yuvtar kaviyon ke aadar tatha aadarsh bane rahte hain), kintu lagbhag alakshit dhang se unhonne krmashः aisi praudhta prapt ki hai jo sayas aur odhi hui nahin hai aur buzurgiyat ki mudra se alag hai. Vishay-vastu, shilp, shaili tatha rujhanon mein ek saath satatya tatha vikas, saralta tatha jatilta, tazgi aur paripakvta dekhni hon to ‘chhaton par ladakiyan’, ‘bhagi hui ladakiyan’ aur ‘bruno ki betiyan’ ko isi kram mein padhna dilchasp hoga jinmen bhartiy kishoriyon/striyon ke snigdh aur trasad jivan-sopan to hain hi, aalokdhanva ke kavi-jivan tatha kavya-chetna ke agrsar charan bhi saaf nazar aate hain.
Abhivyakti ke sabhi khatre uthane ki muktibodh ki jis jagruk sarjnatmak prtigya ko kuchh kaviyon aur adhikansh aalochkon ne ekangi sahasikta ki pishtokti bana dala hai, use aalokdhanva ne uske sabhi arthon mein sahi samajhkar apni pichhli kavitaon se pare jane ka faisla kiya hai. Kisi kavi ke liye abhivyakti ka ek sabse bada jokhim apni hi pichhli chhavi mein aage ya alag jane mein rahta hai aur vah aisa kisi yojna ya karyakram ke tahat nahin karta, balki uske dvara jiya tatha dekha ja raha jivan tatha us jivan ki uski samajh usse vaisa karva le jate hain. Jab ‘goli dago postar’ aur ‘janta ka aadmi’ ka kavi ek ashayta jo kuchalti hai aur ek ummid jo taklif jaisi hai tatha ek aise akelepan, ek aise tanav jismen rone ki bhi ichchha hui lekin rulai phuti nahin ki baat karta hai to vah dainya ya palayan nahin, balki us virat manavta ki ikai hone ka hi svikar hai jiske aisi taklifon se guzre bina koi badlav sambhav nahin hai, kyonki yahi ehsas is duniya ko phir se banane ki sangharsh-bhari abhilasha ke kendr mein hai.
Aalokdhanva ne shuru nagarjun ki parampra mein kiya tha aur jahan ve aaj khade hain vah nagarjun aur shamsher bahadur sinh ki mili-juli zamin lagti hai jise unhonne donon varishthon ki alag-alag urvarta se aagah rahte hue apne samay aur kavya-samajh ke mutabiq apne liye taiyar kiya hai. Aalokdhanva mein ek vaishvik tatha bhartiy drishti to hamesha se thi, dhire-dhire vah apne aaspas ke tatha vyapak sachrachar par bhi gai. Hum kah sakte hain ki yadi pahle ve matr sinhavlokan ke kavi the to ab unki nigah chizon aur byoron mein bhi jati hai aur unke zariye ve aadmi aur vyakti hone ke gahre ehsas tak pahunchate hain aur use apni kavita mein charitarth karte hain. Unke kavya-sansar mein ab insan aur insani sarokar to hain hi, ped, pagdandi, patang, pani, raste, raten, suryast, havayen, bikariyan, pakshi, samudr, tare, chand bhi hain. Ve pagdandi, chauk, rel jankshan se niji aur sarvajnik duniya mein pahunchate hain, thiyetar, maitini sho aur pahli film ki roshni mein smritiyon mein jakar apni sanvedna tatha srijanshilta ke srot khojte-pate hain aur samudr ki aavaz unke liye kisi rahasymay anadi-anant ki nahin, aandolan aur gahrai ki hai. Ati-mukharta ke liye to ismen avkash hi nahin hai, aavisht bhavatirek se bhi ve apni aisi kavitaon mein bache hain. Aalokdhanva ne ek aisi bhasha aur aisi tarashi hui abhivyakti hasil ki hai jinmen sabhi atirikt aur anavashyak chhilkar alag kar diya gaya hai aur tab ‘sharad ki raten/itni halki aur khuli/jaise puri ki puri shamen hon subah tak/jaise in shamon ki raten hongi/kisi aur mausam men’ ya ‘samudr mujhe le chala us dophar men/jab pukarna bhi nahin aata tha/jab rona hi pukarna tha’ sarikhi klasiki rangat ki panktiyan prapt hoti hain. Ye akaran nahin hai ki kavi mir ka zikr karta hai. Aalokdhanva ‘jo ghat raha hai’ uske kavi the aur rahenge lekin ab uske bhi prvakta hain jiska ‘hona’ samanyatः nahin mana-pahchana jata. Unhen ummid hai ki ‘kabhi likhenge kavi isi desh men/inhen bhi ghatnaon ki tarah’ jabaki sach ye hai ki ve svayan us sabko ghatna banane ki kshamta prapt kar chuke hain jo nishchesht, amurt tatha achal lagta hai. Chetan mein chetna to sabhi dekh lete hain, uske saath jad mein chaitanya ko sthapit kar pana aalokdhanva jaise ananya, dussahsi sarjak ke bute ki hi baat hai jo is prakriya mein apni pratibaddhta ko sampurn banane ki raah par agrgami nazar aata hai.
—vishnu khare

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