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Doosari Parampra Ki Khoj

Namvar Singh

Rs. 495 Rs. 441

‘दूसरी परम्परा की खोज’ में नामवर सिंह आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के माध्यम से भारतीय संस्कृति और साहित्य की उस लोकोन्मुखी क्रान्तिकारी परम्परा को खोजने का सर्जनात्मक प्रयास करते हैं जो कबीर के विद्रोह के साथ ही सूरदास के माधुर्य और कालिदास के लालित्य से रंगारंग है। आठ अध्यायों वाली इस... Read More

Description

‘दूसरी परम्परा की खोज’ में नामवर सिंह आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के माध्यम से भारतीय संस्कृति और साहित्य की उस लोकोन्मुखी क्रान्तिकारी परम्परा को खोजने का सर्जनात्मक प्रयास करते हैं जो कबीर के विद्रोह के साथ ही सूरदास के माधुर्य और कालिदास के लालित्य से रंगारंग है।
आठ अध्यायों वाली इस पुस्तक के प्रत्येक अध्याय का प्रस्थान-बिन्दु आचार्य द्विवेदी की कोई-न-कोई कृति है, किन्तु यह पुस्तक उन कृतियों की व्याख्या मात्र नहीं है और न उनके मूल्यांकन का प्रयास है बल्कि उनके माध्यम से उस मौलिक इतिहास-दृष्टि के उन्मेष को पकड़ने की कोशिश की गई है जिसके आलोक में समूची परम्परा एक नए अर्थ के साथ उद्भासित हो उठती है।
‘दूसरी परम्परा की खोज’ से एक ऐसा व्यक्तित्व उभरता है जो अपनी सहजता में मोहक है, अपने संघर्ष और पराजय में भी गरिमामय है और अपनी मानव-आस्था में परम्परा के सर्वोत्तम मूल्यों का साक्षात् विग्रह है—कुटज के समान साधारण होते हुए भी मनस्वी और देवदारु के समान मस्ती से झूलते हुए भी अभिजात तथा अपनी ऊँचाइयों में एकाकी। आलोचना कितनी सर्जनात्मक हो सकती है, इसका उदाहरण है—‘दूसरी परम्परा की खोज’। ‘dusri parampra ki khoj’ mein namvar sinh aacharya hajariprsad dvivedi ke madhyam se bhartiy sanskriti aur sahitya ki us lokonmukhi krantikari parampra ko khojne ka sarjnatmak pryas karte hain jo kabir ke vidroh ke saath hi surdas ke madhurya aur kalidas ke lalitya se rangarang hai. Aath adhyayon vali is pustak ke pratyek adhyay ka prasthan-bindu aacharya dvivedi ki koi-na-koi kriti hai, kintu ye pustak un kritiyon ki vyakhya matr nahin hai aur na unke mulyankan ka pryas hai balki unke madhyam se us maulik itihas-drishti ke unmesh ko pakadne ki koshish ki gai hai jiske aalok mein samuchi parampra ek ne arth ke saath udbhasit ho uthti hai.
‘dusri parampra ki khoj’ se ek aisa vyaktitv ubharta hai jo apni sahajta mein mohak hai, apne sangharsh aur parajay mein bhi garimamay hai aur apni manav-astha mein parampra ke sarvottam mulyon ka sakshat vigrah hai—kutaj ke saman sadharan hote hue bhi manasvi aur devdaru ke saman masti se jhulte hue bhi abhijat tatha apni uunchaiyon mein ekaki. Aalochna kitni sarjnatmak ho sakti hai, iska udahran hai—‘dusri parampra ki khoj’.