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Dola Bibi Ka Mazaar

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मैंने कब कहा कि मैं कहानियाँ लिखता हूँ। मैं तो बस अपने आसपास जो कुछ देखता हूँ, महसूस करता हूँ, वही लिखता हूँ। मेरे किरदार मेरी उन अनगिनत लड़ाइयों की खोज और उपज हैं, जो दशकों बिहार के गाँवों में लड़ी गई हैं, बल्कि आज भी लड़ी जा रही हैं।... Read More

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Description

मैंने कब कहा कि मैं कहानियाँ लिखता हूँ। मैं तो बस अपने आसपास जो कुछ देखता हूँ, महसूस करता हूँ, वही लिखता हूँ। मेरे किरदार मेरी उन अनगिनत लड़ाइयों की खोज और उपज हैं, जो दशकों बिहार के गाँवों में लड़ी गई हैं, बल्कि आज भी लड़ी जा रही हैं। मैंने ये भी कब कहा कि मेरे पास गाँवों के दु:खों का इलाज हैं। मैं तो बस अपने किरदारों के यातनापूर्ण सफ़रनामे का
एक अदना साक्ष्य हूँ। एक साक्ष्य, जो कभी अपने किरदारों की रूह में उतर जाता है, और कभी किरदार ही जिसके वजूद का हिस्सा बन जाते हैं। मैं तटस्थ नहीं हूँ। मैं तटस्थ कभी नहीं रहा। आगे भी मेरे तटस्थ होने की कोई गुंजाइश नहीं है। मैं ख़ुद अपनी लड़ाइयों का एक अहम हिस्सा रहा हूँ, आज भी हूँ। मेरी नज़र में, तटस्थता किसी भी संवेदनशील आदमी या समाज के लिए आत्मघाती होती है। मैंने झंडे उठाए हैं, परचम लहराए हैं, नारे बुलन्द किए हैं। जो ताक़तें सदियों राज और समाज को अपनी मर्ज़ी से चलाती रही हैं, उनकी बख़्शी हुई यातनाएँ झेली हैं। लेकिन अपनी डायरी के पन्ने स्याह
करते वक़्त मैंने, कभी भी, इन यातनाओं को बैसाखी की तरह इस्तेमाल नहीं किया है। न ही मैंने इन्हें
अपने डायरी-शिल्प का माध्यम ही बनने दिया है। अतः मैं आप से कैसे कहूँ कि इस पुस्तक में शामिल तहरीरों को आप कहानी के रूप में स्वीकारें। Mainne kab kaha ki main kahaniyan likhta hun. Main to bas apne aaspas jo kuchh dekhta hun, mahsus karta hun, vahi likhta hun. Mere kirdar meri un anaginat ladaiyon ki khoj aur upaj hain, jo dashkon bihar ke ganvon mein ladi gai hain, balki aaj bhi ladi ja rahi hain. Mainne ye bhi kab kaha ki mere paas ganvon ke du:khon ka ilaj hain. Main to bas apne kirdaron ke yatnapurn safarname kaEk adna sakshya hun. Ek sakshya, jo kabhi apne kirdaron ki ruh mein utar jata hai, aur kabhi kirdar hi jiske vajud ka hissa ban jate hain. Main tatasth nahin hun. Main tatasth kabhi nahin raha. Aage bhi mere tatasth hone ki koi gunjaish nahin hai. Main khud apni ladaiyon ka ek aham hissa raha hun, aaj bhi hun. Meri nazar mein, tatasthta kisi bhi sanvedanshil aadmi ya samaj ke liye aatmghati hoti hai. Mainne jhande uthaye hain, parcham lahraye hain, nare buland kiye hain. Jo taqten sadiyon raaj aur samaj ko apni marzi se chalati rahi hain, unki bakhshi hui yatnayen jheli hain. Lekin apni dayri ke panne syah
Karte vaqt mainne, kabhi bhi, in yatnaon ko baisakhi ki tarah istemal nahin kiya hai. Na hi mainne inhen
Apne dayri-shilp ka madhyam hi banne diya hai. Atः main aap se kaise kahun ki is pustak mein shamil tahriron ko aap kahani ke rup mein svikaren.