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Dastangoi - 2

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महमूद फ़ारूक़ी, अनुषा रिजवी और उनके मुटूठी-भर साथियों ने दुनिया को दिखा दिया कि दास्तान अब भी ज़‍िन्दा है, या ज़‍िन्दा की जा सकती है। लेकिन उसके लिए दो चीज़ों की ज़रूरत थी; एक तो कोई ऐसा शख़्स जो दास्तान को बख़ूबी जानता हो और उससे मोहब्बत करता हो। ऐसा... Read More

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Description

महमूद फ़ारूक़ी, अनुषा रिजवी और उनके मुटूठी-भर साथियों ने दुनिया को दिखा दिया कि दास्तान अब भी ज़‍िन्दा है, या ज़‍िन्दा की जा सकती है। लेकिन उसके लिए दो चीज़ों की ज़रूरत थी; एक तो कोई ऐसा शख़्स जो दास्तान को बख़ूबी जानता हो और उससे मोहब्बत करता हो। ऐसा शख़्स आज बिलकुल मादूम नहीं तो बहुत ही कामयाब ज़रूर है। दूसरी चीज़ जो अहिया-ए-दास्तान के लिए लाजिम थी, वह था ऐसा शख़्स जो उर्दू ख़ूब जानता हो, फ़ारसी बकदरे-ज़रूरत जानता हो, और उसे अदाकारी में भी ख़ूब दर्क हो, यानी उसे बयानिया और मकालमा को ड्रामाई तीर पर अदा करने पर कुदरत हो। उसे उर्दू अदब की, दास्तान की, और ख़ास कर के हमारी ख़ुशनसीबी तसव्वुर करना चाहिए कि दास्तानगोई के दुबारा जन्म की दास्तान के लिए नागुज़‍िर मोतज़क्किरह वाला किरदार एक वक़्त में और एक जगह जमा हो गए। महमूद फ़ारूक़ी और मोहम्मद काजिम अपनी कही हुई दास्तानों पर मुश्तमिल एक और किताब बाज़ार में ला रहे हैं तो दास्तानगोई का एक जदीद रूप भी सामने आ चुका है।
–शम्मुर्रहमान फ़ारूकी
वक़्त का तक़ाज़ा था कि अमीर हमज़ा के मिज़ाज के अलावा और भी तरह की दास्तानें लोगों को सुनाई जाएँ। इसकी शुरुआत तो 2007 में ही हो गई थी जब मैं और अनुषा ने मिलकर तक़सीम-ए-हिन्द पे एक दास्तान मुरत्तब की थी जो पहली जिल्द में शामिल है। अमीर हमज़ा की दास्तानों का जादू हमेशा सर चढ़कर बोला है और आगे भी बोलता रहेगा। मगर आज के ज़माने में उन दास्तानों के अलावा भी बहुत से ऐसे अफ़साने हैं जो सुनाए जाने का तक़ाज़ा करते हैं। इसलिए रवायती दास्तानों को इख़्तियार करने के साथ-साथ मैंने और ऐसी चीज़ें तशकील दी हैं जिन्हें दास्तानजादियाँ कहें तो नामुनासिब ना होगा। ये दास्तानजादियाँ बिलवासता हमारे अहद को और दीगर सच्चाइयों और पहलुओं पर रोशनी डालती हैं जिन्हें हमारे सामईन और नाज़‍िरीन बेतकल्लुफ़ समझ सकते हैं।
–महमूद फ़ारूकी Mahmud faruqi, anusha rijvi aur unke mututhi-bhar sathiyon ne duniya ko dikha diya ki dastan ab bhi za‍inda hai, ya za‍inda ki ja sakti hai. Lekin uske liye do chizon ki zarurat thi; ek to koi aisa shakhs jo dastan ko bakhubi janta ho aur usse mohabbat karta ho. Aisa shakhs aaj bilkul madum nahin to bahut hi kamyab zarur hai. Dusri chiz jo ahiya-e-dastan ke liye lajim thi, vah tha aisa shakhs jo urdu khub janta ho, farsi bakadre-zarurat janta ho, aur use adakari mein bhi khub dark ho, yani use bayaniya aur makalma ko dramai tir par ada karne par kudrat ho. Use urdu adab ki, dastan ki, aur khas kar ke hamari khushansibi tasavvur karna chahiye ki dastangoi ke dubara janm ki dastan ke liye naguz‍ir motzakkirah vala kirdar ek vakt mein aur ek jagah jama ho ge. Mahmud faruqi aur mohammad kajim apni kahi hui dastanon par mushtmil ek aur kitab bazar mein la rahe hain to dastangoi ka ek jadid rup bhi samne aa chuka hai. –shammurrahman faruki
Vakt ka taqaza tha ki amir hamza ke mizaj ke alava aur bhi tarah ki dastanen logon ko sunai jayen. Iski shuruat to 2007 mein hi ho gai thi jab main aur anusha ne milkar taqsim-e-hind pe ek dastan murattab ki thi jo pahli jild mein shamil hai. Amir hamza ki dastanon ka jadu hamesha sar chadhkar bola hai aur aage bhi bolta rahega. Magar aaj ke zamane mein un dastanon ke alava bhi bahut se aise afsane hain jo sunaye jane ka taqaza karte hain. Isaliye ravayti dastanon ko ikhtiyar karne ke sath-sath mainne aur aisi chizen tashkil di hain jinhen dastanjadiyan kahen to namunasib na hoga. Ye dastanjadiyan bilvasta hamare ahad ko aur digar sachchaiyon aur pahaluon par roshni dalti hain jinhen hamare samiin aur naz‍irin betkalluf samajh sakte hain.
–mahmud faruki