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Dakhil Kharij

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गाँव की टूटती-बिखरती सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में छीजते जा रहे मानवीय मूल्यों को कथान्वित करनेवाला यह उपन्यास ‘दाखिल खारिज’ रामधारी सिंह दिवाकर की चर्चित कथाकृति है। अपने छूटे हुए गाँव के लिए कुछ करने के सपनों और संकल्पों के साथ प्रोफ़ेसर प्रमोद सिंह का गाँव लौटना और बेरहमी से उनको ख़ारिज... Read More

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Description

गाँव की टूटती-बिखरती सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में छीजते जा रहे मानवीय मूल्यों को कथान्वित करनेवाला यह उपन्यास ‘दाखिल खारिज’ रामधारी सिंह दिवाकर की चर्चित कथाकृति है।
अपने छूटे हुए गाँव के लिए कुछ करने के सपनों और संकल्पों के साथ प्रोफ़ेसर प्रमोद सिंह का गाँव लौटना और बेरहमी से उनको ख़ारिज किया जाना आज के बदलते हुए गाँव का निर्मम यथार्थ है। यह कैसा गाँव है जहाँ बलात्कार मामूली-सी घटना है। हत्यारे, दुराचारी, बलात्कारी और बाहुबली लोकतांत्रिक व्यवस्था और सरकारी तंत्र को अपने हिसाब से संचालित करते हैं। सुराज के मायावी सपनों की पंचायती राज-व्यवस्था में पंचायतों को प्रदत्त अधिकार धन की लूट के स्रोत बन जाते हैं। सीमान्त किसान खेती छोड़ 'मनरेगा' में मज़दूरी को बेहतर विकल्प मानते हैं। ऐसे विकृत-विखंडित होते गाँव की पीड़ा को ग्रामीण चेतना के कथाशिल्पी रामधारी सिंह दिवाकर ने पूरी संलग्नता और गहरी संवेदना से उकेरने का प्रयास किया है। हिन्दी कथा साहित्य से लगभग बहिष्कृत होते गाँव को विषय बनाकर लिखे गए इस सशक्त उपन्यास को 'कथा में गाँव के पुनर्वास' के रूप में देखा-परखा और उल्‍लेखि‍त किया जाता है। Ganv ki tutti-bikharti samajik-arthik vyvastha mein chhijte ja rahe manviy mulyon ko kathanvit karnevala ye upanyas ‘dakhil kharij’ ramdhari sinh divakar ki charchit kathakriti hai. Apne chhute hue ganv ke liye kuchh karne ke sapnon aur sankalpon ke saath profesar prmod sinh ka ganv lautna aur berahmi se unko kharij kiya jana aaj ke badalte hue ganv ka nirmam yatharth hai. Ye kaisa ganv hai jahan balatkar mamuli-si ghatna hai. Hatyare, durachari, balatkari aur bahubli loktantrik vyvastha aur sarkari tantr ko apne hisab se sanchalit karte hain. Suraj ke mayavi sapnon ki panchayti raj-vyvastha mein panchayton ko prdatt adhikar dhan ki lut ke srot ban jate hain. Simant kisan kheti chhod manrega mein mazduri ko behtar vikalp mante hain. Aise vikrit-vikhandit hote ganv ki pida ko gramin chetna ke kathashilpi ramdhari sinh divakar ne puri sanlagnta aur gahri sanvedna se ukerne ka pryas kiya hai. Hindi katha sahitya se lagbhag bahishkrit hote ganv ko vishay banakar likhe ge is sashakt upanyas ko katha mein ganv ke punarvas ke rup mein dekha-parkha aur ul‍lekhi‍ta kiya jata hai.