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Praveen Kumar Jha

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Vani Prakashan

हिन्द महासागर के रियूनियन द्वीप की ओर 1826 ई. में मज़दूरों से भरा जहाज़ बढ़ रहा था। यह शुरुआत थी भारत की। जड़ों से लाखों भारतीयों को अलग करने की। क्या एक विशाल साम्राज्य के लालच और हिन्दुस्तानी बिदेसियों के संघर्ष की यह गाथा भुला दी जायेगी? एक सामन्तवादी भारत... Read More

Description

हिन्द महासागर के रियूनियन द्वीप की ओर 1826 ई. में मज़दूरों से भरा जहाज़ बढ़ रहा था। यह शुरुआत थी भारत की। जड़ों से लाखों भारतीयों को अलग करने की। क्या एक विशाल साम्राज्य के लालच और हिन्दुस्तानी बिदेसियों के संघर्ष की यह गाथा भुला दी जायेगी? एक सामन्तवादी भारत से अनजान द्वीपों पर गये ये अँगूठा-छाप लोग आख़िर किस तरह जी पायेंगे? उनकी पीढ़ियों से। हिन्दुस्तानियत ख़त्म तो नहीं हो जायेगी? लेखक पुराने आर्काइवों, भिन्न भाषाओं में लिखे रिपोर्ताज़ों और गिरमिट वंशजों से यह तफ़्तीश करने निकलते हैं। उन्हें षड्यन्त्र और यातनाओं के मध्य खड़ा होता एक ऐसा भारत नज़र आने लगता है, जिसमें मुख्य भूमि की वर्तमान समस्याओं के कई सूत्र हैं। मॉरीशस से कनाडा तक की फ़ाइलों में ऐसे कई राज़ दबे हैं, जो ब्रिटिश सरकार पर ग़ैर-अदालती सवाल उठाते हैं। और इस ज़िम्मेदारी का अहसास भी कि दक्षिण अमरीका के एक गाँव में भी वही भोजन पकता है, जो बस्ती के एक गाँव में। ‘ग्रेट इंडियन डायस्पोरा' आख़िर एक परिवार है, यह स्मरण रहे। इस किताब की यही कोशिश है। hind mahasagar ke riyuniyan dveep ki or 1826 ii. mein mazduron se bhara jahaz baDh raha tha. ye shuruat thi bharat ki. jaDon se lakhon bhartiyon ko alag karne ki. kya ek vishal samrajya ke lalach aur hindustani bidesiyon ke sangharsh ki ye gatha bhula di jayegi? ek samantvadi bharat se anjan dvipon par gaye ye angutha chhaap log akhir kis tarah ji payenge? unki piDhiyon se. hindustaniyat khatm to nahin ho jayegi? lekhak purane arkaivon, bhinn bhashaon mein likhe riportazon aur girmit vanshjon se ye taftish karne nikalte hain. unhen shaDyantr aur yatnaon ke madhya khaDa hota ek aisa bharat nazar aane lagta hai, jismen mukhya bhumi ki vartman samasyaon ke kai sootr hain. maurishas se kanaDa tak ki failon mein aise kai raaz dabe hain, jo british sarkar par ghair adalti saval uthate hain. aur is zimmedari ka ahsas bhi ki dakshin amrika ke ek gaanv mein bhi vahi bhojan pakta hai, jo basti ke ek gaanv mein. ‘gret inDiyan Dayaspora akhir ek parivar hai, ye smran rahe. is kitab ki yahi koshish hai.