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Chittakobara

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जो लिखा है, उसे उपन्यास कहते मुझे संकोच हो रहा है। जिस तरह यह लिखा गया, याद करके हँसी आती है। एक कहानी थी जो मेरे अन्तर्मन में फैलती-सिकुड़ती रहती थी। फिर एक दिन उस कहानी के अन्तराल का एक-एक क्षण अपनी कड़ी से टूटकर बिखर गया। मैंने आँखें फैलाकर... Read More

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Description

जो लिखा है, उसे उपन्यास कहते मुझे संकोच हो रहा है। जिस तरह यह लिखा गया, याद करके हँसी आती है। एक कहानी थी जो मेरे अन्तर्मन में फैलती-सिकुड़ती रहती थी। फिर एक दिन उस कहानी के अन्तराल का एक-एक क्षण अपनी कड़ी से टूटकर बिखर गया। मैंने आँखें फैलाकर देखा तो दीखा, हर क्षण अलग से फैल रहा है और पूरी एक कहानी का आभास दे रहा है। यह सच है कि मैंने उन अलग-अलग क्षणों को लिखने की प्रक्रिया में अलग-अलग जिया है...आखिर मैं थक गई। लिखे हुए पन्नों को एक जगह इकट्ठा किया और यह बात मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय है कि पूरी पुस्तक में एक अन्तर्धारा बहती हुई दीखती है और एकसूत्रता भी आसानी से पकड़ में आती है। इस उपन्यास में परिच्छेद नहीं हैं। मैं जानती हूँ, जीवन की इतनी प्रवहमान धारा को टुकड़ों में नहीं काटा जा सकता। अन्दर के दबाव के कारण ही शायद यह हो सका है कि क्षणों में जी और लिखी गई इस कहानी के टुकड़ों का क्रम भी बाद में तय हुआ। दरअसल, बहती नदी से किसी किनारे खड़े होकर पानी पियो - क्या फर्क पड़ता है! क्रम-निर्धारण का पूर्वग्रह तो कहानी गढ़ने में होता है; जो कहानी है, वह तो...कोई कहीं से भी साथ हो ले... - इसी पुस्तक से Jo likha hai, use upanyas kahte mujhe sankoch ho raha hai. Jis tarah ye likha gaya, yaad karke hansi aati hai. Ek kahani thi jo mere antarman mein phailti-sikudti rahti thi. Phir ek din us kahani ke antral ka ek-ek kshan apni kadi se tutkar bikhar gaya. Mainne aankhen phailakar dekha to dikha, har kshan alag se phail raha hai aur puri ek kahani ka aabhas de raha hai. Ye sach hai ki mainne un alag-alag kshnon ko likhne ki prakriya mein alag-alag jiya hai. . . Aakhir main thak gai. Likhe hue pannon ko ek jagah ikattha kiya aur ye baat mere liye sukhad aashcharya ka vishay hai ki puri pustak mein ek antardhara bahti hui dikhti hai aur eksutrta bhi aasani se pakad mein aati hai. Is upanyas mein parichchhed nahin hain. Main janti hun, jivan ki itni pravahman dhara ko tukdon mein nahin kata ja sakta. Andar ke dabav ke karan hi shayad ye ho saka hai ki kshnon mein ji aur likhi gai is kahani ke tukdon ka kram bhi baad mein tay hua. Darasal, bahti nadi se kisi kinare khade hokar pani piyo - kya phark padta hai! kram-nirdharan ka purvagrah to kahani gadhne mein hota hai; jo kahani hai, vah to. . . Koi kahin se bhi saath ho le. . . - isi pustak se