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Chirag-E-Dair

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मिर्ज़ा ग़ालिब की बनारस-यात्रा मशहूर है। उन्होंने फ़ारसी में, जो उनकी प्रिय काव्यभाषा थी, एक मसनवी ‘चिराग़-ए-दैर' नाम से लिखी थी। यों तो बनारस सदियों से एक पुण्य-नगरी है और उसकी स्तुति में बहुत कुछ इस दौरान लिखा गया है। ग़ालिब की मसनवी उस परम्परा में होते हुए भी अनोखी... Read More

Description

मिर्ज़ा ग़ालिब की बनारस-यात्रा मशहूर है। उन्होंने फ़ारसी में, जो उनकी प्रिय काव्यभाषा थी, एक मसनवी ‘चिराग़-ए-दैर' नाम से लिखी थी। यों तो बनारस सदियों से एक पुण्य-नगरी है और उसकी स्तुति में बहुत कुछ इस दौरान लिखा गया है। ग़ालिब की मसनवी उस परम्परा में होते हुए भी अनोखी है जो एक महान कवि की एक महान तीर्थ की यात्रा को सच्चे और सशक्त काव्य में रूपायित करती है। एक ऐसे समय में जब हिन्दू और इस्लाम धर्मों के बीच दूरी बढ़ाने की अनेक प्रबल और निर्लज्ज दुश्चेष्टाएँ हो रही हैं, इस मसनवी का हिन्दी अनुवाद एक तरह की याददहानी का काम करता है कि यह दूरी कितनी बहुत पहले पट चुकी थी।
—अशोक वाजपेयी। Mirza galib ki banaras-yatra mashhur hai. Unhonne farsi mein, jo unki priy kavybhasha thi, ek masanvi ‘chirag-e-dair naam se likhi thi. Yon to banaras sadiyon se ek punya-nagri hai aur uski stuti mein bahut kuchh is dauran likha gaya hai. Galib ki masanvi us parampra mein hote hue bhi anokhi hai jo ek mahan kavi ki ek mahan tirth ki yatra ko sachche aur sashakt kavya mein rupayit karti hai. Ek aise samay mein jab hindu aur islam dharmon ke bich duri badhane ki anek prbal aur nirlajj dushcheshtayen ho rahi hain, is masanvi ka hindi anuvad ek tarah ki yadadhani ka kaam karta hai ki ye duri kitni bahut pahle pat chuki thi. —ashok vajpeyi.

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