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Chanakya

Bhagwaticharan Verma

Rs. 350 Rs. 312

Rajkamal Prakashan

चाणक्य सुविख्यात उपन्यासकार भगवतीचरण वर्मा की अन्तिम कथाकृति है। मगध-सम्राट् महापद्म नन्द और उसके पुत्रों द्वारा प्रजा पर जो अत्याचार किए जा रहे थे, राज्यसभा में आचार्य विष्णुगुप्त ने उनकी कड़ी आलोचना की; फलस्वरूप नन्द के हाथों उन्हें अपमानित होना पड़ा। विष्णुगुप्त का यही अपमान अन्ततः उस महाभियान का आरम्भ... Read More

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Description

चाणक्य सुविख्यात उपन्यासकार भगवतीचरण वर्मा की अन्तिम कथाकृति है। मगध-सम्राट् महापद्म नन्द और उसके पुत्रों द्वारा प्रजा पर जो अत्याचार किए जा रहे थे, राज्यसभा में आचार्य विष्णुगुप्त ने उनकी कड़ी आलोचना की; फलस्वरूप नन्द के हाथों उन्हें अपमानित होना पड़ा। विष्णुगुप्त का यही अपमान अन्ततः उस महाभियान का आरम्भ सिद्ध हुआ, जिससे एक ओर तो आचार्य विष्णुगुप्त ‘चाणक्य’ के नाम से विख्यात हुए और दूसरी ओर मगध-साम्राज्य को चन्द्रगुप्त-जैसा वास्तविक उत्तराधिकारी प्राप्त हुआ।
भगवती बाबू ने इस उपन्यास में इसी ऐतिहासिक कथा की परतें उघाड़ी हैं। लेकिन इस क्रम में उनकी दृष्टि एक पतनोन्मुख राज्य-व्यवस्था के वैभव-विलास और उसकी उन विकृतियों का भी उद्घाटन करती है जो उसे मूल्य-स्तर पर खोखला बनाती हैं और काल-व्यवधान से परे आज भी उसी तरह प्रासंगिक हैं।
इस उपन्यास की प्रमुख विशेषता यह भी है कि चाणक्य यहाँ पहली बार अपनी समग्रता में चित्रित हुए हैं। उनके कठोर और अभेद्य व्यक्तित्व के भीतर भगवती बाबू ने नवनीत-खंड की भी तलाश की है। अपने महान जीवन-संघर्ष में स्वाभिमानी, संकल्पशील, दूरद्रष्टा और अप्रतिम कूटनीतिज्ञ के साथ-साथ वे एक सुहृद् प्रेमी और सद्गृहस्थ के रूप में भी हमारे सामने आते हैं। निश्चय ही, ‘चित्रलेखा’ और ‘युवराज चूण्डा’ जैसे ऐतिहासिक उपन्यासों के क्रम में लेखक की यह कृति भी स्मरणीय है। Chanakya suvikhyat upanyaskar bhagavtichran varma ki antim kathakriti hai. Magadh-samrat mahapadm nand aur uske putron dvara prja par jo atyachar kiye ja rahe the, rajyasbha mein aacharya vishnugupt ne unki kadi aalochna ki; phalasvrup nand ke hathon unhen apmanit hona pada. Vishnugupt ka yahi apman antatः us mahabhiyan ka aarambh siddh hua, jisse ek or to aacharya vishnugupt ‘chanakya’ ke naam se vikhyat hue aur dusri or magadh-samrajya ko chandrgupt-jaisa vastvik uttradhikari prapt hua. Bhagavti babu ne is upanyas mein isi aitihasik katha ki parten ughadi hain. Lekin is kram mein unki drishti ek patnonmukh rajya-vyvastha ke vaibhav-vilas aur uski un vikritiyon ka bhi udghatan karti hai jo use mulya-star par khokhla banati hain aur kal-vyavdhan se pare aaj bhi usi tarah prasangik hain.
Is upanyas ki prmukh visheshta ye bhi hai ki chanakya yahan pahli baar apni samagrta mein chitrit hue hain. Unke kathor aur abhedya vyaktitv ke bhitar bhagavti babu ne navnit-khand ki bhi talash ki hai. Apne mahan jivan-sangharsh mein svabhimani, sankalpshil, duradrashta aur aprtim kutnitigya ke sath-sath ve ek suhrid premi aur sadgrihasth ke rup mein bhi hamare samne aate hain. Nishchay hi, ‘chitrlekha’ aur ‘yuvraj chunda’ jaise aitihasik upanyason ke kram mein lekhak ki ye kriti bhi smarniy hai.