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Braj Ritusanhar

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“हिन्दी की परम्परा और सर्जनात्मक वैभव का बहुत बड़ा हिस्सा ब्रज काव्य है। ब्रज काव्य में भक्ति, शृंगार और प्रकृति पर केन्द्रित कविताएँ अपनी विपुलता, विविधता और काव्य-कौशल के लिए विख्यात रही हैं। उनमें सौन्दर्य को भाषिक सौन्दर्य में रूपान्तरित करने की अद्भुत क्षमता दीख पड़ती है। लगभग सात दशकों... Read More

Description

“हिन्दी की परम्परा और सर्जनात्मक वैभव का बहुत बड़ा हिस्सा ब्रज काव्य है। ब्रज काव्य में भक्ति, शृंगार और प्रकृति पर केन्द्रित कविताएँ अपनी विपुलता, विविधता और काव्य-कौशल के लिए विख्यात रही हैं। उनमें सौन्दर्य को भाषिक सौन्दर्य में रूपान्तरित करने की अद्भुत क्षमता दीख पड़ती है। लगभग सात दशकों पहले मथुरा के एक विद्वान–रसिक श्री प्रभुदयाल मीतल ने ‘ब्रजभाषा साहित्य का ऋतु-सौन्दर्य’ नाम से प्रकृति-काव्य का एक संचयन प्रकाशित किया था जिसकी प्रस्तावना महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने लिखी थी। अपनी परम्परा के स्मृति-लोप के इस अभागे समय में इसे ‘ब्रज ऋतुसंहार’ शीर्षक से पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत ऐसे गौरवग्रन्थों को फिर से पाठकों के सामने लाने का यह एक उपक्रम है। स्मृति के पुनर्वास की एक चेष्टा।”
—अशोक वाजपेयी “hindi ki parampra aur sarjnatmak vaibhav ka bahut bada hissa braj kavya hai. Braj kavya mein bhakti, shringar aur prkriti par kendrit kavitayen apni vipulta, vividhta aur kavya-kaushal ke liye vikhyat rahi hain. Unmen saundarya ko bhashik saundarya mein rupantrit karne ki adbhut kshamta dikh padti hai. Lagbhag saat dashkon pahle mathura ke ek vidvan–rasik shri prabhudyal mital ne ‘brajbhasha sahitya ka ritu-saundarya’ naam se prkriti-kavya ka ek sanchyan prkashit kiya tha jiski prastavna mahapandit rahul sankrityayan ne likhi thi. Apni parampra ke smriti-lop ke is abhage samay mein ise ‘braj ritusanhar’ shirshak se punarprkashit kar rahe hain. Raza pustak mala ke antargat aise gaurvagranthon ko phir se pathkon ke samne lane ka ye ek upakram hai. Smriti ke punarvas ki ek cheshta. ”—ashok vajpeyi