BackBack
-11%

Bhupen Khakhkhar : Ek Antrang Sansmaran

Rs. 1,995 Rs. 1,776

भूपेन पर पहली किताब महेन्द्र देसाई ने लिखी। गाढ़े दोस्त थे भूपेन और महेन्द्र। लिखनेवाला हो महेन्द्र जैसा औघड़, और लिखा जा रहा हो भूपेन जैसे खिलन्दड़े और उसकी कला पर तो किताब असामान्य होनी ही थी। हुई। विलक्षण, मस्त, अपने विषय की आत्मा में प्रवेश करने को आतुर और,... Read More

Description

भूपेन पर पहली किताब महेन्द्र देसाई ने लिखी। गाढ़े दोस्त थे भूपेन और महेन्द्र। लिखनेवाला हो महेन्द्र जैसा औघड़, और लिखा जा रहा हो भूपेन जैसे खिलन्दड़े और उसकी कला पर तो किताब असामान्य होनी ही थी। हुई। विलक्षण, मस्त, अपने विषय की आत्मा में प्रवेश करने को आतुर और, उसी कारण, अपनी विश्वसनीयता के प्रति लापरवाह। अकारण नहीं कि इससे बिलकुल उलट संवेदना से लैस अँग्रेज़ टिमथी हाइमन ने महेन्द्र की किताब से बहुत कुछ पाने के बावजूद महेन्द्र के वर्णन को 'गार्बल्ड’ कहा। काश! मैं भी देखने, सोचने और लिखने में महेन्द्र जैसा दुस्साहस बरत पाता।
भूपेन पर दूसरी किताब है इन्हीं टिमथी हाइमन की। ब्रिटिश कलाकार, कला मर्मज्ञ और भूपेन के परम मित्र। एक पारखी की पैनी नज़र है टिमथी की किताब में। ऐसी किताब भी नहीं लिख पाऊँगा मैं।
फिर भी लिख रहा हूँ। महेन्द्र जैसा फक्कड़ी सृजनशील न सही, दुस्साहस तो है ही मेरे इस प्रयास में। दोषी दरअसल भूपेन है। अपने जीते जी देश और विदेश में होनेवाली अपनी प्रदर्शनियों के आधे दर्जन ब्रोशर मुझसे लिखवाकर बगैर कुछ कहे समझा गया कि मण्डन मिश्र के तोता-मैना शास्त्रार्थ कर सकते थे तो मैं अपने दोस्त के अन्तरंग संस्मरण तो लिख ही सकता हूँ।
23 साल की निरन्तर गहराती दोस्ती रही भूपेन के साथ। अनेक रूप देखे उसके। उन सब के बेबाक विवरण हैं यहाँ। वह भी है जो इस किताब को लिखने के दौरान जाना : कि भूपेन नितान्त विलक्षण लेखक है और उसके साहित्य के साथ न्याय नहीं हुआ है। —इसी पुस्तक से Bhupen par pahli kitab mahendr desai ne likhi. Gadhe dost the bhupen aur mahendr. Likhnevala ho mahendr jaisa aughad, aur likha ja raha ho bhupen jaise khilandde aur uski kala par to kitab asamanya honi hi thi. Hui. Vilakshan, mast, apne vishay ki aatma mein prvesh karne ko aatur aur, usi karan, apni vishvasniyta ke prati laparvah. Akaran nahin ki isse bilkul ulat sanvedna se lais angrez timthi haiman ne mahendr ki kitab se bahut kuchh pane ke bavjud mahendr ke varnan ko garbald’ kaha. Kash! main bhi dekhne, sochne aur likhne mein mahendr jaisa dussahas barat pata. Bhupen par dusri kitab hai inhin timthi haiman ki. British kalakar, kala marmagya aur bhupen ke param mitr. Ek parkhi ki paini nazar hai timthi ki kitab mein. Aisi kitab bhi nahin likh paunga main.
Phir bhi likh raha hun. Mahendr jaisa phakkdi srijanshil na sahi, dussahas to hai hi mere is pryas mein. Doshi darasal bhupen hai. Apne jite ji desh aur videsh mein honevali apni prdarshaniyon ke aadhe darjan broshar mujhse likhvakar bagair kuchh kahe samjha gaya ki mandan mishr ke tota-maina shastrarth kar sakte the to main apne dost ke antrang sansmran to likh hi sakta hun.
23 saal ki nirantar gahrati dosti rahi bhupen ke saath. Anek rup dekhe uske. Un sab ke bebak vivran hain yahan. Vah bhi hai jo is kitab ko likhne ke dauran jana : ki bhupen nitant vilakshan lekhak hai aur uske sahitya ke saath nyay nahin hua hai. —isi pustak se