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Bhartiya Kavya Shastra Ki Bhumika

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भारतीय काव्य-चिन्तन की दृष्टि कविता के स्थापत्य से जुड़ी है। काव्य-सृजन शब्दार्थ का एक अद्वैत सहयोग है और कवि अपनी प्रतिभा के संयोग से इस शब्दार्थ में चित्त को विगलित करने की सामर्थ्य उत्पन्न करता है। पश्चिम में, यदि प्लेटो तथा अरस्तू से इसका प्रारम्भ माने तो सत्रहवीं शती तक... Read More

Description

भारतीय काव्य-चिन्तन की दृष्टि कविता के स्थापत्य से जुड़ी है। काव्य-सृजन शब्दार्थ का एक अद्वैत सहयोग है और कवि अपनी प्रतिभा के संयोग से इस शब्दार्थ में चित्त को विगलित करने की सामर्थ्य उत्पन्न करता है। पश्चिम में, यदि प्लेटो तथा अरस्तू से इसका प्रारम्भ माने तो सत्रहवीं शती तक वहाँ इसका अव्यवस्थित एवं अक्रमबद्ध विवेचन मिलता है, जबकि आचार्य भरत से प्रारम्भ होकर भारतीय काव्य-चिन्तन सत्रहवीं शती तक अपने विकास के चरम शीर्ष पर पहुँच जाता है।
‘शब्दार्थ’ रचना की प्रमुख समस्याएँ—‘सर्जन का मूलाधार’ (काव्य हेतु), ‘सृजन की केन्द्रीय चेतना’ (काव्यात्मा), ‘सृजन का मूल उद्देश्य’ (काव्य प्रयोजन), ‘कवि-कर्म का वैशिष्‍ट्य’ जैसे महत्त्वपूर्ण पक्षों पर यहाँ क्रमश: चिन्तन किया गया है और सार्वभौम हल निकालने की चेष्टा की गई है। भारतीय काव्य चिन्तन की केन्द्रीय धुरी ‘शब्दार्थ’ रचना ही है क्योंकि कविता की निष्पत्ति के लिए एकमात्र और अन्तिम मूल सामग्री वही है—भारतीय काव्य-चिन्तन का समग्र विकास अर्थात् शब्द सौष्ठव से लेकर आस्वादन तक का विवेचन, इसी शब्दार्थ पर ही आधारित रहा है और प्रस्तुत कृति का सम्बन्ध भारतीय कविता-चिन्तन के इसी वैशिष्‍ट्य को इंगित करना है। Bhartiy kavya-chintan ki drishti kavita ke sthapatya se judi hai. Kavya-srijan shabdarth ka ek advait sahyog hai aur kavi apni pratibha ke sanyog se is shabdarth mein chitt ko viglit karne ki samarthya utpann karta hai. Pashchim mein, yadi pleto tatha arastu se iska prarambh mane to satrahvin shati tak vahan iska avyvasthit evan akrambaddh vivechan milta hai, jabaki aacharya bharat se prarambh hokar bhartiy kavya-chintan satrahvin shati tak apne vikas ke charam shirsh par pahunch jata hai. ‘shabdarth’ rachna ki prmukh samasyayen—‘sarjan ka muladhar’ (kavya hetu), ‘srijan ki kendriy chetna’ (kavyatma), ‘srijan ka mul uddeshya’ (kavya pryojan), ‘kavi-karm ka vaishish‍ty’ jaise mahattvpurn pakshon par yahan krmash: chintan kiya gaya hai aur sarvbhaum hal nikalne ki cheshta ki gai hai. Bhartiy kavya chintan ki kendriy dhuri ‘shabdarth’ rachna hi hai kyonki kavita ki nishpatti ke liye ekmatr aur antim mul samagri vahi hai—bhartiy kavya-chintan ka samagr vikas arthat shabd saushthav se lekar aasvadan tak ka vivechan, isi shabdarth par hi aadharit raha hai aur prastut kriti ka sambandh bhartiy kavita-chintan ke isi vaishish‍ty ko ingit karna hai.