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Bhakti Ke Teen Swar : Miraan, Sur, Kabir

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प्रो. हौली पिछले कई दशकों से भक्ति और हिन्दू परम्परा के अन्य पहलुओं पर विचारोत्तेजक काम करते रहे हैं। केनेथ ब्रायंट के साथ मिलकर उन्होंने सूरदास के पदों की प्रामाणिकता और पाठ-निर्धारण पर काम किया है। प्रस्तुत पुस्तक मूल अंग्रेज़ी में 2005 में प्रकाशित हुई थी। इस बीच नई खोजें... Read More

Description

प्रो. हौली पिछले कई दशकों से भक्ति और हिन्दू परम्परा के अन्य पहलुओं पर विचारोत्तेजक काम करते रहे हैं। केनेथ ब्रायंट के साथ मिलकर उन्होंने सूरदास के पदों की प्रामाणिकता और पाठ-निर्धारण पर काम किया है। प्रस्तुत पुस्तक मूल अंग्रेज़ी में 2005 में प्रकाशित हुई थी। इस बीच नई खोजें हुई हैं, भक्ति-विमर्श में नए प्रश्न, नई शब्दावलियाँ आई हैं। प्रो. हौली ने पुस्तक की सामग्री को नई खोजों की रोशनी में अद्यतन किया है, हालाँकि ऐसा करते समय भी वे अपने मूल तर्क, आग्रहों और पद्धति को बनाए रहे हैं।
सूरदास रचित पदों की संख्या ठीक-ठीक लाख नहीं तो हजारों में माननेवालों के लिए यह बहुत चौंकानेवाली बात होगी कि प्रो. हौली इनमें से केवल चार सौ तैंतीस को इस अर्थ में प्रामाणिक मानते हैं कि वे सूरदास से सम्बन्धित प्राचीनतम पांडुलिपियों में प्राप्त होते हैं। हौली इस पुस्तक में सूरदास, मीराँ और कबीर से जुड़े विशिष्ट सवालों—समय, रचनाओं की प्रामाणिकता, संवेदना का स्वभाव, लोक-स्मृति में उनका स्थान—आदि पर तो विचार करते ही हैं, वे इनके बहाने भक्ति-संवेदना से जुड़े व्यापक प्रश्नों पर भी विचार करते हैं। वे उस विमर्श में भी हिस्सा लेते हैं, जो भक्ति-संवेदना के ऐतिहासिक और दार्शनिक रूप से अभूतपूर्व पहलुओं को समझने की कोशिश करता रहा है।
निर्गुण ही नहीं, यह बात तुलसी, सूर, मीराँ जैसे सगुण कवियों के बारे में भी सच है कि उनकी कविता आचार्यों द्वारा कर दिए गए ब्रह्म-निरूपण का जन-सुलभ मुहावरे में प्रचार करने के लिए नहीं रची गई है। वह सचमुच स्वायत्त और नवाचार सम्पन्न 'निज ब्रह्म विचार' है। इस निज ब्रह्म विचार और इसकी काव्याभिव्यक्ति के तीन सर्वाधिक मनोहर स्वरों को सुनते हुए प्रो. जॉन स्ट्रैटन हौली बहुत ही विचारोत्तेजक निष्कर्षों तक पहुँचे हैं, जिनमें से कुछ इस पुस्तक के माध्यम से आपके सामने मौजूद हैं। Pro. Hauli pichhle kai dashkon se bhakti aur hindu parampra ke anya pahaluon par vicharottejak kaam karte rahe hain. Keneth brayant ke saath milkar unhonne surdas ke padon ki pramanikta aur path-nirdharan par kaam kiya hai. Prastut pustak mul angrezi mein 2005 mein prkashit hui thi. Is bich nai khojen hui hain, bhakti-vimarsh mein ne prashn, nai shabdavaliyan aai hain. Pro. Hauli ne pustak ki samagri ko nai khojon ki roshni mein adytan kiya hai, halanki aisa karte samay bhi ve apne mul tark, aagrhon aur paddhati ko banaye rahe hain. Surdas rachit padon ki sankhya thik-thik lakh nahin to hajaron mein mannevalon ke liye ye bahut chaunkanevali baat hogi ki pro. Hauli inmen se keval char sau taintis ko is arth mein pramanik mante hain ki ve surdas se sambandhit prachintam pandulipiyon mein prapt hote hain. Hauli is pustak mein surdas, miran aur kabir se jude vishisht savalon—samay, rachnaon ki pramanikta, sanvedna ka svbhav, lok-smriti mein unka sthan—adi par to vichar karte hi hain, ve inke bahane bhakti-sanvedna se jude vyapak prashnon par bhi vichar karte hain. Ve us vimarsh mein bhi hissa lete hain, jo bhakti-sanvedna ke aitihasik aur darshnik rup se abhutpurv pahaluon ko samajhne ki koshish karta raha hai.
Nirgun hi nahin, ye baat tulsi, sur, miran jaise sagun kaviyon ke bare mein bhi sach hai ki unki kavita aacharyon dvara kar diye ge brahm-nirupan ka jan-sulabh muhavre mein prchar karne ke liye nahin rachi gai hai. Vah sachmuch svayatt aur navachar sampann nij brahm vichar hai. Is nij brahm vichar aur iski kavyabhivyakti ke tin sarvadhik manohar svron ko sunte hue pro. Jaun straitan hauli bahut hi vicharottejak nishkarshon tak pahunche hain, jinmen se kuchh is pustak ke madhyam se aapke samne maujud hain.