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Bhagawan Parshuram

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आर्य-संस्कृति का उषःकाल ही था, जब भृगुवंशी महर्षि जमदग्नि-पत्नी रेणुका के गर्भ से परशुराम का जन्म हुआ। यह वह समय था जब सरस्वती और हषद्वती नदियों के बीच फैले आर्यावर्त्त में यदु और पुरु, भरत और तृत्सु, तर्वसु और अनु, द्रह्यू और जन्हु तथा भृगु जैसी आर्य जातियाँ निवसित थीं... Read More

Description

आर्य-संस्कृति का उषःकाल ही था, जब भृगुवंशी महर्षि जमदग्नि-पत्नी रेणुका के गर्भ से परशुराम का जन्म हुआ। यह वह समय था जब सरस्वती और हषद्वती नदियों के बीच फैले आर्यावर्त्त में यदु और पुरु, भरत और तृत्सु, तर्वसु और अनु, द्रह्यू और जन्हु तथा भृगु जैसी आर्य जातियाँ निवसित थीं और जहाँ वसिष्ठ, विश्वामित्र, जमदग्नि, अंगिरा, गौतम और कण्व आदि महापुरुषों के आश्रमों से गुंजरित दिव्य ऋचाएँ आर्यधर्म का संस्कार-संस्थापन कर रही थीं। लेकिन दूसरी ओर सम्पूर्ण आर्यावर्त्त, नर्मदा से मथुरा तक शासन कर रहे हैहयराज सहस्रार्जुन के लोमहर्षक अत्याचारों से त्रस्त था। ऐसे में युवावस्था में प्रवेश कर रहे परशुराम ने आर्य-संस्कृति को ध्वस्त करने वाले हैहयराज की प्रचंडता को चुनौती दी और अपनी आर्यनिष्ठा, तेजस्विता, संगठन-क्षमता, साहस और अपरिमित शौर्य के बल पर विजयी हुए। संक्षेप में कहें तो यह उपन्यास एक युगपुरुष की ऐसी शौर्यगाथा है जो किसी भी युग में अन्याय और दमन के सक्रिय प्रतिरोध की प्रेरणा देती रहेगी। Aarya-sanskriti ka ushःkal hi tha, jab bhriguvanshi maharshi jamdagni-patni renuka ke garbh se parashuram ka janm hua. Ye vah samay tha jab sarasvti aur hashadvti nadiyon ke bich phaile aaryavartt mein yadu aur puru, bharat aur tritsu, tarvasu aur anu, drahyu aur janhu tatha bhrigu jaisi aarya jatiyan nivsit thin aur jahan vasishth, vishvamitr, jamdagni, angira, gautam aur kanv aadi mahapurushon ke aashrmon se gunjrit divya richayen aarydharm ka sanskar-sansthapan kar rahi thin. Lekin dusri or sampurn aaryavartt, narmda se mathura tak shasan kar rahe haihayraj sahasrarjun ke lomharshak atyacharon se trast tha. Aise mein yuvavastha mein prvesh kar rahe parashuram ne aarya-sanskriti ko dhvast karne vale haihayraj ki prchandta ko chunauti di aur apni aarynishtha, tejasvita, sangthan-kshamta, sahas aur aparimit shaurya ke bal par vijyi hue. Sankshep mein kahen to ye upanyas ek yugapurush ki aisi shaurygatha hai jo kisi bhi yug mein anyay aur daman ke sakriy pratirodh ki prerna deti rahegi.