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“प्रकाश एक युवा-कवि आलोचक थे जिन्होंने इस कविता-संग्रह की पाण्डुलिपि स्वयं तैयार की थी और उसे प्रकाशित करने की चेष्टा कर रहे थे। दुर्भाग्य से उन्होंने जनवरी 2016 में आत्महत्या कर ली। यह मरणोपरान्त प्रकाशन इस बात का साक्ष्य है कि प्रकाश एक भाषा-सजग, शिल्प-निपुण कवि थे जिनके लिए भाषा... Read More

Description

“प्रकाश एक युवा-कवि आलोचक थे जिन्होंने इस कविता-संग्रह की पाण्डुलिपि स्वयं तैयार की थी और उसे प्रकाशित करने की चेष्टा कर रहे थे। दुर्भाग्य से उन्होंने जनवरी 2016 में आत्महत्या कर ली। यह मरणोपरान्त प्रकाशन इस बात का साक्ष्य है कि प्रकाश एक भाषा-सजग, शिल्प-निपुण कवि थे जिनके लिए भाषा स्वयं खोजने-पाने का एक अनुभव थी, निरा माध्यम भर नहीं। उसमें सूक्ष्म संवेदना है जो आजकल की अधिकतर युवा कविता की तरह सामान्यीकृत अनुभवों से काम नहीं चलाती बल्कि उसे संवेदना को ऐसे अनेक बिम्बों और छवियों से चरितार्थ करती है जो प्राय: परिणति में नहीं प्रक्रिया में होती
है : उसे कहीं पहुँचने की जल्दी नहीं होती और वह धीरज से रास्ता खोजती, तय करती या ज़रूरी लगे तो उसमें भटकती है। मर्म, दृष्टि और ब्योरों के बीच प्रकाश के यहाँ दूरी नहीं है, न ही अलगाव। वे दरअसल उन सभी के बीच गहरे लगाव के शिल्पकार थे। उनका यह दूसरा संग्रह प्रकाशित हो रहा है जिसे इस पुस्तक माला में स्थान देकर हमें सन्तोष है कि एक अच्छे युवा कवि की कुल रचनाएँ हमें सामने लाने का सुयोग मिल रहा है।”
—अशोक वाजपेयी
—‘आमुख’ से “prkash ek yuva-kavi aalochak the jinhonne is kavita-sangrah ki pandulipi svayan taiyar ki thi aur use prkashit karne ki cheshta kar rahe the. Durbhagya se unhonne janavri 2016 mein aatmhatya kar li. Ye marnoprant prkashan is baat ka sakshya hai ki prkash ek bhasha-sajag, shilp-nipun kavi the jinke liye bhasha svayan khojne-pane ka ek anubhav thi, nira madhyam bhar nahin. Usmen sukshm sanvedna hai jo aajkal ki adhiktar yuva kavita ki tarah samanyikrit anubhvon se kaam nahin chalati balki use sanvedna ko aise anek bimbon aur chhaviyon se charitarth karti hai jo pray: parinati mein nahin prakriya mein hotiHai : use kahin pahunchane ki jaldi nahin hoti aur vah dhiraj se rasta khojti, tay karti ya zaruri lage to usmen bhatakti hai. Marm, drishti aur byoron ke bich prkash ke yahan duri nahin hai, na hi algav. Ve darasal un sabhi ke bich gahre lagav ke shilpkar the. Unka ye dusra sangrah prkashit ho raha hai jise is pustak mala mein sthan dekar hamein santosh hai ki ek achchhe yuva kavi ki kul rachnayen hamein samne lane ka suyog mil raha hai. ”
—ashok vajpeyi
—‘amukh’ se