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Apsara

Suryakant Tripathi \'Nirala\'

Rs. 595 Rs. 530

Rajkamal Prakashan

‘अप्सरा’ निराला की कथा–यात्रा का प्रथम सोपान है। अप्सरा–सी सुन्दर और कला–प्रेम में डूबी एक वीरांगना की यह कथा हमारे हृदय पर अमिट प्रभाव छोड़ती है। अपने व्यवसाय से उदासीन होकर वह अपना हृदय एक कलाकार को दे डालती है और नाना दुष्चक्रों का सामना करती हुई अतन्त: अपनी पावनता... Read More

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Description

‘अप्सरा’ निराला की कथा–यात्रा का प्रथम सोपान है। अप्सरा–सी सुन्दर और कला–प्रेम में डूबी एक वीरांगना की यह कथा हमारे हृदय पर अमिट प्रभाव छोड़ती है। अपने व्यवसाय से उदासीन होकर वह अपना हृदय एक कलाकार को दे डालती है और नाना दुष्चक्रों का सामना करती हुई अतन्त: अपनी पावनता को बनाए रख पाने में समर्थ होती है। इस प्रक्रिया में उसकी नारी–सुलभ कोमलताएँ तो उजागर होती ही हैं, उसकी चारित्रिक दृढ़ता भी प्रेरणाप्रद हो उठती है।
इस उपन्यास में तत्कालीन भारतीय परिवेश और स्वाधीनता–प्रेमी युवा–वर्ग की दृढ़ संकल्पित मानसिकता का चित्रण हुआ है, जो कि महाप्राण निराला की सामाजिक प्रतिबद्धता का एक ज्वलन्त उदाहरण है। ‘apsra’ nirala ki katha–yatra ka prtham sopan hai. Apsra–si sundar aur kala–prem mein dubi ek virangna ki ye katha hamare hriday par amit prbhav chhodti hai. Apne vyavsay se udasin hokar vah apna hriday ek kalakar ko de dalti hai aur nana dushchakron ka samna karti hui atant: apni pavanta ko banaye rakh pane mein samarth hoti hai. Is prakriya mein uski nari–sulabh komaltayen to ujagar hoti hi hain, uski charitrik dridhta bhi prernaprad ho uthti hai. Is upanyas mein tatkalin bhartiy parivesh aur svadhinta–premi yuva–varg ki dridh sankalpit manasikta ka chitran hua hai, jo ki mahapran nirala ki samajik pratibaddhta ka ek jvlant udahran hai.