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Apavitra Aakhyan

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अब्दुल बिस्मिल्लाह उन चन्द भारतीय लेखकों में से हैं, जिन्होंने देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब को काफ़ी क़रीब से देखा है और उसे अपनी कहानियों और उपन्यासों का विषय बनाया है। समय की सबसे बड़ी विडम्बना है, मनुष्य का इनसान नहीं हो पाना। हम हिन्दू, मुसलमान तो हैं, लेकिन इनसान बनने... Read More

Description

अब्दुल बिस्मिल्लाह उन चन्द भारतीय लेखकों में से हैं, जिन्होंने देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब को काफ़ी क़रीब से देखा है और उसे अपनी कहानियों और उपन्यासों का विषय बनाया है। समय की सबसे बड़ी विडम्बना है, मनुष्य का इनसान नहीं हो पाना। हम हिन्दू, मुसलमान तो हैं, लेकिन इनसान बनने की जद्दोजहद हमें बेचैन कर देती है। यह उपन्यास हिन्दू-मुस्लिम रिश्ते की मिठास और खटास के साथ समय की तिक्ताओं और विरोधाभासों का भी सूक्ष्म चित्रण करता है। उपन्यास के नायक का सम्बन्ध ऐसी संस्कृति से है, जहाँ संस्कार और भाषा के बीच धर्म कोई दीवार खड़ा नहीं करता। लेकिन शहर का सभ्य समाज उसे बार-बार यह अहसास दिलाता है कि वह मुसलमान है। और इसलिए उसे हिन्‍दी और संस्कृत की जगह उर्दू या फ़ारसी की पढ़ाई करनी चाहिए थी। वहीं ऐसे पात्रों से भी उसका सामना होता है, जो अन्दर से कुछ तो बाहर से कुछ और होते हैं। उपन्यास की नायिका यूँ तो व्यवहार में नमाज़-रोज़े वाली है, लेकिन नौकरी के लिए किसी मुस्लिम नेता से हमबिस्तरी करने में उसे कोई हिचक भी नहीं होती। ‘अपवित्र आख्यान’ मौजूदा अर्थ केन्द्रित समाज और उसके सामने खड़े मुस्लिम समाज के अन्तर्वाह्य अवरोधों की कथा के बहाने देश-समाज की मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों का भी गहन चित्रण करता है। Abdul bismillah un chand bhartiy lekhkon mein se hain, jinhonne desh ki ganga-jamuni tahzib ko kafi qarib se dekha hai aur use apni kahaniyon aur upanyason ka vishay banaya hai. Samay ki sabse badi vidambna hai, manushya ka insan nahin ho pana. Hum hindu, musalman to hain, lekin insan banne ki jaddojhad hamein bechain kar deti hai. Ye upanyas hindu-muslim rishte ki mithas aur khatas ke saath samay ki tiktaon aur virodhabhason ka bhi sukshm chitran karta hai. Upanyas ke nayak ka sambandh aisi sanskriti se hai, jahan sanskar aur bhasha ke bich dharm koi divar khada nahin karta. Lekin shahar ka sabhya samaj use bar-bar ye ahsas dilata hai ki vah musalman hai. Aur isaliye use hin‍di aur sanskrit ki jagah urdu ya farsi ki padhai karni chahiye thi. Vahin aise patron se bhi uska samna hota hai, jo andar se kuchh to bahar se kuchh aur hote hain. Upanyas ki nayika yun to vyavhar mein namaz-roze vali hai, lekin naukri ke liye kisi muslim neta se hambistri karne mein use koi hichak bhi nahin hoti. ‘apvitr aakhyan’ maujuda arth kendrit samaj aur uske samne khade muslim samaj ke antarvahya avrodhon ki katha ke bahane desh-samaj ki maujuda samajik aur rajnitik sthitiyon ka bhi gahan chitran karta hai.

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