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मुकुन्द लाठ हमारे मूर्धन्य विचारकों और संगीतवेत्ताओं में से एक हैं। सुखद संयोग यह है कि उन्होंने कविताएँ भी लिखी हैं और वे अपने ढंग के अकेले कवि हैं। विस्मय की बात यह है कि उनकी कविता में संसार की पदार्थमयता और उनकी सहज वैचारिकता में न तो कोई अलगाव... Read More

Description

मुकुन्द लाठ हमारे मूर्धन्य विचारकों और संगीतवेत्ताओं में से एक हैं। सुखद संयोग यह है कि उन्होंने कविताएँ भी लिखी हैं और वे अपने ढंग के अकेले कवि हैं। विस्मय की बात यह है कि उनकी कविता में संसार की पदार्थमयता और उनकी सहज वैचारिकता में न तो कोई अलगाव है और न ही एक का दूसरे पर कोई बोझ। वे अपने आसपास को जिस सजग संवेदनशीलता और नन्हीं सचाइयों में देख पाते हैं, वह अनोखा गुण है। उनके अवलोकन में सूक्ष्मता है, उनकी अभिव्यक्ति में सफ़ाई है। वे मर्म के कवि हैं, किसी विचार के प्रवक्ता नहीं। उनकी कविता का वितान बड़ा है पर उनमें सहज विनय है, कोई महत्त्वाकांक्षा नहीं। वे सहज भाव से कह पाते हैं : ‘उडऩा तो/चिडिय़ा से सीख लिया/अब तो आकाश कहाँ पूछता हूँ।’ उनके अलावा हिन्दी में और कवि हैं जो कह सके ‘है इन्हीं पत्तों में कहीं/ढूँढ़ना मत/पंख हूँ, आकाश है।’ रज़ा पुस्तक माला में अपनी आयु के आठवें दशक में लिखी गईं एक कवि की इन कविताओं को हम सादर-सहर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।
—अशोक वाजपेयी Mukund lath hamare murdhanya vicharkon aur sangitvettaon mein se ek hain. Sukhad sanyog ye hai ki unhonne kavitayen bhi likhi hain aur ve apne dhang ke akele kavi hain. Vismay ki baat ye hai ki unki kavita mein sansar ki padarthamayta aur unki sahaj vaicharikta mein na to koi algav hai aur na hi ek ka dusre par koi bojh. Ve apne aaspas ko jis sajag sanvedanshilta aur nanhin sachaiyon mein dekh pate hain, vah anokha gun hai. Unke avlokan mein sukshmta hai, unki abhivyakti mein safai hai. Ve marm ke kavi hain, kisi vichar ke prvakta nahin. Unki kavita ka vitan bada hai par unmen sahaj vinay hai, koi mahattvakanksha nahin. Ve sahaj bhav se kah pate hain : ‘udna to/chidiya se sikh liya/ab to aakash kahan puchhta hun. ’ unke alava hindi mein aur kavi hain jo kah sake ‘hai inhin patton mein kahin/dhundhana mat/pankh hun, aakash hai. ’ raza pustak mala mein apni aayu ke aathven dashak mein likhi gain ek kavi ki in kavitaon ko hum sadar-saharsh prastut kar rahe hain. —ashok vajpeyi