BackBack
-11%

Anamdas ka Potha

Rs. 250 Rs. 223

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी उन विरल रचनाकारों में थे, जिनकी कृतियाँ उनके जीवन-काल में ही क्लासिक बन गईं। अपनी जन्मजात प्रतिभा के साथ उन्होंने शास्त्रों का अनुशीलन और जीवन को सम्पूर्ण भाव से जीने की साधना करके वह पारदर्शी दृष्टि प्राप्त की, जो किसी कथा को आर्ष-वाणी की प्रतिष्ठा देने में... Read More

Description

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी उन विरल रचनाकारों में थे, जिनकी कृतियाँ उनके जीवन-काल में ही क्लासिक बन गईं। अपनी जन्मजात प्रतिभा के साथ उन्होंने शास्त्रों का अनुशीलन और जीवन को सम्पूर्ण भाव से जीने की साधना करके वह पारदर्शी दृष्टि प्राप्त की, जो किसी कथा को आर्ष-वाणी की प्रतिष्ठा देने में समर्थ होती है। ‘अनामदास का पोथा’ अथ रैक्व-आख्यान आचार्य द्विवेदी की आर्ष-वाणी का अपूर्व उद्घोष है। संसार के दु:ख-दैन्य ने राजपुत्र गौतम को गृहत्यागी, विरक्त बनाया था, लेकिन तापस कुमार रैक्व को यही दु:ख-दैन्य विरक्ति से संसक्ति की ओर प्रवृत्त करते हैं। समाधि उनसे सध नहीं पाती, और वे उद्विग्न की भाँति उठकर कहते हैं : ‘‘माँ, आज समाधि नहीं लग पा रही है। आँखों के सामने केवल भूखे-नंगे बच्चे और कातर दृष्टिवाली माताएँ दिख रही हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, माँ?’’ और माँ रैक्व को बताती हैं : ‘‘अकेले में आत्माराम या प्राणाराम होना भी एक प्रकार का स्वार्थ ही है।’’ यही वह वाक्य है जो रैक्व की जीवन-धारा बदल देता है और वे समाधि छोडक़र कूद पड़ते हैं जीवन-संग्राम में। ‘अनामदास का पोथा’ अथ रैक्व-आख्यान जिजीविषा की कहानी है। ‘‘जिजीविषा है तो जीवन रहेगा, जीवन रहेगा तो अनन्त सम्‍भावनाएँ भी रहेंगी। वे जो बच्चे हैं, किसी की टाँग सूख गई है, किसी का पेट फूल गया है, किसी की आँख सूज गई है—ये जी जाएँ तो इनमें बड़े-बड़े ज्ञानी और उद्यमी बनने की सम्‍भावना है।’’ तापस कुमार रैक्व उन्हीं सम्‍भावनाओं को उजागर करने के लिए व्याकुल हैं, और उसके लिए वे विरक्ति का नहीं, प्रवृत्ति का मार्ग अपनाते हैं। Aacharya hajariprsad dvivedi un viral rachnakaron mein the, jinki kritiyan unke jivan-kal mein hi klasik ban gain. Apni janmjat pratibha ke saath unhonne shastron ka anushilan aur jivan ko sampurn bhav se jine ki sadhna karke vah pardarshi drishti prapt ki, jo kisi katha ko aarsh-vani ki pratishta dene mein samarth hoti hai. ‘anamdas ka potha’ ath raikv-akhyan aacharya dvivedi ki aarsh-vani ka apurv udghosh hai. Sansar ke du:kha-dainya ne rajputr gautam ko grihatyagi, virakt banaya tha, lekin tapas kumar raikv ko yahi du:kha-dainya virakti se sansakti ki or prvritt karte hain. Samadhi unse sadh nahin pati, aur ve udvign ki bhanti uthkar kahte hain : ‘‘man, aaj samadhi nahin lag pa rahi hai. Aankhon ke samne keval bhukhe-nange bachche aur katar drishtivali matayen dikh rahi hain. Aisa kyon ho raha hai, man?’’ aur man raikv ko batati hain : ‘‘akele mein aatmaram ya pranaram hona bhi ek prkar ka svarth hi hai. ’’ yahi vah vakya hai jo raikv ki jivan-dhara badal deta hai aur ve samadhi chhodqar kud padte hain jivan-sangram mein. ‘anamdas ka potha’ ath raikv-akhyan jijivisha ki kahani hai. ‘‘jijivisha hai to jivan rahega, jivan rahega to anant sam‍bhavnayen bhi rahengi. Ve jo bachche hain, kisi ki tang sukh gai hai, kisi ka pet phul gaya hai, kisi ki aankh suj gai hai—ye ji jayen to inmen bade-bade gyani aur udymi banne ki sam‍bhavna hai. ’’ tapas kumar raikv unhin sam‍bhavnaon ko ujagar karne ke liye vyakul hain, aur uske liye ve virakti ka nahin, prvritti ka marg apnate hain.