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वरिष्ठ उपन्यासकार कमलेश्वर का यह उपन्यास एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था की वकालत करता है जिसमें अपने बेरियों के लिए भी स्नेह व सम्मान की गुंजाइश हो। इस उपन्यास का कथा-फ़लक यों तो विस्तृत है लेकिन कमलेश्वर जी ने अपने रचनात्मक कौशल से इसे जिस तरह कम शब्दों में सम्‍भव किया... Read More

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Description

वरिष्ठ उपन्यासकार कमलेश्वर का यह उपन्यास एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था की वकालत करता है जिसमें अपने बेरियों के लिए भी स्नेह व सम्मान की गुंजाइश हो। इस उपन्यास का कथा-फ़लक यों तो विस्तृत है लेकिन कमलेश्वर जी ने अपने रचनात्मक कौशल से इसे जिस तरह कम शब्दों में सम्‍भव किया है, वह क़ाबिले-तारीफ़ है। इस उपन्यस में स्वाधीनता के संघर्षकाल से लेकर सती-प्रथा विरोध तक की अनुगूँजें सुनी जा सकती हैं। इसमें अंग्रेज़ सिपाहियों की क्रूरता और रूढ़िवादी पारम्परिक समाज में विधवा स्त्री की त्रासद स्थिति का बड़ा ही मार्मिक चित्रण हुआ है जो पाठको के मन में करुणा का भाव जगाता है। लोकप्रिय रचनाकार की क़लम से निकली एक अनूठी कृति। Varishth upanyaskar kamleshvar ka ye upanyas ek aadarsh samajik vyvastha ki vakalat karta hai jismen apne beriyon ke liye bhi sneh va samman ki gunjaish ho. Is upanyas ka katha-falak yon to vistrit hai lekin kamleshvar ji ne apne rachnatmak kaushal se ise jis tarah kam shabdon mein sam‍bhav kiya hai, vah qabile-tarif hai. Is upanyas mein svadhinta ke sangharshkal se lekar sati-prtha virodh tak ki anugunjen suni ja sakti hain. Ismen angrez sipahiyon ki krurta aur rudhivadi paramprik samaj mein vidhva stri ki trasad sthiti ka bada hi marmik chitran hua hai jo pathko ke man mein karuna ka bhav jagata hai. Lokapriy rachnakar ki qalam se nikli ek anuthi kriti.