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Agnirekha

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‘अग्निरेखा’ में महादेवी जी की अन्तिम दिनों में रची गई कविताएँ संगृहीत हैं, जो पाठकों को अभिभूत भी करेंगी और आश्चर्यचकित भी। आश्चर्यचकित इस अर्थ में कि महादेवी-काव्य में ओतप्रोत वेदना और करुणा का वह स्वर, जो कब से उनकी पहचान बन चुका है, यहाँ एकदम अनुपस्थित है। अपने आपको... Read More

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Description

‘अग्निरेखा’ में महादेवी जी की अन्तिम दिनों में रची गई कविताएँ संगृहीत हैं, जो पाठकों को अभिभूत भी करेंगी और आश्चर्यचकित भी। आश्चर्यचकित इस अर्थ में कि महादेवी-काव्य में ओतप्रोत वेदना और करुणा का वह स्वर, जो कब से उनकी पहचान बन चुका है, यहाँ एकदम अनुपस्थित है। अपने आपको ‘नीरभरी दु:ख की बदली’ कहनेवाली महादेवी अब जहाँ ‘ज्वाला के पर्व’ की बात करती हैं, वहीं ‘आँधी की राह’ चलने का आह्वान भी। ‘वंशी’ का स्वर अब ‘पाञ्चजन्य’ के स्वर में बदल गया है और ‘हर ध्वंस-लहर में जीवन लहराता’ दिखाई देता है। अपनी काव्य-यात्रा के पहले महत्त्वपूर्ण दौर का समापन करते हुए महादेवी जी ने कहा था—‘देखकर निज कल्पना साकार होते; और उसमें प्राण का संचार होते। सो गया रख तूलिका दीपक-चितेरा।’ इन पंक्तियों में जीवन-प्रभात की जो अनुभूति है, वही प्रस्तुत कविताओं में ज्वाला बनकर फूट निकली है। अकारण नहीं कि वे गा उठी हैं—‘इन साँसों को आज जला मैं/लपटों की माला करती हूँ।’ कहना न होगा कि महादेवीजी के इस काव्यताप को अनुभव करते हुए हिन्दी का पाठक-जगत उसके पीछे छुपी उनकी युगीन संवेदना से निश्चय ही अभिभूत होगा। ‘agnirekha’ mein mahadevi ji ki antim dinon mein rachi gai kavitayen sangrihit hain, jo pathkon ko abhibhut bhi karengi aur aashcharyachkit bhi. Aashcharyachkit is arth mein ki mahadevi-kavya mein otaprot vedna aur karuna ka vah svar, jo kab se unki pahchan ban chuka hai, yahan ekdam anupasthit hai. Apne aapko ‘nirabhri du:kha ki badli’ kahnevali mahadevi ab jahan ‘jvala ke parv’ ki baat karti hain, vahin ‘andhi ki rah’ chalne ka aahvan bhi. ‘vanshi’ ka svar ab ‘panchjanya’ ke svar mein badal gaya hai aur ‘har dhvans-lahar mein jivan lahrata’ dikhai deta hai. Apni kavya-yatra ke pahle mahattvpurn daur ka samapan karte hue mahadevi ji ne kaha tha—‘dekhkar nij kalpna sakar hote; aur usmen pran ka sanchar hote. So gaya rakh tulika dipak-chitera. ’ in panktiyon mein jivan-prbhat ki jo anubhuti hai, vahi prastut kavitaon mein jvala bankar phut nikli hai. Akaran nahin ki ve ga uthi hain—‘in sanson ko aaj jala main/lapton ki mala karti hun. ’ kahna na hoga ki mahadeviji ke is kavytap ko anubhav karte hue hindi ka pathak-jagat uske pichhe chhupi unki yugin sanvedna se nishchay hi abhibhut hoga.