BackBack

Agle Janam Mohe Bitia Na Kijo

Rs. 99

‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ मामूली नाचने-गानेवाली दो बहनों की कहानी है, जो बार-बार मर्दों के छलावों का शिकार होती हैं। फिर भी यह उपन्यास जागीरदार घरानों के आर्थिक ही नहीं, भावात्मक खोखलेपन को भी जिस तरह उभारकर सामने लाता है, उसकी मिसाल उर्दू साहित्य में मिलना कठिन है।... Read More

BlackBlack
Description

‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो’ मामूली नाचने-गानेवाली दो बहनों की कहानी है, जो बार-बार मर्दों के छलावों का शिकार होती हैं। फिर भी यह उपन्यास जागीरदार घरानों के आर्थिक ही नहीं, भावात्मक खोखलेपन को भी जिस तरह उभारकर सामने लाता है, उसकी मिसाल उर्दू साहित्य में मिलना कठिन है। एक जागीरदार घराने के आग़ा फ़रहाद बकौल खुद पच्चीस साल के बाद भी रश्के-क़मर को भूल नहीं पाते और हालात का सितम यह कि उसके लिए बन्दोबस्त करते हैं तो कुछेक ग़ज़लों का ताकि ‘अगर तुम वापस आओ और मुशायरों में मदऊ (आमंत्रित) किया जाए तो ये ग़ज़लें तुम्हारे काम आएँगी।’ आख़िर सबकुछ लुटने के बाद रश्के-कमर के पास बचता है तो बस यही कि ‘कुर्तों की तुरपाई फ़ी कुर्ता दस पैसे...’
खोखलापन और दिखावा—जागीरदार तबके की इस त्रासदी को सामने लाने का काम ‘दिलरुबा’ उपन्यास भी करता है। मगर विरोधाभास यह है कि समाज बदल रहा है और यह तबका भी इस बदलाव से अछूता नहीं रह सकता। यहाँ लेखिका ने प्रतीक इस्तेमाल किया है फ़िल्म उद्योग का, जिसके बारे में इस तबके की नौजवान पीढ़ी भी उस विरोध-भावना से मुक्त है जो उनके बुज़ुर्गों में पाई जाती थी। ‘agle janam mohe bitiya na kijo’ mamuli nachne-ganevali do bahnon ki kahani hai, jo bar-bar mardon ke chhalavon ka shikar hoti hain. Phir bhi ye upanyas jagirdar gharanon ke aarthik hi nahin, bhavatmak khokhlepan ko bhi jis tarah ubharkar samne lata hai, uski misal urdu sahitya mein milna kathin hai. Ek jagirdar gharane ke aaga farhad bakaul khud pachchis saal ke baad bhi rashke-qamar ko bhul nahin pate aur halat ka sitam ye ki uske liye bandobast karte hain to kuchhek gazlon ka taki ‘agar tum vapas aao aur mushayron mein maduu (amantrit) kiya jaye to ye gazlen tumhare kaam aaengi. ’ aakhir sabkuchh lutne ke baad rashke-kamar ke paas bachta hai to bas yahi ki ‘kurton ki turpai fi kurta das paise. . . ’Khokhlapan aur dikhava—jagirdar tabke ki is trasdi ko samne lane ka kaam ‘dilaruba’ upanyas bhi karta hai. Magar virodhabhas ye hai ki samaj badal raha hai aur ye tabka bhi is badlav se achhuta nahin rah sakta. Yahan lekhika ne prtik istemal kiya hai film udyog ka, jiske bare mein is tabke ki naujvan pidhi bhi us virodh-bhavna se mukt hai jo unke buzurgon mein pai jati thi.