Look Inside
Adhigam Aur Aalochana
Adhigam Aur Aalochana
share-Icon
Adhigam Aur Aalochana
Adhigam Aur Aalochana

Adhigam Aur Aalochana

Regular price ₹ 495
Sale price ₹ 495 Regular price ₹ 550
Unit price
Save 10%
10% off
Tax included.
Size guide
Icon

Pay On Delivery Available

Load-icon

Rekhta Certified

master-icon

Dedicated Support

Adhigam Aur Aalochana

Adhigam Aur Aalochana

Regular price ₹ 495
Sale price ₹ 495 Regular price ₹ 550
Unit price
10% off
Cash-On-Delivery

Cash On Delivery available

Rekhta-Certified

Plus (F-Assured)

7-Days-Replacement

7 Day Replacement

Product description
Shipping & Return
Offers & Coupons
Read Sample
Product description
इस पुस्तक में मेरे नये-पुराने कुछ लेख हैं, जो पिछले कुछ वर्षों में लिखे गए हैं। अधिगम के साथ-साथ आलोचना की भी एक अच्छी-खासी यात्रा इस बीच पूरी हुई है। इस पुस्तक का नाम दरअसल होना चाहिए था- 'इक्कीसवीं सदी के मुहाने पर अधिगम और आलोचना'। अधिगम और आलोचना का जो और जैसा चरित्र और स्वरूप यहाँ उभरा है, उसका केंद्र-बिंदु और धुरी यही इक्कीसवीं सदी का मुहाना है। उस समय का राजनीतिक व सामाजिकार्थिक परिवेश व परिदृश्य और इसके बरअक्स उस समय का रचनात्मक सामर्थ्य मेरी निगाह में था। समय बहुत संकटपूर्ण है, इसका रोना प्रायः हर समय गाया जाता है। मेरा ऐसा मानना है कि संकट समय में नहीं, उसके बाबत हमारी समझ में होता है। समय तो अपनी स्वाभाविक चाल से निरन्तर चलता रहता है; यह हम ही हैं जो उसे सही-सही पहचानने-पकड़ने में गफलत करते रहते हैं। इस गफलत के पीछे हमारे कुछ दुराग्रह, कुछ पूवपिक्षाएँ, कुछ गलतफहमियाँ होती हैं जिन्हें हम हर समय अपने सीने से लगाए फिरने के आदी होते हैं। और, हमारी इस रोमानियत के मूल में हमारी यथास्थितिवादी सोच और क्रिया सन्निहित होती है। तय है कि यह यथास्थितिवादी सोच और क्रिया अपने तत्त्व-स्वरूप में विडम्बनाधर्मिता से संत्रस्त होती ही। और जहाँ विडम्वनाधर्मिता होगी, वहाँ अग्रगामी सोच और सक्रियता का अभाव होगा; जिसका कुल परिणाम यह होगा कि समय में क्रांतिकारी परिवर्तनकारी हस्तक्षेप की हमारी सक्षमता संकटग्रस्त हो जाएगी। इस तरह प्रतीत दरअसल यह होता है कि संकटापन्न समय नहीं, हम स्वयं होते हैं! हम अपनी विडम्बनाधर्मिता से मुक्त नहीं हो पाते; यही दरअसल सबसे बड़ा संकट होता है। हम सब जानते हैं कि साहित्य का चक्र दो प्रक्रियाओं से ही पूर्ण होता है। एक है, साहित्य की रचना-प्रक्रिया व दूसरी है, साहित्य की अधिगम-प्रक्रिया। रचना-प्रक्रिया का सम्बन्ध लेखक या रचनाकार से होता है, जबकि अधिगम-प्रक्रिया का सम्बन्ध पाठक या अध्येता से होता है। जैसे ताली एक हाथ से नहीं बजती, ठीक वैसे ही,
Shipping & Return
  • Sabr– Your order is usually dispatched within 24 hours of placing the order.
  • Raftaar– We offer express delivery, typically arriving in 2-5 days. Please keep your phone reachable.
  • Sukoon– Easy returns and replacements within 5 days.
  • Dastoor– COD and shipping charges may apply to certain items.

Offers & Coupons

Use code FIRSTORDER to get 5% off your first order.


You can also Earn up to 10% Cashback with POP Coins and redeem it in your future orders.

Read Sample

Related Products

Recently Viewed Products