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Aalok Parv

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आचार्य द्विवेदी ऐसे वाङ्मय-पुरुष हैं जिनका संस्कृत मुख है, प्राकृत बाहु है, अपभ्रंश जघन है और हिन्दी पाद है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध पढ़कर मन की आँखों के सामने उनका यह रूप साकार हो उठता है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध द्विवेदी जी के प्रगाढ़ अध्ययन और प्रखर चिन्तन से प्रसूत... Read More

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Description

आचार्य द्विवेदी ऐसे वाङ्मय-पुरुष हैं जिनका संस्कृत मुख है, प्राकृत बाहु है, अपभ्रंश जघन है और हिन्दी पाद है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध पढ़कर मन की आँखों के सामने उनका यह रूप साकार हो उठता है। ‘आलोक पर्व’ के निबन्ध द्विवेदी जी के प्रगाढ़ अध्ययन और प्रखर चिन्तन से प्रसूत हैं। इन निबन्धों में उन्होंने एक ओर संस्कृत-काव्य की भाव-गरिमा की एक झलक पाठकों के सामने प्रस्तुत की है तो दूसरी ओर अपभ्रंश तथा प्राकृत के साथ हिन्दी के सम्बन्ध का निरूपण करते हुए लोकभाषा में हमारे सांस्कृतिक इतिहास की भूली कड़ि‍याँ खोजने का प्रयास किया है। ‘आलोक पर्व’ में उन प्रेरणाओं के उत्स का साक्षात्कार पाठकों को होगा जिससे द्विवेदी जी ने यह अमृत-मंत्र देने की शक्ति प्राप्त की—‘किसी से भी न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं।’ ‘आलोक पर्व’ के निबन्धों में आचार्य द्विवेदी ने भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति के प्रति अपनी सम्मान-भावना को संकोचहीन अभिव्यक्ति दी है, किन्तु उनकी यह सम्मान-भावना विवेकजन्य है और इसीलिए नई अनुसन्धित्सा का भी इनमें निरादर नहीं है। Aacharya dvivedi aise vanmay-purush hain jinka sanskrit mukh hai, prakrit bahu hai, apabhransh jaghan hai aur hindi paad hai. ‘alok parv’ ke nibandh padhkar man ki aankhon ke samne unka ye rup sakar ho uthta hai. ‘alok parv’ ke nibandh dvivedi ji ke prgadh adhyyan aur prkhar chintan se prsut hain. In nibandhon mein unhonne ek or sanskrit-kavya ki bhav-garima ki ek jhalak pathkon ke samne prastut ki hai to dusri or apabhransh tatha prakrit ke saath hindi ke sambandh ka nirupan karte hue lokbhasha mein hamare sanskritik itihas ki bhuli kadi‍yan khojne ka pryas kiya hai. ‘alok parv’ mein un prernaon ke uts ka sakshatkar pathkon ko hoga jisse dvivedi ji ne ye amrit-mantr dene ki shakti prapt ki—‘kisi se bhi na darna, guru se bhi nahin, mantr se bhi nahin, lok se bhi nahin, ved se bhi nahin. ’ ‘alok parv’ ke nibandhon mein aacharya dvivedi ne bhartiy dharm, darshan aur sanskriti ke prati apni samman-bhavna ko sankochhin abhivyakti di hai, kintu unki ye samman-bhavna vivekjanya hai aur isiliye nai anusandhitsa ka bhi inmen niradar nahin hai.