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Aakhiri Kalaam

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यह कथा-कृति उपन्यास की सारी सीमाओं और लालचों को उलट-पुलट देती है। चरित्रों के टकराव से कथा का विकास—यह जो उपन्यास-लेखन की आदत बन चुकी है, यहाँ इस आदत से लगभग इनकार है। फिर भी यह कथा-कृति एक उपन्यास ही है। इसमें गद्य और वृत्तान्त का एक अजब संयोजन है,... Read More

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Description

यह कथा-कृति उपन्यास की सारी सीमाओं और लालचों को उलट-पुलट देती है। चरित्रों के टकराव से कथा का विकास—यह जो उपन्यास-लेखन की आदत बन चुकी है, यहाँ इस आदत से लगभग इनकार है। फिर भी यह कथा-कृति एक उपन्यास ही है। इसमें गद्य और वृत्तान्त का एक अजब संयोजन है, जहाँ से ढाँचागत वर्जनाएँ समाप्त होती हैं और कथा का विस्तार और खुलापन बातों और विचारों को आमंत्रित करते-से लगते हैं। गद्य और गल्प का एक नया रसायन तैयार होता है जो अपने रस और सुर से अद्भुत पठनीयता पैदा करता है। इस तरह यह उपन्यास गल्प की एक नई, अबाध निरन्तरता का प्रमाण है।
इस उपन्यास में मिथकीय संस्कृति के विश्लेषण की एक पवित्र और निहत्थी छटपटाहट है। मिथक को इतिहास में बदलने की कोशिशों का पर्दाफाश है; विचार, संरचना और संस्कृति पर एकल बहसों का निर्वेद है। इसी के भीतर कहानी के तार बिखरे पड़े हैं। इन्हीं तकलीफ़ों के भीतर से इतिहास के उन सूत्रों को ढूँढ़ने का प्रयत्न है, जो एक मिले-जुले समाज की बुनियाद हैं और जिनको उलट-पुलट देने की बर्बर आहटें इधर चौतरफ़ा सुनाई दे रही हैं। इसी तरह यह उपन्यास अपने समय के संसार की एक चित्र-रचना बनता है। अपने अतीत, इतिहास, मिथक और साहित्य-संस्कृति को उकेरता-उधेड़ता हुआ उसकी एक विस्फोटक और स्तब्धकारी पुनर्रचना सामने रखता है। उन बातों, अर्थों और व्याख्याओं को सामने लाता है, जो उसी में छुपी थीं लेकिन लोग और समाज, संस्कृति और विचार के धनुर्धर उसकी ओर से अक्सर आखें मूँदे रहते हैं।
अन्तत: यह उपन्यास हमारे अतीत और वर्तमान की एक नई ‘पोलेमिक्स' है। इंसाफ़ की इच्छा का एक दुखद-द्वंद्वात्मक संवाद है, जो अपने लोगों और अपनी जनता को ही सम्बोधित है। Ye katha-kriti upanyas ki sari simaon aur lalchon ko ulat-pulat deti hai. Charitron ke takrav se katha ka vikas—yah jo upanyas-lekhan ki aadat ban chuki hai, yahan is aadat se lagbhag inkar hai. Phir bhi ye katha-kriti ek upanyas hi hai. Ismen gadya aur vrittant ka ek ajab sanyojan hai, jahan se dhanchagat varjnayen samapt hoti hain aur katha ka vistar aur khulapan baton aur vicharon ko aamantrit karte-se lagte hain. Gadya aur galp ka ek naya rasayan taiyar hota hai jo apne ras aur sur se adbhut pathniyta paida karta hai. Is tarah ye upanyas galp ki ek nai, abadh nirantarta ka prman hai. Is upanyas mein mithkiy sanskriti ke vishleshan ki ek pavitr aur nihatthi chhataptahat hai. Mithak ko itihas mein badalne ki koshishon ka pardaphash hai; vichar, sanrachna aur sanskriti par ekal bahson ka nirved hai. Isi ke bhitar kahani ke taar bikhre pade hain. Inhin taklifon ke bhitar se itihas ke un sutron ko dhundhane ka pryatn hai, jo ek mile-jule samaj ki buniyad hain aur jinko ulat-pulat dene ki barbar aahten idhar chautarfa sunai de rahi hain. Isi tarah ye upanyas apne samay ke sansar ki ek chitr-rachna banta hai. Apne atit, itihas, mithak aur sahitya-sanskriti ko ukerta-udhedta hua uski ek visphotak aur stabdhkari punarrachna samne rakhta hai. Un baton, arthon aur vyakhyaon ko samne lata hai, jo usi mein chhupi thin lekin log aur samaj, sanskriti aur vichar ke dhanurdhar uski or se aksar aakhen munde rahte hain.
Antat: ye upanyas hamare atit aur vartman ki ek nai ‘polemiks hai. Insaf ki ichchha ka ek dukhad-dvandvatmak sanvad hai, jo apne logon aur apni janta ko hi sambodhit hai.