ईरान: ख़ुमैनी से ख़ामेनेई तक
ज़ैग़म मुर्तज़ा
1979 की इस्लामी क्रांति ने केवल ईरान की राजनीति को नहीं बदला, बल्कि पूरी दुनिया की शक्ति-संरचना, पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक समीकरण और इस्लामी समाजों की दिशा पर गहरा असर डाला। भारत में, ईरान को अक्सर अधूरी जानकारियों, धार्मिक पूर्वाग्रहों और मीडिया-निर्मित धारणाओं के सहारे समझा गया है।
यह किताब उन्हीं भ्रांतियों और वास्तविकताओं के बीच एक सेतु बनाने का प्रयास है। पत्रकार और लेखक ज़ैग़म मुर्तज़ा अपने निजी अनुभवों, यात्राओं, ऐतिहासिक संदर्भों और राजनीतिक विश्लेषणों के माध्यम से पाठक को उस ईरान से परिचित कराते हैं, जो अख़बारों की सुर्खियों और सोशल मीडिया के शोर से कहीं अधिक जटिल, जीवंत और मानवीय है।
इस पुस्तक में इस्लामी क्रांति, आयतुल्लाह ख़ुमैनी, अली ख़ामेनेई, शिया–सुन्नी संबंध, पश्चिम एशिया की राजनीति, अमेरिका–इज़रायल–ईरान संघर्ष, भारतीय समाज में फैली धारणाएँ और भारत–ईरान के ऐतिहासिक रिश्तों जैसे विषयों पर गंभीर किंतु सहज भाषा में चर्चा की गई है।
यह किताब केवल राजनीति का वृत्तांत नहीं, बल्कि स्मृति, इतिहास, पहचान और सूचना-युद्ध के दौर में सच की तलाश का दस्तावेज़ भी है।
समीक्षाएँ
अशोक कुमार पांडेय(लेखक, इतिहासकार) लिखते हैं:
“ज़ैग़म की यह किताब ईरान के आधुनिक इतिहास की तथ्यात्मक पड़ताल करती है और यह भी दिखाती है कि आधुनिकता की पश्चिमी परिभाषाओं के बरक्स ईरान, चीन और हिंदुस्तान जैसी सभ्यताओं के अपने मानक हैं, जिनकी जड़ें उनकी परंपराओं में हैं।”
देवेश (लेखक) लिखते हैं:
“यह किताब एक पुल है— भ्रम और वास्तविकता के बीच, पूर्वाग्रह और समझ के बीच।”
सौरभ कुमार शाही (वरिष्ठ पत्रकार) लिखते हैं:
“ईरान पर यह पैनी और गहरी किताब वक़्त के लिहाज़ से बेहद मौज़ूँ कही जा सकती है, मगर अपने दृष्टिकोण और विषय-वस्तु के कारण यह आगे भी गंभीर पाठकों के लिए प्रासंगिक बनी रहेगी।”
यह किताब विशेष रूप से उन पाठकों के लिए है जो: - ईरान और पश्चिम एशिया को गहराई से जानना चाहते हैं - इस्लामी क्रांति और उसके प्रभावों में रुचि रखते हैं - भारत–ईरान संबंधों का इतिहास समझना चाहते हैं - मीडिया और प्रचार से आगे जाकर वास्तविक समाज को देखना चाहते हैं - समकालीन भू-राजनीति और इस्लामी दुनिया पर गंभीर अध्ययन करना चाहते हैं
》 यह किताब ईरान को लेकर बनी धारणाओं को चुनौती देती है और पाठक को इतिहास, राजनीति और समाज की एक जटिल लेकिन बेहद ज़रूरी यात्रा पर ले जाती है।
About Author
ज़ैग़म मुर्तज़ा अमरोहा (उत्तर प्रदेश) में जन्मे पत्रकार, लेखक और चिंतक हैं। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और जनसंचार के अलावा लोक प्रशासन से भी परास्नातक किया है। 2005 से सक्रिय, वे संसदीय राजनीति, समाज, संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर लेखन करते रहे हैं। उनकी लेखनी में इतिहास और वर्तमान का संतुलित मेल दिखाई देता है। जटिल विषयों पर क़िस्सों और अनुभवों के माध्यम से सरल और प्रभावशाली भाषा में लिखते हैं। पत्रकारिता और लेखन के साथ-साथ वे शिक्षण क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं। उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया हमदर्द में पत्रकारिता पढ़ाई है। सामाजिक सरोकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता, वैश्विक राजनीति पर पैनी दृष्टि और कहानी कहने की कला उन्हें भारतीय मीडिया जगत में एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।