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Deewan-E-Galib

Ed. Ali Sardar Zafari

Rs. 399 Rs. 355

Rajkamal Prakashan

साहित्य के हज़ारों साल लम्बे इतिहास में जिन चन्द काव्य-विभूतियों को विश्वव्यापी सम्मान प्राप्त है, ग़ालिब उन्हीं में से एक हैं। उर्दू के इस महान शायर ने अपनी युगीन पीड़ाओं को ज्ञान और बुद्धि के स्तर पर ले जाकर जिस ख़ूबसूरती से बयान किया, उससे समूची उर्दू शायरी ने एक... Read More

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Hardeep Singh
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Description

साहित्य के हज़ारों साल लम्बे इतिहास में जिन चन्द काव्य-विभूतियों को विश्वव्यापी सम्मान प्राप्त है, ग़ालिब उन्हीं में से एक हैं। उर्दू के इस महान शायर ने अपनी युगीन पीड़ाओं को ज्ञान और बुद्धि के स्तर पर ले जाकर जिस ख़ूबसूरती से बयान किया, उससे समूची उर्दू शायरी ने एक नया अन्दाज़ पाया और वही लोगों के दिलो-दिमाग़ पर छा गया। उनकी शायरी में जीवन का हर पहलू और हर पल समाहित है, इसीलिए वह जीवन की बहुविध और बहुरंगी दशाओं में हमारा साथ देने की क्षमता रखती है।
काव्यशास्त्र की दृष्टि से ग़ालिब ने स्वयं को ‘गुस्ताख़’ कहा है, लेकिन यही उनकी ख़ूबी बनी। उनकी शायरी में जो हलके विद्रोह का स्वर है, जिसका रिश्ता उनके आहत स्वाभिमान से ज़्यादा है, उसमें कहीं शंका, कहीं व्यंग्य और कहीं कल्पना की जैसी ऊँचाइयाँ हैं, वे उनकी उत्कृष्ट काव्य-कला से ही सम्भव हुई हैं। इसी से उनकी ग़ज़ल प्रेम-वर्णन से बढ़कर जीवन-वर्णन तक पहुँच पाई। अपने विशिष्ट सौन्दर्यबोध से पैदा अनुभवों को उन्होंने जिस कलात्मकता से शायरी में ढाला, उससे न सिर्फ़ वर्तमान के तमाम बन्धन टूटे, बल्कि वह अपने अतीत को समेटते हुए भविष्य के विस्तार में भी फैलती चली गई। निश्चय ही ग़ालिब का यह दीवान हमें उर्दू-शायरी की सर्वोपरि ऊँचाइयों तक ले जाता है। Sahitya ke hazaron saal lambe itihas mein jin chand kavya-vibhutiyon ko vishvavyapi samman prapt hai, galib unhin mein se ek hain. Urdu ke is mahan shayar ne apni yugin pidaon ko gyan aur buddhi ke star par le jakar jis khubsurti se bayan kiya, usse samuchi urdu shayri ne ek naya andaz paya aur vahi logon ke dilo-dimag par chha gaya. Unki shayri mein jivan ka har pahlu aur har pal samahit hai, isiliye vah jivan ki bahuvidh aur bahurangi dashaon mein hamara saath dene ki kshamta rakhti hai. Kavyshastr ki drishti se galib ne svayan ko ‘gustakh’ kaha hai, lekin yahi unki khubi bani. Unki shayri mein jo halke vidroh ka svar hai, jiska rishta unke aahat svabhiman se zyada hai, usmen kahin shanka, kahin vyangya aur kahin kalpna ki jaisi uunchaiyan hain, ve unki utkrisht kavya-kala se hi sambhav hui hain. Isi se unki gazal prem-varnan se badhkar jivan-varnan tak pahunch pai. Apne vishisht saundarybodh se paida anubhvon ko unhonne jis kalatmakta se shayri mein dhala, usse na sirf vartman ke tamam bandhan tute, balki vah apne atit ko samette hue bhavishya ke vistar mein bhi phailti chali gai. Nishchay hi galib ka ye divan hamein urdu-shayri ki sarvopari uunchaiyon tak le jata hai.