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Manto Dastavej : Vols. 1-5

Saadat Hasan Manto

Rs. 5,000 Rs. 4,450

समय के साथ कितनी ही हक़ीक़तें फ़रेब बन जाती हैं और कितने ही ख़्वाब सच्चाई में ढल जाते हैं—समय न तो अँधेरों की निरन्तरता है, न इतिहास और सभ्यता के किसी अनदेखे रास्ते पर एक अंधी दौड़। इन सबके विपरीत समय एक तलाश है, बोध है, विज़न है और एक... Read More

Description

समय के साथ कितनी ही हक़ीक़तें फ़रेब बन जाती हैं और कितने ही ख़्वाब सच्चाई में ढल जाते हैं—समय न तो अँधेरों की निरन्तरता है, न इतिहास और सभ्यता के किसी अनदेखे रास्ते पर एक अंधी दौड़।
इन सबके विपरीत समय एक तलाश है, बोध है, विज़न है और एक कर्मभूमि।
समय की कोई सीमा अगर क़ायम की जा सकती है, और अगर उसे एक नाम दिया जा सकता है तो वह नाम ‘आदमी’ है।
आदमी की बुनियादी समस्या पाषाण युग से मंटो और मंटो के पात्रों तक, एक ही रही है : कोई रौशनी, कोई रौशनी...
रौशनी के लिए, नई रौशनी की ख़ातिर, नित नई रौशनी की तलाश में आदमी ने सदियों का सफ़र तै किया और आज भी सफ़र में है। इसी निरन्तर और अधूरे सफ़र का एक पड़ाव मंटो है।
मंटो की तलाश और खोज के हवाले से इस कोशिश का मुनासिब और सटीक नाम ‘दस्तावेज़’ के अलावा सोचा भी नहीं जा सकता। Samay ke saath kitni hi haqiqten fareb ban jati hain aur kitne hi khvab sachchai mein dhal jate hain—samay na to andheron ki nirantarta hai, na itihas aur sabhyta ke kisi andekhe raste par ek andhi daud. In sabke viprit samay ek talash hai, bodh hai, vizan hai aur ek karmbhumi.
Samay ki koi sima agar qayam ki ja sakti hai, aur agar use ek naam diya ja sakta hai to vah naam ‘admi’ hai.
Aadmi ki buniyadi samasya pashan yug se manto aur manto ke patron tak, ek hi rahi hai : koi raushni, koi raushni. . .
Raushni ke liye, nai raushni ki khatir, nit nai raushni ki talash mein aadmi ne sadiyon ka safar tai kiya aur aaj bhi safar mein hai. Isi nirantar aur adhure safar ka ek padav manto hai.
Manto ki talash aur khoj ke havale se is koshish ka munasib aur satik naam ‘dastavez’ ke alava socha bhi nahin ja sakta.