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Krishnavtar : Vol. 2 : Rukmini Haran

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‘कृष्णावतार’ परम पुरुष श्रीकृष्ण की जीवनलीला पर देश की किसी भी भाषा में आधुनिक उपन्यास लिखने का शायद पहला ही प्रयास है। पौराणिक परम्पराओं, विविध भाषाओं के काव्यों और लोक-साहित्य ने श्रीकृष्ण का जो बहुविध व्यक्तित्व और रूप हमारे सामने प्रस्तुत कर रखा है, वह अनन्य है, लेकिन उसे उपन्यास... Read More

Description

‘कृष्णावतार’ परम पुरुष श्रीकृष्ण की जीवनलीला पर देश की किसी भी भाषा में आधुनिक उपन्यास लिखने का शायद पहला ही प्रयास है। पौराणिक परम्पराओं, विविध भाषाओं के काव्यों और लोक-साहित्य ने श्रीकृष्ण का जो बहुविध व्यक्तित्व और रूप हमारे सामने प्रस्तुत कर रखा है, वह अनन्य है, लेकिन उसे उपन्यास की विधा में बाँध लेने का श्रेय गुजराती के प्रमुख कथाकार कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी को ही प्राप्त हो सका है।
‘रुक्मिणी हरण’ मुंशी के विराट् उपन्यास ‘कृष्णावतार’ का दूसरा खंड है, जिसमें ‘बंसी की धुन’ के बाद की कथा कही गई है। इस भाग में वयस्क कृष्ण के पराक्रमपूर्ण जीवन की गौरवशाली गाथाओं का चित्रण किया गया है। मगध-सम्राट् जरासंध का मान-मर्दन इस कथा-भाग का केन्द्रीय विषय है और इसकी परिणति रुक्मिणी हरण में होती है। ‘krishnavtar’ param purush shrikrishn ki jivanlila par desh ki kisi bhi bhasha mein aadhunik upanyas likhne ka shayad pahla hi pryas hai. Pauranik parampraon, vividh bhashaon ke kavyon aur lok-sahitya ne shrikrishn ka jo bahuvidh vyaktitv aur rup hamare samne prastut kar rakha hai, vah ananya hai, lekin use upanyas ki vidha mein bandh lene ka shrey gujrati ke prmukh kathakar kanhaiyalal maniklal munshi ko hi prapt ho saka hai. ‘rukmini haran’ munshi ke virat upanyas ‘krishnavtar’ ka dusra khand hai, jismen ‘bansi ki dhun’ ke baad ki katha kahi gai hai. Is bhag mein vayask krishn ke parakrampurn jivan ki gauravshali gathaon ka chitran kiya gaya hai. Magadh-samrat jarasandh ka man-mardan is katha-bhag ka kendriy vishay hai aur iski parinati rukmini haran mein hoti hai.