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Ishwar Bhi Pareshan Hai

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‘ईश्वर भी परेशान है’ विष्णु नागर की व्यंग्यधर्मिता का रोचक उदाहरण है। समकालीन हिन्दी व्यंग्य की गहमागहमी में उनकी शैली अलग से पहचानी जाती है। सामाजिक परिवर्तन के भीतर सक्रिय अन्तर्विरोधों की पहचान, राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के मलिन मुख और निजी जीवन में नैतिकता के चक्रव्यूह आदि को बूझने में विष्णु... Read More

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Description

‘ईश्वर भी परेशान है’ विष्णु नागर की व्यंग्यधर्मिता का रोचक उदाहरण है। समकालीन हिन्दी व्यंग्य की गहमागहमी में उनकी शैली अलग से पहचानी जाती है। सामाजिक परिवर्तन के भीतर सक्रिय अन्तर्विरोधों की पहचान, राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के मलिन मुख और निजी जीवन में नैतिकता के चक्रव्यूह आदि को बूझने में विष्णु नागर का जवाब नहीं। यही वजह है कि वे कम शब्दों में प्रभावपूर्ण ढंग से विसंगतियों पर प्रहार करते हैं।
विष्णु नागर के इस व्यंग्य संग्रह की एक और विशेषता पाठक का ध्यान खींचती है। वह है, सामाजिक घटनाओं या प्रसंगों पर लेखन की चुटीली टिप्पणियाँ। लोकतंत्र की लीला में प्रतिक्षण ऐसे कार्य होते और दिखते हैं जो विडम्बनाओं से भरे होते हैं। इन कार्यों में छिपे मन्तव्यों पर उँगली टिकाते हुए लेखक ने उन्हें उजागर किया है। ‘मतदाता उछलो मत!’ में विष्णु नागर लिखते हैं कि ‘हे बीटा, आज अकाद लो।... कल हमारे द्वारे पर हुजूर कहते हुए आओगे, गिड़गिड़ाओगे, तब तुम्हें पता चलेगा कि तुम क्या हो और हम क्या हैं!... तब तुम्हें पता चलेगा कि हम किसके थे, किसके हैं और किसके रहेंगे।’
पुरानी उक्ति है कि कठिन बात सरलता से कह जाना मुश्किल काम है। विष्णु नागर ने अपनी व्यंजनापूर्ण भाषा से यही काम किया है! ‘iishvar bhi pareshan hai’ vishnu nagar ki vyangydharmita ka rochak udahran hai. Samkalin hindi vyangya ki gahmagahmi mein unki shaili alag se pahchani jati hai. Samajik parivartan ke bhitar sakriy antarvirodhon ki pahchan, rajnitik mahattvakankshaon ke malin mukh aur niji jivan mein naitikta ke chakravyuh aadi ko bujhne mein vishnu nagar ka javab nahin. Yahi vajah hai ki ve kam shabdon mein prbhavpurn dhang se visangatiyon par prhar karte hain. Vishnu nagar ke is vyangya sangrah ki ek aur visheshta pathak ka dhyan khinchti hai. Vah hai, samajik ghatnaon ya prsangon par lekhan ki chutili tippaniyan. Loktantr ki lila mein prtikshan aise karya hote aur dikhte hain jo vidambnaon se bhare hote hain. In karyon mein chhipe mantavyon par ungali tikate hue lekhak ne unhen ujagar kiya hai. ‘matdata uchhlo mat!’ mein vishnu nagar likhte hain ki ‘he bita, aaj akad lo. . . . Kal hamare dvare par hujur kahte hue aaoge, gidagidaoge, tab tumhein pata chalega ki tum kya ho aur hum kya hain!. . . Tab tumhein pata chalega ki hum kiske the, kiske hain aur kiske rahenge. ’
Purani ukti hai ki kathin baat saralta se kah jana mushkil kaam hai. Vishnu nagar ne apni vyanjnapurn bhasha se yahi kaam kiya hai!