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Hindi Kahani Ki Ikkisavin Sadi

Sanjeev Kumar

Rs. 895 Rs. 797

Rajkamal Prakashan

लम्बे-लम्बे अन्तराल पर तीन-चार कहानियाँ ही मैं लिख पाया, पर लिखने की ललक बनी रही जिसने यह ग़ौर करनेवाली निगाह दी कि अच्छी कहानी में अच्छा क्या होता है, कहानियाँ कितने तरीक़ों से लिखी जाती हैं, वे कौन-कौन-सी युक्तियाँ हैं जिनसे विशिष्ट प्रभाव पैदा होते हैं, कोई सम्भावनाशाली कथा-विचार कैसे... Read More

Description

लम्बे-लम्बे अन्तराल पर तीन-चार कहानियाँ ही मैं लिख पाया, पर लिखने की ललक बनी रही जिसने यह ग़ौर करनेवाली निगाह दी कि अच्छी कहानी में अच्छा क्या होता है, कहानियाँ कितने तरीक़ों से लिखी जाती हैं, वे कौन-कौन-सी युक्तियाँ हैं जिनसे विशिष्ट प्रभाव पैदा होते हैं, कोई सम्भावनाशाली कथा-विचार कैसे एक ख़राब कहानी में विकसित होता है और एक अति-साधारण कथा-विचार कैसे एक प्रभावशाली कहानी में ढल जाता है इत्यादि। लेकिन जब आप एक कहानीकार पर या किसी कथा-आन्दोलन पर समग्र रूप में टिप्पणी कर रहे होते हैं, तब ‘ज़ूम-आउट मोड’ में होने के कारण रचना-विशेष में इस्तेमाल की गई हिकमतों, आख्यान-तकनीकों, रचना के प्रभावशाली होने के अन्यान्य रहस्यों और इन सबके साथ जिनका परिपाक हुआ है, उन समय-समाज-सम्बन्धी सरोकारों के बारे में उस तरह से चर्चा नहीं हो पाती। कहीं समग्रता के आग्रह से विशिष्ट की विशिष्टता का उल्लेख टल जाता है तो कहीं साहित्यालोचन को प्रवृत्ति-निरूपक साहित्येतिहास का अनुषंगी बनना पड़ता है।
जब 'हंस' कथा मासिक की ओर से एक स्तम्भ शुरू करने का प्रस्ताव आया तो मैंने छूटते ही इस सदी की चुनिन्दा कहानियों पर लिखने की इच्छा जताई। मुझे लगा कि मैं जिन चीज़ों पर ग़ौर करता रहा हूँ, उनका सही इस्तेमाल करने का समय आ गया है। यह इस्तेमाल सर्वोत्तम न सही, द्वितियोत्तम यानी सेकंड बेस्ट तो कहा ही जा सकता है।
आगे जो लेख आप पढने जा रहे हैं, वे 'खरामा-खरामा' स्तम्भ की ही कड़ियाँ हैं। इन्हें इनके प्रकाशन-क्रम में ही इस संग्रह में भी रखा गया है। कई कड़ियाँ ऐसी हैं जो अपनी स्वतंत्र शृंखला बनाती हैं।
—भूमिका से Lambe-lambe antral par tin-char kahaniyan hi main likh paya, par likhne ki lalak bani rahi jisne ye gaur karnevali nigah di ki achchhi kahani mein achchha kya hota hai, kahaniyan kitne tariqon se likhi jati hain, ve kaun-kaun-si yuktiyan hain jinse vishisht prbhav paida hote hain, koi sambhavnashali katha-vichar kaise ek kharab kahani mein viksit hota hai aur ek ati-sadharan katha-vichar kaise ek prbhavshali kahani mein dhal jata hai ityadi. Lekin jab aap ek kahanikar par ya kisi katha-andolan par samagr rup mein tippni kar rahe hote hain, tab ‘zum-aut mod’ mein hone ke karan rachna-vishesh mein istemal ki gai hikamton, aakhyan-taknikon, rachna ke prbhavshali hone ke anyanya rahasyon aur in sabke saath jinka paripak hua hai, un samay-samaj-sambandhi sarokaron ke bare mein us tarah se charcha nahin ho pati. Kahin samagrta ke aagrah se vishisht ki vishishtta ka ullekh tal jata hai to kahin sahityalochan ko prvritti-nirupak sahityetihas ka anushangi banna padta hai. Jab hans katha masik ki or se ek stambh shuru karne ka prastav aaya to mainne chhutte hi is sadi ki chuninda kahaniyon par likhne ki ichchha jatai. Mujhe laga ki main jin chizon par gaur karta raha hun, unka sahi istemal karne ka samay aa gaya hai. Ye istemal sarvottam na sahi, dvitiyottam yani sekand best to kaha hi ja sakta hai.
Aage jo lekh aap padhne ja rahe hain, ve kharama-kharama stambh ki hi kadiyan hain. Inhen inke prkashan-kram mein hi is sangrah mein bhi rakha gaya hai. Kai kadiyan aisi hain jo apni svtantr shrinkhla banati hain.
—bhumika se