BackBack
-11%

Gobar Ganesh

Rs. 650 Rs. 579

‘‘...‘गोबरगणेश’ को पढ़ते हुए मुझे अपनी सुध-बुध बिसर गई। यह अनुभव मुझे सबसे प्रिय और सुखद होता है। जिस रचना से वह धन्यता मिले, उसे धन्य ही कह सकता हूँ। नहीं तो क्या!’’ —जैनेन्द्र कुमार ‘‘...‘गोबरगणेश’ इस बार कुमाऊँ यात्रा में साथ ले गया और वहीं उसे पूरा पढ़ आया।... Read More

BlackBlack
Description

‘‘...‘गोबरगणेश’ को पढ़ते हुए मुझे अपनी सुध-बुध बिसर गई। यह अनुभव मुझे सबसे प्रिय और सुखद होता है। जिस रचना से वह धन्यता मिले, उसे धन्य ही कह सकता हूँ। नहीं तो क्या!’’
—जैनेन्द्र कुमार
‘‘...‘गोबरगणेश’ इस बार कुमाऊँ यात्रा में साथ ले गया और वहीं उसे पूरा पढ़ आया। उपन्यास मुझे अच्छा लगा और उस परिवेश में उसे पढ़ना और भी अच्छा लगा। उससे कुछ ही पहले मनोहर श्याम जोशी का ‘कसप’ भी पढ़ा था। इसलिए कुमाऊँ का एक कंट्रास्टिंग चित्र भी सामने रहा। इससे पढ़ने में एक विशेष प्रकार का आनन्द आया। सोचता हूँ कि ‘गोबरगणेश’ के बारे में कुछ लिखूँ...’’
—अज्ञेय
‘‘...विनायक के अनेक दोस्त उपन्यास में अपनी अलग पहचान तो बनाते ही हैं, साथ ही उनके माध्यम से एक उत्तर-भारतीय क़स्बे के सामाजिक जीवन की अनेक परतें अपने बुनियादी अन्तर्विरोधों के साथ उद्घाटित हुई हैं, जिनकी बहुआयामिता सचमुच प्रभावी है।...‘गोबरगणेश’ की भाषा और दृष्टि में, विशेषकर पहले खंड में, बहुत दूर तक एक कवि-उपन्यासकार की संवेदना की छाप मिलती है। यह बात उसे हिन्दी कथाकारों की एक ख़ासी लम्बी और बड़ी परम्परा से जोड़ती है, जिसमें जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय, नरेश मेहता, धर्मवीर भारती, मुक्तिबोध आदि अनेक लोग हैं।...’’
—नेमिचन्द्र जैन (‘जनान्तिक’, पृ. 106-07)
‘‘...विनायक की यह दुनिया चार्ल्स डिकेंस के पिप या ओलीवर या डेविड कॉपरफिल्ड के बचपन की दुनिया है—काल्पनिक, पर अनुभूत; आत्यन्तिक, पर विश्वसनीय—इन्द्रधनुषी मानवीय ऊष्मा लिये, वास्तविक यथार्थ से कहीं ज़्यादा यथार्थ, कहीं ज़्यादा संवेद्य। इस दुनिया के अन्न-जल से पला-पुसा विनायक वास्तविक जीवन-समर में प्रवेश करते ही जटिलता की चट्टान से टकराकर बिखरने लगता है...’’
—मलयज (‘संवाद और एकालाप’, पृ. 27) ‘‘. . . ‘gobaragnesh’ ko padhte hue mujhe apni sudh-budh bisar gai. Ye anubhav mujhe sabse priy aur sukhad hota hai. Jis rachna se vah dhanyta mile, use dhanya hi kah sakta hun. Nahin to kya!’’—jainendr kumar
‘‘. . . ‘gobaragnesh’ is baar kumaun yatra mein saath le gaya aur vahin use pura padh aaya. Upanyas mujhe achchha laga aur us parivesh mein use padhna aur bhi achchha laga. Usse kuchh hi pahle manohar shyam joshi ka ‘kasap’ bhi padha tha. Isaliye kumaun ka ek kantrasting chitr bhi samne raha. Isse padhne mein ek vishesh prkar ka aanand aaya. Sochta hun ki ‘gobaragnesh’ ke bare mein kuchh likhun. . . ’’
—agyey
‘‘. . . Vinayak ke anek dost upanyas mein apni alag pahchan to banate hi hain, saath hi unke madhyam se ek uttar-bhartiy qasbe ke samajik jivan ki anek parten apne buniyadi antarvirodhon ke saath udghatit hui hain, jinki bahuayamita sachmuch prbhavi hai. . . . ‘gobaragnesh’ ki bhasha aur drishti mein, visheshkar pahle khand mein, bahut dur tak ek kavi-upanyaskar ki sanvedna ki chhap milti hai. Ye baat use hindi kathakaron ki ek khasi lambi aur badi parampra se jodti hai, jismen jayshankar prsad, agyey, naresh mehta, dharmvir bharti, muktibodh aadi anek log hain. . . . ’’
—nemichandr jain (‘janantik’, pri. 106-07)
‘‘. . . Vinayak ki ye duniya charls dikens ke pip ya olivar ya devid kauparphild ke bachpan ki duniya hai—kalpnik, par anubhut; aatyantik, par vishvasniy—indradhanushi manviy uushma liye, vastvik yatharth se kahin zyada yatharth, kahin zyada sanvedya. Is duniya ke ann-jal se pala-pusa vinayak vastvik jivan-samar mein prvesh karte hi jatilta ki chattan se takrakar bikharne lagta hai. . . ’’
—malyaj (‘sanvad aur ekalap’, pri. 27)