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Gairsarkari Sangthan

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भारत सहित पूरे संसार में ग़ैर-सरकारी संगठनों का एक आन्दोलन ही इन दिनों सक्रिय है। इस माध्यम से सजग नागरिकों के द्वारा अपने समुदाय और समाज के कल्याण के लिए कार्य करने में एक इतिहास ही रच दिया गया है। पर ग़ैर-सरकारी संगठन का निर्माण कर लेना जितना सरल है,... Read More

Description

भारत सहित पूरे संसार में ग़ैर-सरकारी संगठनों का एक आन्दोलन ही इन दिनों सक्रिय है। इस माध्यम से सजग नागरिकों के द्वारा अपने समुदाय और समाज के कल्याण के लिए कार्य करने में एक इतिहास ही रच दिया गया है।
पर ग़ैर-सरकारी संगठन का निर्माण कर लेना जितना सरल है, उसका निर्वाह करना उसकी तुलना में कहीं अधिक जटिल है। सामान्य तौर पर सरकारें ग़ैर-सरकारी संगठनों के साथ काम करने को उत्सुक रहती हैं, परन्तु भारत जैसे देश में नौकरशाही इनसे अप्रसन्न ही बनी रहती है। राजनैतिक प्रतिरोध भी कुछ कम नहीं होता।
तब भी एक बेहतर सोच लेकर चलनेवाले लोगों के लिए काम करने और नतीजे निकाल लाने की सम्भावना कुछ कम नहीं है। आख़िर वे कौन से तत्त्व हैं, जो एक समर्पित ग़ैर-सरकारी संगठन की वास्तविक पूँजी होते हैं। ऐसे ही सवालों से जूझती है यह पुस्तक। Bharat sahit pure sansar mein gair-sarkari sangathnon ka ek aandolan hi in dinon sakriy hai. Is madhyam se sajag nagarikon ke dvara apne samuday aur samaj ke kalyan ke liye karya karne mein ek itihas hi rach diya gaya hai. Par gair-sarkari sangthan ka nirman kar lena jitna saral hai, uska nirvah karna uski tulna mein kahin adhik jatil hai. Samanya taur par sarkaren gair-sarkari sangathnon ke saath kaam karne ko utsuk rahti hain, parantu bharat jaise desh mein naukarshahi inse aprsann hi bani rahti hai. Rajanaitik pratirodh bhi kuchh kam nahin hota.
Tab bhi ek behtar soch lekar chalnevale logon ke liye kaam karne aur natije nikal lane ki sambhavna kuchh kam nahin hai. Aakhir ve kaun se tattv hain, jo ek samarpit gair-sarkari sangthan ki vastvik punji hote hain. Aise hi savalon se jujhti hai ye pustak.