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Dilo-Danish

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हिन्दी जगत में अपनी अलग और विशिष्ट पहचान के लिए मशहूर कृष्णा सोबती का हरेक उपन्यास विशिष्ट है। शब्दों की आत्मा को छूने-टटोलने वाली कृष्णा जी ने ‘दिलो-दानिश’ में दिल्ली की एक पुरानी हवेली और उसमें रहनेवाले लोगों के माध्यम से तत्कालीन जीवन और समाज का जैसा चित्रण किया है,... Read More

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Description

हिन्दी जगत में अपनी अलग और विशिष्ट पहचान के लिए मशहूर कृष्णा सोबती का हरेक उपन्यास विशिष्ट है। शब्दों की आत्मा को छूने-टटोलने वाली कृष्णा जी ने ‘दिलो-दानिश’ में दिल्ली की एक पुरानी हवेली और उसमें रहनेवाले लोगों के माध्यम से तत्कालीन जीवन और समाज का जैसा चित्रण किया है, वह अनूठा है।
हालाँकि इस उपन्यास का कथानक एक सामन्ती हवेली और सामन्ती रईस समाज व्यवस्था से वाबस्ता है लेकिन कृष्णा जी के रचनात्मक कौशल का ही कमाल है कि उन्होंने उसकी अच्छाइयों और बुराइयों का तटस्थ आत्मीयता के साथ चित्रण किया है। देश की आज़ादी से पहले हमारे समाज में सामन्ती पारिवारिक व्यवस्था थी जिसमें रईसों की पत्नी के अलावा दूसरी कई स्त्रियों से सम्बन्ध भी मान्य थे, लेकिन इस उपन्यास का मुख्य पात्र कृपानारायण पत्नी के अलावा मात्र एक अन्य स्त्री से सम्बन्ध रखता है, लेकिन दोनों स्त्रियों और उनके बच्चों की परवरिश जिस नेकनीयति से करता है, वह क़ाबिले-तारीफ़ है।
प्रेम-मुहब्बत, सामाजिकता और जीवन के सुख-दु:ख की छोटी-बड़ी कथा-कहानियों का संगुम्फित विन्यास है— ‘दिलो-दानिश’, जिसे पाठक नई सज्जा में फिर से पढ़ना चाहेंगे, यह हमारा विश्वास है। Hindi jagat mein apni alag aur vishisht pahchan ke liye mashhur krishna sobti ka harek upanyas vishisht hai. Shabdon ki aatma ko chhune-tatolne vali krishna ji ne ‘dilo-danish’ mein dilli ki ek purani haveli aur usmen rahnevale logon ke madhyam se tatkalin jivan aur samaj ka jaisa chitran kiya hai, vah anutha hai. Halanki is upanyas ka kathanak ek samanti haveli aur samanti rais samaj vyvastha se vabasta hai lekin krishna ji ke rachnatmak kaushal ka hi kamal hai ki unhonne uski achchhaiyon aur buraiyon ka tatasth aatmiyta ke saath chitran kiya hai. Desh ki aazadi se pahle hamare samaj mein samanti parivarik vyvastha thi jismen raison ki patni ke alava dusri kai striyon se sambandh bhi manya the, lekin is upanyas ka mukhya patr kripanarayan patni ke alava matr ek anya stri se sambandh rakhta hai, lekin donon striyon aur unke bachchon ki paravrish jis nekniyati se karta hai, vah qabile-tarif hai.
Prem-muhabbat, samajikta aur jivan ke sukh-du:kha ki chhoti-badi katha-kahaniyon ka sangumphit vinyas hai— ‘dilo-danish’, jise pathak nai sajja mein phir se padhna chahenge, ye hamara vishvas hai.