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Dhara Ankurai

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प्रतिष्ठित कथाकार असगर वजाहत की उपन्यास-त्रयी का अन्तिम भाग 'धरा अँकुराई' एक बहुआयामी कथानक को जीवन की सच्चाइयों तक पहुँचाता है। ‘कैसी आगी लगाई’ और ‘बरखा रचाई’ शीर्षक से त्रयी के दो भाग पूर्व में प्रकाशित होकर पर्याप्त प्रशंसा प्राप्त कर चुके हैं। अनेक विवरणों, वृत्तान्तों, परिस्थितियों और अन्त:संघर्षों से... Read More

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Description

प्रतिष्ठित कथाकार असगर वजाहत की उपन्यास-त्रयी का अन्तिम भाग 'धरा अँकुराई' एक बहुआयामी कथानक को जीवन की सच्चाइयों तक पहुँचाता है। ‘कैसी आगी लगाई’ और ‘बरखा रचाई’ शीर्षक से त्रयी के दो भाग पूर्व में प्रकाशित होकर पर्याप्त प्रशंसा प्राप्त कर चुके हैं। अनेक विवरणों, वृत्तान्तों, परिस्थितियों और अन्त:संघर्षों से गुज़रती यह कथा-यात्रा ‘जीवन के अर्थ’ का आईना बन जाती है।
एक दीगर प्रसंग में आया वाक्य है, ‘...यह यात्रा संसार के हर आदमी को जीवन में एक बार तो करनी ही चाहिए।’ यह अन्त:यात्रा है। इससे व्यक्ति जहाँ पहुँचता है, वहाँ एक प्रश्न गूँज रहा है कि आख़‍िर इस जीवन की सार्थकता व प्रासंगिकता क्या है? उपन्यास-त्रयी के तीन प्रमुख पात्रों में से एक सैयद साजिद अली, जिन्होंने पत्रकारिता की कामयाब ज़‍िन्दगी जी है, महसूस करते हैं कि उनके भीतर एक ख़ालीपन फैलता जा रहा है। लगता है कि अब तक जिया सब बेमक़सद रहा। सैयद साजिद अली ‘ज़‍िन्दगी का अर्थ’ समझने के लिए उसी छोटी-सी जगह लौटते हैं, जहाँ से निकलकर वे जाने कहाँ-कहाँ गए थे।
उपन्यासकार ने छोटी-छोटी घटनाओं के ज़रिए व्यक्ति और समाज की कशमकश को शब्द दिए हैं। प्रवाहपूर्ण भाषा ने पठनीयता में इज़ाफ़ा किया है। मौक़े-ब-मौक़े उपन्यास में वर्तमान की समीक्षा भी है, ‘‘जनता का पैसा किसी का पैसा नहीं है। यह माले-मुफ़्त है जो हमारे देश में बेदर्दी से बहाया जाता है और इसकी बारिश में अफ़सर, नेता और ठेकेदार नहाते हैं। हमने लोकतंत्र के साथ-साथ ‘विकास’ का भी एक विरला स्वरूप विकसित किया है जो कम ही देशों में देखने को मिलेगा।’’
एक पठनीय व संग्रहणीय उपन्यास। Prtishthit kathakar asgar vajahat ki upanyas-tryi ka antim bhag dhara ankurai ek bahuayami kathanak ko jivan ki sachchaiyon tak pahunchata hai. ‘kaisi aagi lagai’ aur ‘barkha rachai’ shirshak se tryi ke do bhag purv mein prkashit hokar paryapt prshansa prapt kar chuke hain. Anek vivarnon, vrittanton, paristhitiyon aur ant:sangharshon se guzarti ye katha-yatra ‘jivan ke arth’ ka aaina ban jati hai. Ek digar prsang mein aaya vakya hai, ‘. . . Ye yatra sansar ke har aadmi ko jivan mein ek baar to karni hi chahiye. ’ ye ant:yatra hai. Isse vyakti jahan pahunchata hai, vahan ek prashn gunj raha hai ki aakh‍ir is jivan ki sarthakta va prasangikta kya hai? upanyas-tryi ke tin prmukh patron mein se ek saiyad sajid ali, jinhonne patrkarita ki kamyab za‍indagi ji hai, mahsus karte hain ki unke bhitar ek khalipan phailta ja raha hai. Lagta hai ki ab tak jiya sab bemaqsad raha. Saiyad sajid ali ‘za‍indagi ka arth’ samajhne ke liye usi chhoti-si jagah lautte hain, jahan se nikalkar ve jane kahan-kahan ge the.
Upanyaskar ne chhoti-chhoti ghatnaon ke zariye vyakti aur samaj ki kashamkash ko shabd diye hain. Prvahpurn bhasha ne pathniyta mein izafa kiya hai. Mauqe-ba-mauqe upanyas mein vartman ki samiksha bhi hai, ‘‘janta ka paisa kisi ka paisa nahin hai. Ye male-mupht hai jo hamare desh mein bedardi se bahaya jata hai aur iski barish mein afsar, neta aur thekedar nahate hain. Hamne loktantr ke sath-sath ‘vikas’ ka bhi ek virla svrup viksit kiya hai jo kam hi deshon mein dekhne ko milega. ’’
Ek pathniy va sangrahniy upanyas.