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आज के युग में जहाँ भ्रष्टाचार का बोलबाला हो, चरित्रहीनता पराकाष्ठा पर हो, अपने और पराये का भाव-बोध जड़ जमाए बैठा हो, चारों ओर ‘हाय पैसा, हाय पैसा’ की अफरा-तफरी मची हो, ऐसे माहौल में शान्तिपूर्वक जीवन बसर कर पाना किसी चुनौती से कम नहीं। बेला गुप्त भी सहज जीवन... Read More

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Description

आज के युग में जहाँ भ्रष्टाचार का बोलबाला हो, चरित्रहीनता पराकाष्ठा पर हो, अपने और पराये का भाव-बोध जड़ जमाए बैठा हो, चारों ओर ‘हाय पैसा, हाय पैसा’ की अफरा-तफरी मची हो, ऐसे माहौल में शान्तिपूर्वक जीवन बसर कर पाना किसी चुनौती से कम नहीं।
बेला गुप्त भी सहज जीवन जीना चाहती थी, लेकिन उनके साथ क्या हुआ? कई हादसों से गुज़रने के बावजूद वह टूटी नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य-पथ पर अग्रसर रही। लेकिन आज...?
आज वह टूट चुकी है। ईमानदारी, कार्य के प्रति निष्ठा—उसके लिए अब बेमानी हो चुकी है। जैसे सारी चीज़ों पर से उसका मोहभंग हो गया हो! और यही वजह है कि दूसरों के अपराधों को स्वीकार कर वह जेल-जीवन अपना लेती है।
‘दीर्घतपा’ फणीश्वरनाथ रेणु का एक मर्मस्पर्शी उपन्यास है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने जहाँ वीमेंस वेलफ़ेयर की आड़ में महिलाओं के यौन उत्पीड़न को उजागर किया है, वहीं सरकारी वस्तुओं की लूट-खसोट पर से पर्दा हटाया है। Aaj ke yug mein jahan bhrashtachar ka bolbala ho, charitrhinta parakashtha par ho, apne aur paraye ka bhav-bodh jad jamaye baitha ho, charon or ‘hay paisa, haay paisa’ ki aphra-taphri machi ho, aise mahaul mein shantipurvak jivan basar kar pana kisi chunauti se kam nahin. Bela gupt bhi sahaj jivan jina chahti thi, lekin unke saath kya hua? kai hadson se guzarne ke bavjud vah tuti nahin, balki apne kartavya-path par agrsar rahi. Lekin aaj. . . ?
Aaj vah tut chuki hai. Iimandari, karya ke prati nishtha—uske liye ab bemani ho chuki hai. Jaise sari chizon par se uska mohbhang ho gaya ho! aur yahi vajah hai ki dusron ke apradhon ko svikar kar vah jel-jivan apna leti hai.
‘dirghatpa’ phanishvarnath renu ka ek marmasparshi upanyas hai. Is upanyas ke madhyam se lekhak ne jahan vimens velfeyar ki aad mein mahilaon ke yaun utpidan ko ujagar kiya hai, vahin sarkari vastuon ki lut-khasot par se parda hataya hai.