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Corporate Media : Dalal Street

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राडिया कांड मीडिया की ताक़त और उसकी ख़ामी, दोनों को एक साथ दर्शाता है। ताक़त इस बात की कि मीडिया जनमत बना सकता है, जनमत को बदल सकता है, लोगों के सोचने के एजेंडे तय करता है और ख़ामी यह कि मीडिया पैसों के आगे किसी बात की परवाह नहीं... Read More

Description

राडिया कांड मीडिया की ताक़त और उसकी ख़ामी, दोनों को एक साथ दर्शाता है। ताक़त इस बात की कि मीडिया जनमत बना सकता है, जनमत को बदल सकता है, लोगों के सोचने के एजेंडे तय करता है और ख़ामी यह कि मीडिया पैसों के आगे किसी बात की परवाह नहीं करता। मीडिया को पैसेवाले पैसा कमाने के लिए और ताक़त के लिए चलाते हैं। इसलिए इसके दुरुपयोग की आशंका इसकी संरचना और स्वामित्व के ढाँचे में ही दर्ज है।
राडिया कांड से यह ज़गज़ाहिर हो गया कि ख़ासकर ऊँचे पदों पर मौजूद मीडियाकर्मी पैसे और प्रभाव के इस खेल में हिस्सेदार बन चुके हैं। पिछले 20 वर्षों में मीडियाकर्मियों के मालिक बनने की प्रक्रिया भी तेज़ हुई है। कुछ सम्पादक तो मालिक बन ही गए हैं। इसके अलावा भी मीडिया संस्थानों में मध्यम स्तर पर काम करनेवाले पत्रकारों तक को कम्पनी के शेयर दिए जाते हैं। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह पत्रकार ही क्यों न हो, उस कम्पनी या उस व्यवसाय के विरुद्ध काम क्यों करेगा जिसमें उसके शेयर हों? इस तरह पत्रकारों की प्रतिबद्धता को नए ढंग से परिभाषित कर दिया जाता है। पत्रकारों का ईमानदार या बेईमान होना अब उनकी निजी पसन्द का ही मामला नहीं रहा। कोई पत्रकार अपनी मर्ज़ी से ईमानदार नहीं रह सकता। यह बात कई लोगों को तकलीफ़देह लग सकती है। राडिया कांड ने मीडिया को सचमुच गहरे ज़ख़्म दिए हैं।
—इसी पुस्तक से Radiya kand midiya ki taqat aur uski khami, donon ko ek saath darshata hai. Taqat is baat ki ki midiya janmat bana sakta hai, janmat ko badal sakta hai, logon ke sochne ke ejende tay karta hai aur khami ye ki midiya paison ke aage kisi baat ki parvah nahin karta. Midiya ko paisevale paisa kamane ke liye aur taqat ke liye chalate hain. Isaliye iske durupyog ki aashanka iski sanrachna aur svamitv ke dhanche mein hi darj hai. Radiya kand se ye zagzahir ho gaya ki khaskar uunche padon par maujud midiyakarmi paise aur prbhav ke is khel mein hissedar ban chuke hain. Pichhle 20 varshon mein midiyakarmiyon ke malik banne ki prakriya bhi tez hui hai. Kuchh sampadak to malik ban hi ge hain. Iske alava bhi midiya sansthanon mein madhyam star par kaam karnevale patrkaron tak ko kampni ke sheyar diye jate hain. Koi bhi vyakti, chahe vah patrkar hi kyon na ho, us kampni ya us vyavsay ke viruddh kaam kyon karega jismen uske sheyar hon? is tarah patrkaron ki pratibaddhta ko ne dhang se paribhashit kar diya jata hai. Patrkaron ka iimandar ya beiman hona ab unki niji pasand ka hi mamla nahin raha. Koi patrkar apni marzi se iimandar nahin rah sakta. Ye baat kai logon ko taklifdeh lag sakti hai. Radiya kand ne midiya ko sachmuch gahre zakhm diye hain.
—isi pustak se