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Basanti

Bhishma Sahni

Rs. 199 Rs. 177

Rajkamal Prakashan

‘झरोखे’, ‘कड़ियाँ’ और ‘तमस’ जैसे तीन विभिन्न आयामी उपन्यासों के बाद ‘बसन्ती’ का आना भीष्म साहनी के निर्बंध कथाकार की एक और सृजनात्मक उपलब्धि है। इस उपन्यास में एक ऐसी लड़की का चित्रण है जो मेहनत-मज़दूरी करने के लिए महानगर में आए ग्रामीण परिवार की कठिनाइयों के साथ-साथ बड़ी होती... Read More

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Description

‘झरोखे’, ‘कड़ियाँ’ और ‘तमस’ जैसे तीन विभिन्न आयामी उपन्यासों के बाद ‘बसन्ती’ का आना भीष्म साहनी के निर्बंध कथाकार की एक और सृजनात्मक उपलब्धि है। इस उपन्यास में एक ऐसी लड़की का चित्रण है जो मेहनत-मज़दूरी करने के लिए महानगर में आए ग्रामीण परिवार की कठिनाइयों के साथ-साथ बड़ी होती है; और निरन्तर ‘बड़ी’ होती जाती है।
दिल्ली जैसे महानगर में नए-नए सेक्टर और कॉलोनियाँ उठानेवालों की आए दिन टूटती झुग्गी-बस्तियों में टूटते ग़रीब लोगों, रिश्ते-नातों, सपनों और घरौंदों के बीच मात्र बसन्ती ही है जो साबुत नज़र आती है। वह अपने परिवार, परिवेश और परम्परागत नैतिकता से विद्रोह करती है। यह विद्रोह उसे दैहिक और मानसिक शोषण तक ले जाता है, पर उसकी निजता को कोई हादसा तोड़ नहीं पाता। प्रेमिका और ‘पत्नी’ के रूप में कठिन-से-कठिन हालात को ‘तो क्या बीबी जी’ कहकर उड़ाने और खिलखिलाने में ही जैसे बसन्ती की सार्थकता है। दूसरे शब्दों में वह एक जीती-जागती जिजीविषा है।
यह उपन्यास महानगरीय जीवन की खोखली चमक-दमक और ठोस अँधेरी खाइयों के बीच भटकती ‘बसन्ती’ जैसी एक पूरी पीढ़ी का शायद पहली बार प्रभावी चरित्रांकन प्रस्तुत
करता है। ‘jharokhe’, ‘kadiyan’ aur ‘tamas’ jaise tin vibhinn aayami upanyason ke baad ‘basanti’ ka aana bhishm sahni ke nirbandh kathakar ki ek aur srijnatmak uplabdhi hai. Is upanyas mein ek aisi ladki ka chitran hai jo mehnat-mazduri karne ke liye mahangar mein aae gramin parivar ki kathinaiyon ke sath-sath badi hoti hai; aur nirantar ‘badi’ hoti jati hai. Dilli jaise mahangar mein ne-ne sektar aur kauloniyan uthanevalon ki aae din tutti jhuggi-bastiyon mein tutte garib logon, rishte-naton, sapnon aur gharaundon ke bich matr basanti hi hai jo sabut nazar aati hai. Vah apne parivar, parivesh aur parampragat naitikta se vidroh karti hai. Ye vidroh use daihik aur mansik shoshan tak le jata hai, par uski nijta ko koi hadsa tod nahin pata. Premika aur ‘patni’ ke rup mein kathin-se-kathin halat ko ‘to kya bibi ji’ kahkar udane aur khilakhilane mein hi jaise basanti ki sarthakta hai. Dusre shabdon mein vah ek jiti-jagti jijivisha hai.
Ye upanyas mahanagriy jivan ki khokhli chamak-damak aur thos andheri khaiyon ke bich bhatakti ‘basanti’ jaisi ek puri pidhi ka shayad pahli baar prbhavi charitrankan prastut
Karta hai.