BackBack

Baramasi

Gyan Chaturvedi

Rs. 695

Rajkamal Prakashan

ज्ञान चतुर्वेदी ने परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्रनाथ त्यागी और श्रीलाल शुक्ल की व्यंग्य-परम्परा को न केवल आगे बढ़ाया है, वरन् कई अर्थों में उसे और समृद्ध किया है। विषय-वैभिन्नय तथा भाषा और शैलीगत प्रयोगों के लिए वे हिन्दी व्यंग्य में ‘हमेशा ही कुछ नया करने को आतुर’ लेखक के रूप... Read More

BlackBlack
Description

ज्ञान चतुर्वेदी ने परसाई, शरद जोशी, रवीन्द्रनाथ त्यागी और श्रीलाल शुक्ल की व्यंग्य-परम्परा को न केवल आगे बढ़ाया है, वरन् कई अर्थों में उसे और समृद्ध किया है। विषय-वैभिन्नय तथा भाषा और शैलीगत प्रयोगों के लिए वे हिन्दी व्यंग्य में ‘हमेशा ही कुछ नया करने को आतुर’ लेखक के रूप में विख्यात हैं। लकीर पीटने के वे सख़्त खिलाफ हैं–चाहे वह स्वयं उनकी अपनी खींची हुई ही क्यों न हो !
‘बारामासी’ बुन्देलखंड के एक छोटे से कस्बे के, एक छोटे से आँगन में पल रहे छोटे-छोटे स्वप्नों की कथा है–वे स्वप्न, जो टूटने के लिए ही देखे जाते हैं और टूटने के बाद तथा बावजूद देखे जाते हैं। स्वप्न देखने की अजीब उत्कंठा तथा उन्हें साकार करने के प्रति धुँधली सोच और फिर-फिर उन्हीं स्वप्नों को देखते जाने का हठ–कथा न केवल इनके आसपास घूमती हुई मानवीय सम्बन्धों, पारम्परिक शादी-ब्याह की रस्मों, सडक़छाप कस्बाई प्यार, भारतीय कस्बों की शिक्षा-पद्धति, बेरोजगारी, माँ-बच्चों के बीच के स्नेहिल पल तथा भारतीय मध्यवर्गीय परिवार के जीवन-व्यापार को उसके सम्पूर्ण कलेवर में उसकी समस्त विडम्बनाओं-विसंगतियों के साथ पकड़ती है, साथ ही बुन्देलखंडी परिवेश के श्वास-श्वास में स्पन्दित होते सहज हास्य-व्यंग्य को भी समेटती चलती है। Gyan chaturvedi ne parsai, sharad joshi, ravindrnath tyagi aur shrilal shukl ki vyangya-parampra ko na keval aage badhaya hai, varan kai arthon mein use aur samriddh kiya hai. Vishay-vaibhinnay tatha bhasha aur shailigat pryogon ke liye ve hindi vyangya mein ‘hamesha hi kuchh naya karne ko aatur’ lekhak ke rup mein vikhyat hain. Lakir pitne ke ve sakht khilaph hain–chahe vah svayan unki apni khinchi hui hi kyon na ho !‘baramasi’ bundelkhand ke ek chhote se kasbe ke, ek chhote se aangan mein pal rahe chhote-chhote svapnon ki katha hai–ve svapn, jo tutne ke liye hi dekhe jate hain aur tutne ke baad tatha bavjud dekhe jate hain. Svapn dekhne ki ajib utkantha tatha unhen sakar karne ke prati dhundhali soch aur phir-phir unhin svapnon ko dekhte jane ka hath–katha na keval inke aaspas ghumti hui manviy sambandhon, paramprik shadi-byah ki rasmon, sadaqchhap kasbai pyar, bhartiy kasbon ki shiksha-paddhati, berojgari, man-bachchon ke bich ke snehil pal tatha bhartiy madhyvargiy parivar ke jivan-vyapar ko uske sampurn kalevar mein uski samast vidambnaon-visangatiyon ke saath pakadti hai, saath hi bundelkhandi parivesh ke shvas-shvas mein spandit hote sahaj hasya-vyangya ko bhi sametti chalti hai.