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Bandi Jeevan Aur Anya Kavitayen

Rs. 175

कई महीनों से इन कविताओं की पाण्डुलिपि मुझे लगातार अपने वादे की याद दिलाती हुई मेरे पास थी कि मुझे भूमिका के रूप में कुछ लिखना है। इस दौरान मैंने कई विषयों पर लिखा है, लेकिन यह भूमिका लिखना मेरे लिए अजीब तरह से मुश्किल रहा। मैं कविता का निर्णायक... Read More

Description

कई महीनों से इन कविताओं की पाण्डुलिपि मुझे लगातार अपने वादे की याद दिलाती हुई मेरे पास थी कि मुझे भूमिका के रूप में कुछ लिखना है। इस दौरान मैंने कई विषयों पर लिखा है, लेकिन यह भूमिका लिखना मेरे लिए अजीब तरह से मुश्किल रहा। मैं कविता का निर्णायक अथवा आलोचक नहीं हूँ, इसलिए कुछ हिचकिचाहट थी। लेकिन मैं कविता से प्यार करता हूँ और इन छोटी कविताओं में से कई ने मुझे बहुत प्रभावित किया। वे मेरी स्मृति में अटक गईं और उन्होंने मेरे जेल-जीवन की यादें ताज़ा कर दीं—और उस अजीब और भुतही दुनिया की भी, जिसमें समाज द्वारा अपराधी मानकर बहिष्कृत लोग अपनी तंग और सीमित ज़‍िन्दगी को प्यार करते थे। वहाँ हत्यारे थे, डाकू और चोर भी थे, लेकिन हम सब जेल की उस दु:ख-भरी दुनिया में साथ-साथ थे, हमारे बीच एक जज़्बाती रिश्ता था। अपनी एकाकी कोठरियों में ही हम चहलक़दमी करते—पाँच नपे-तुले क़दम इस तरफ़ और पाँच नपे-तुले क़दम वापस, और दु:ख से संवाद करते रहते। दोस्त-अहबाब और आसरा ख़यालों में ही मिलता और कल्पना के जादुई कालीन पर ही हम अपने माहौल से उड़ पाते। हम दोहरी ज़‍िन्दगी जी रहे थे—जेल की ज़ेरेहुक्म और तंग, बन्द और वर्जित ज़‍िन्दगी और जज़्बात की, अपने सपनों और कल्पनाओं, उम्मीदों और अरमानों की आज़ाद दुनिया। उन सपनों का बहुत-सा इन कविताओं में है, उस ललक का जब बाँहें उसके लिए फैलती हैं जो नहीं है और एक ख़ालीपन हाथ आता है। कुछ वह शान्ति और तसल्ली जिन्हें हम उस दु:ख-भरी दुनिया में भी किसी तरह पा लेते थे। कल की उम्मीद हमेशा थी, कल जो शायद हमें आज़ादी दे। इसलिए मैं इन कविताओं को पढ़ने की सलाह देता हूँ और शायद वे मेरी ही तरह दूसरों को भी प्रभावित करेंगी।
—जवाहरलाल नेहरू Kai mahinon se in kavitaon ki pandulipi mujhe lagatar apne vade ki yaad dilati hui mere paas thi ki mujhe bhumika ke rup mein kuchh likhna hai. Is dauran mainne kai vishyon par likha hai, lekin ye bhumika likhna mere liye ajib tarah se mushkil raha. Main kavita ka nirnayak athva aalochak nahin hun, isaliye kuchh hichakichahat thi. Lekin main kavita se pyar karta hun aur in chhoti kavitaon mein se kai ne mujhe bahut prbhavit kiya. Ve meri smriti mein atak gain aur unhonne mere jel-jivan ki yaden taza kar din—aur us ajib aur bhuthi duniya ki bhi, jismen samaj dvara apradhi mankar bahishkrit log apni tang aur simit za‍indagi ko pyar karte the. Vahan hatyare the, daku aur chor bhi the, lekin hum sab jel ki us du:kha-bhari duniya mein sath-sath the, hamare bich ek jazbati rishta tha. Apni ekaki kothariyon mein hi hum chahalaqadmi karte—panch nape-tule qadam is taraf aur panch nape-tule qadam vapas, aur du:kha se sanvad karte rahte. Dost-ahbab aur aasra khayalon mein hi milta aur kalpna ke jadui kalin par hi hum apne mahaul se ud pate. Hum dohri za‍indagi ji rahe the—jel ki zerehukm aur tang, band aur varjit za‍indagi aur jazbat ki, apne sapnon aur kalpnaon, ummidon aur armanon ki aazad duniya. Un sapnon ka bahut-sa in kavitaon mein hai, us lalak ka jab banhen uske liye phailti hain jo nahin hai aur ek khalipan hath aata hai. Kuchh vah shanti aur tasalli jinhen hum us du:kha-bhari duniya mein bhi kisi tarah pa lete the. Kal ki ummid hamesha thi, kal jo shayad hamein aazadi de. Isaliye main in kavitaon ko padhne ki salah deta hun aur shayad ve meri hi tarah dusron ko bhi prbhavit karengi. —javaharlal nehru