BackBack

Ahinsa Ki Sanskriti : Aadhar Aur Aayam

Rs. 395

'हम भयावह रूप से हिंसक समय में रह रहे हैं। हिंसा, हत्या, आतंक, मारपीट, असहिष्णुता, घृणा आदि भीषण दुर्भाग्य से एक नई नागरिक शैली ही बन गए हैं। असहमति की जगह समाज और सार्वजनिक संवाद में तेज़ी से सिकुड़ रही है। हमारे युग में अहिंसा के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रयोक्ता... Read More

Description

'हम भयावह रूप से हिंसक समय में रह रहे हैं। हिंसा, हत्या, आतंक, मारपीट, असहिष्णुता, घृणा आदि भीषण दुर्भाग्य से एक नई नागरिक शैली ही बन गए हैं। असहमति की जगह समाज और सार्वजनिक संवाद में तेज़ी से सिकुड़ रही है। हमारे युग में अहिंसा के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रयोक्ता महात्मा गाँधी का 150वाँ वर्ष हमने हाल ही में मनाया है। रज़ा निजी रूप से गाँधी जी से बहुत प्रभावित थे। ‘रज़ा पुस्तक माला’ के अन्तर्गत हम गाँधी-दृष्टि, जीवन और विचार से सम्बन्धित सामग्री नियमित रूप से प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। नन्दकिशोर आचार्य ने एक बौद्धिक के रूप में अहिंसा पर लम्बे अरसे से बहुत महत्त्वपूर्ण काम किया है। एक ऐसे दौर में जब भारत में क्षुद्र वीरता और नीच हिंसा को अहिंसा से बेहतर बताया जा रहा है और संस्कृति के नाम पर अनेक कदाचार रोज़ हो रहे हैं, अहिंसा की संस्कृति को समझने और उस पर इसरार करने का विशेष महत्त्व है।’’ —अशोक वाजपेयी Hum bhayavah rup se hinsak samay mein rah rahe hain. Hinsa, hatya, aatank, marpit, ashishnuta, ghrina aadi bhishan durbhagya se ek nai nagrik shaili hi ban ge hain. Asahamati ki jagah samaj aur sarvajnik sanvad mein tezi se sikud rahi hai. Hamare yug mein ahinsa ke sabse bade sarvajnik pryokta mahatma gandhi ka 150van varsh hamne haal hi mein manaya hai. Raza niji rup se gandhi ji se bahut prbhavit the. ‘raza pustak mala’ ke antargat hum gandhi-drishti, jivan aur vichar se sambandhit samagri niymit rup se prastut karne ke liye pratibaddh hain. Nandakishor aacharya ne ek bauddhik ke rup mein ahinsa par lambe arse se bahut mahattvpurn kaam kiya hai. Ek aise daur mein jab bharat mein kshudr virta aur nich hinsa ko ahinsa se behtar bataya ja raha hai aur sanskriti ke naam par anek kadachar roz ho rahe hain, ahinsa ki sanskriti ko samajhne aur us par israr karne ka vishesh mahattv hai. ’’ —ashok vajpeyi