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Reeti Kavya Ki Bhumika
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राजनीतिक परिस्थिति आज पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा किया हुआ हिन्दी-साहित्य का काल-विभाजन प्रायः सर्वमान्य-सा ही हो गया है। और वास्तव में सर्वथा निर्दोष न होते हुए भी, वह बहुत कुछ संगत तथा विवेकपूर्ण है। उसके अनुसार रीतिकाल के अन्तर्गत सं. 1700 से सं. 1900 तक पूरी दो शताब्दियाँ आ जाती हैं। सम्वत् 1700 से 1900 तक भारत का राजनीतिक इतिहास चरम उत्कर्ष को प्राप्त मुग़ल साम्राज्य की अवनति के आरम्भ और फिर क्रमशः उसके पूर्ण विनाश का इतिहास है। सं. 1700 में भारत के सिंहासन पर सम्राट् शाहजहाँ आसीन था। मुग़ल वैभव अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँच चुका था जहाँगीर ने जो साम्राज्य छोड़ा था, शाहजहाँ ने उसकी और भी श्रीवृद्धि एवं विकास कर लिया था। दक्षिण में अहमदनगर, गोलकुण्डा और बीजापुर-राज्यों ने मुग़लों का आधिपत्य स्वीकार कर लिया था, और उत्तर-पश्चिम में सं. 1695 में कन्धार का क़िला मुगलों के हाथ आ गया था। अब्दुल हमीद लाहौरी के अनुसार उसका साम्राज्य सिन्ध के लहिरी बन्दरगाह से लेकर आसाम में सिलहट तक और अफ़ग़ान-प्रदेश के बिस्त के क़िले से लेकर दक्षिण में औसा तक फैला हुआ था। उसमें 22 सूबे थे, जिनकी आमदनी 880 करोड़ दाम अथवा 22 करोड़ रुपया थी। देश में अखण्ड शान्ति थी; खज़ाना मालामाल था। हिन्दुस्तान की कला अपने चरम वैभव पर थी। मयूर-सिंहासन और ताजमहल का निर्माण हो चुका था। परन्तु उत्कर्ष के चरम विन्दु पर पहुँचने के उपरान्त यहीं से अपकर्ष का भी आरम्भ हो गया था। अप्रतिहत मुग़ल वाहिनी पश्चिमोत्तर प्रान्तों में लगातार तीन बार पराजित हुई-मध्य एशिया के आक्रमण बुरी तरह विफल हुए। इन विफलताओं से न केवल धन-जन की हानि हुई वरन् मुग़ल साम्राज्य की प्रतिष्ठा को भी भारी धक्का लगा। उधर दक्षिण में भी उपद्रव आरम्भ हो गये थे। बाहर से यद्यपि हिन्दुस्तान सम्पन्न और शक्तिशाली दिखायी देता था, परन्तु उसके अन्तस्तल में अज्ञात रूप से क्षय के बीज जड़ पकड़ रहे थे। जहाँगीर की मस्ती और शाहजहाँ
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