Pargrahi
Item Weight | 343 Grams |
ISBN | 978-8177213614 |
Author | Ramesh Chandra Sharma |
Language | Hindi |
Publisher | Prabhat Prakashan |
Book Type | Hardbound |
Publishing year | 2018 |
Edition | 1st |

Pargrahi
विज्ञान का मनमोहक नाम इक्कीसवीं सदी की चर्चाओं में इतना अधिक प्रभावी हो गया है कि साहित्यकार इसके प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता। इसका असर इस उपन्यास में नजर आएगा। सत्य और सौंदर्य की तलाश में नायक, चित्रकार अभय अंतरिक्ष और आसमान के उस पार 'एल्यिंज'—परग्रहियों के होने के विश्वास में उनके चित्र बनाता है। उसकी सोच में इंद्र के अखाड़े की अप्सराएँ आ जाती हैं। इस सोच की गहराई में वह इस कदर डूब जाता है कि अपने अस्तित्व की सच्चाई का ध्यान आते हुए भी उसे चमत्कार से कम नहीं समझता। अपने अतीत, असंतोष से भी छुटकारा पा लेता है। चाँद, तारों और मंगल आदि ग्रहों पर प्राणियों के होने या न होने की अनिश्चितता, पृथ्वी के बीच पनपी दुर्दशा की समस्या का समाधान उसके दिल और दिमाग को झकझोर कर रख देता है। इस उपन्यास में कई जगह घटनाक्रम तथा समय के अनुकूल उर्दू के शायरों के शेर तथा हिंदी कविताओं के कुछ अंश कथानक की रोचकता बढ़ाते हैं। उपन्यास का नायक अंतर्विरोध के चक्रव्यूह से बाहर कैसे निकलता है, यह भी इस कथा की खूबी है।अज्ञात, परंतु अत्यंत रुचि के विषय 'एलियन' यानी परग्रही को केंद्र में रखकर लिखा गया पठनीय उपन्यास__________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________________अनुक्रमविषय प्रवेश—51. सितारों से पू���िए—112. गगन-धरा के प्रणय मिलन—183. दोनों हैं आमने-सामने—334. वैदिक कालीन पौराणिक कथा —465. अग्निहोत्री की उपज संसार—506. धरती को आकाश पुकारे—527. पुरानी दिनचर्या, नई लगन—588. दूरियाँ अब कैसी?—719. कला की सार्थकता—7910. इसरार में प्यार भी है—8211. प्रकृति के रंगमंच पर—8612. अंतर्दृष्टि के स्वप्न—9113. यादों की मार्मिक अभिव्यति—9914. गंगा गई या?—11815. इच्छाशति—13316. सहारा सपनों का—14617. बातें हैं, बातों का या?—15018. वे यों नहीं आते?—15819. ये मंजिलें कुछ कम नहीं!—17220. तुम रहे न तुम—18021. दर्द के मारों को हमदर्द चाहिए—19022. पुरानी दास्तान नए अंजाम—20523. दुविधा के स्वर—222
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