{"product_id":"offline-bachpan-ke-qisse-ऑफ़लाइन-बचपन-के-क़िस्से","title":"Offline Bachpan Ke Qisse | ऑफ़लाइन बचपन के क़िस्से","description":"\u003cspan style=\"color: #0f1111; font-family: 'Amazon Ember', Arial, sans-serif;\"\u003e‘ऑफ़लाइन बचपन के क़िस्से’ एक पूरी पीढ़ी की साँस है। उस पीढ़ी की, जिसने मिट्टी की गंध में सपने बुने, रेडियो की आवाज़ में दुनिया सुनी और गली की धूल में अपना बचपन गढ़ा। ये क़िस्से नायकत्व के नहीं, साधारणता के हैं। आज के समय में, जब बचपन स्क्रीन की चमक में सिमट चुका है और रिश्ते सूचनाओं की तेज़ी में छिटक जाते हैं, यह पुस्तक एक विलोम-प्रतीक बनकर सामने आती है। जेन ज़ी, इन पृष्ठों में अपने से पहले की दुनिया की नब्ज़ छू सकते हैं। किताब उनकी तेज़-रफ़्तार दुनिया में ठहराव का निमंत्रण देती है। बताती है कि उनके माता-पिता या दादा-दादी का बचपन कैसा था, कैसे एक पत्र का इंतज़ार महीनों तक चलता था, कैसे एक फ़िल्म देखने के लिए अनुमति और पैसे दोनों जुटाने पड़ते थे। यह किताब एक पुल है की तरह है, यहाँ कल की मिट्टी और आज की तकनीक एक-दूसरे से बात कर सकती हैं।\u003c\/span\u003e","brand":"Vera Prakashan","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":50333352263917,"sku":null,"price":195.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/files\/2WAjbsWXWD.jpg?v=1784984916","url":"https:\/\/rekhtabooks.com\/hi\/products\/offline-bachpan-ke-qisse-%e0%a4%91%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%aa%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%bc%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a5%87","provider":"Rekhta Books","version":"1.0","type":"link"}