Mera Kaha Hua Hindi
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| Item Weight | 500 Grams |
| ISBN | 978-81-180012-8-7 |
| Author | Shariq Kaifi |
| Language | Hindi |
| Publisher | Rekhta Publications |
| Pages | 450 |
| Publishing year | 2026 |
| Edition | 1st |
| Item Weight | 500 Grams |
| Country of Origin | India |
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About The Book:"मेरा कहा हुआ’ शारिक़ कैफ़ी की ग़ज़लों और नज़्मों का संपूर्ण संग्रह है, जिसमें 1978 से 2025 तक की उनकी रचनाएँ शामिल हैं। उनका शेर कहने का अपना अलग अंदाज़ है। वो जानी-पहचानी बातों को भी इस तरह शेरी पेराए में ढालते हैं कि उनका एक नया अर्थ खुलने लगता है। उनके यहाँ प्रेम, दोस्ती, बेवफ़ाई, नाराज़गी, रिश्तों का दिखावा और उनके बिखरने का दुख, सब कुछ सहज भाषा में सामने आता है। उनके शेर अक्सर अपने दूसरे मिसरे में ऐसा मोड़ लेते हैं कि पाठक ठहरकर उस बात पर फिर से सोचने लगता है। शारिक़ कैफ़ी की ख़ासियत ये है कि वे बड़े-बड़े दावों के बजाय छोटी छोटी घटनाओं और आम इंसानी अनुभवों से अपनी शाइरी की दुनिया बनाते हैं। किसी बीमार बुज़ुर्ग की शिकायत, किसी को विदा करने के बाद लौटता हुआ मुसाफ़िर, घर से अजनबी हो चुका इंसान या बदलते समय में खोती हुई पुरानी तहज़ीब—उनकी शाइरी में ये सब जीवन की गहरी सच्चाइयों के रूप में सामने आते हैं। उनके कलाम में ज़िन्दगी के रिश्तों, सामाजिक तौर-तरीक़ों और बदलते माहौल की झलक भी मिलती है। ‘मेरा कहा हुआ’ सिर्फ़ एक शाइर के लंबे रचनात्मक सफ़र का संग्रह नहीं, बल्कि उन अनुभवों और भावनाओं की दुनिया है जिन्हें अक्सर बयान नहीं किया जाता। ये किताब पाठक को अपनी ज़िन्दगी, अपने रिश्तों और अपने समय को एक नई नज़र से देखने का मौक़ा देती है।"
About The Author:शारिक़ कैफ़ी (सय्यद शारिक़ हुसैन) का जन्म 1 जून 1961 को बरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने बरेली से बी.एससी. और उर्दू में एम.ए. किया। उनके पिता कैफ़ी विज्दानी (सय्यद रफ़ाक़त हुसैन) जाने-माने शाइर थे। इस तरह शाइरी उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली। उनका पहला ग़ज़ल-संग्रह आम-सा रद्द-ए-अमल 1989 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद 2008 में यहाँ तक रौशनी आती कहाँ थी और 2010 में नज़्मों का संग्रह अपने तमाशे का टिकट प्रकाशित हुआ। शारिक़ कैफ़ी की शाइरी अपने अलग अंदाज़ और गहरी बातों के लिए जानी जाती है। उनकी ग़ज़लें और नज़्में रिवायती शाइरी से अलग हैं। वो रोज़मर्रा की ज़िन्दगी और इंसानी रिश्तों को नए नज़रिए से देखते हैं। उनकी शाइरी में प्यार, दोस्ती, बेवफ़ाई, दुश्मनी, इनकार और इक़रार जैसे कई रंग देखने को मिलते हैं। वे रिश्तों में छिपी सच्चाई, दिखावे और दूरियों को बड़ी सहजता से सामने लाते हैं। उनकी भाषा सादी है, लेकिन उनकी बातें गहरा असर छोड़ती हैं। यही खूबी शारिक़ कैफ़ी को अपने दौर के दूसरे शाइरों से अलग पहचान देती है।
About The Author:शारिक़ कैफ़ी (सय्यद शारिक़ हुसैन) का जन्म 1 जून 1961 को बरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ। उन्होंने बरेली से बी.एससी. और उर्दू में एम.ए. किया। उनके पिता कैफ़ी विज्दानी (सय्यद रफ़ाक़त हुसैन) जाने-माने शाइर थे। इस तरह शाइरी उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली। उनका पहला ग़ज़ल-संग्रह आम-सा रद्द-ए-अमल 1989 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद 2008 में यहाँ तक रौशनी आती कहाँ थी और 2010 में नज़्मों का संग्रह अपने तमाशे का टिकट प्रकाशित हुआ। शारिक़ कैफ़ी की शाइरी अपने अलग अंदाज़ और गहरी बातों के लिए जानी जाती है। उनकी ग़ज़लें और नज़्में रिवायती शाइरी से अलग हैं। वो रोज़मर्रा की ज़िन्दगी और इंसानी रिश्तों को नए नज़रिए से देखते हैं। उनकी शाइरी में प्यार, दोस्ती, बेवफ़ाई, दुश्मनी, इनकार और इक़रार जैसे कई रंग देखने को मिलते हैं। वे रिश्तों में छिपी सच्चाई, दिखावे और दूरियों को बड़ी सहजता से सामने लाते हैं। उनकी भाषा सादी है, लेकिन उनकी बातें गहरा असर छोड़ती हैं। यही खूबी शारिक़ कैफ़ी को अपने दौर के दूसरे शाइरों से अलग पहचान देती है।
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