JO ABHI KHOI NAHIN (POETRY)
ISBN | NA |
Language | Hindi |
Publisher | Bodhi Prakashan |
Pages | - |
Dimensions | NA |
Edition | 1st |

JO ABHI KHOI NAHIN (POETRY)
गोविन्द माथुर का कवि अपने समय में घिरे हुए विसंगतियों के बीच स्थित है। वह उन विसंगतियों की विदू्रपताओं का चित्र खींचता है और रेखांकित करता है कि कुछ महत्वपूर्ण जीने लायक स्थितियाँ या वस्तुएँ बची भी हैं। बची हुई भी तेजी से विलुप्त होती जा रही हैं। कवि-संवेदना की मूल यातना यही है। गोविन्द माथुर का शिल्प विशिष्ट है। वे उन दुर्लभ कवियों में हैं जिनके ऊपर मुझे किसी अन्य कवि का प्रभाव दिखाई नहीं पड़ा। उनका अंदाजे बयां अपना है। वे आसपास की घटनाओं और स्थितियों को बिना छेड़े सहज रूप से ऐसा संयोजित करते हैं कि आखिर पंक्ति तक पहुँचते-पहुँचते पाठक उन परिचित स्थितियों से कुछ नया, अभूतपूर्व पा लेता है। गोविन्द माथुर का यह लगभग निजी शिल्प निहायत सधा हुआ है। वे वस्तुस्थिति के नए आयाम को रेखांकित करके अपने ढंग से प्रस्तुत करते हैं। डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी
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