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श्योराज सिंह बेचैन की दस कहानियों का संकलन भरोसे की बहन एक ऐसे समाज का ताना-बाना है जहाँ का परिवेश, नागरिक जीवन, शासन व्यवस्था और सामाजिक जीवन के उच्च आदर्श सब कुछ भ्रष्ट हो चुका है। ऐसे समाज में रहने वाले मनुष्य भ्रमित हैं और अपने आसपास भ्रम ही रचते हैं। विश्वासघात, अधर्म और संशय इन कथाओं में प्रमुखता से देखा जा सकता है। दरअसल एक ऐसे समाज को साहित्य की दृष्टि से देखना जो विकृत हो चुका है, पीड़ादायी है।
इन कथाओं में लेखक ने यह दिखाने का प्रयत्न किया है कि न केवल मनुष्य बल्कि समूचा समाज और शासन-तन्त्र दूषित हो चुका है। साहित्य में वह शक्ति होती है जो मनुष्य और समाज की सूक्ष्म मनोवृत्तियों को एक कसौटी पर तोल कर उसे समाज के लिए उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता है।
पिछले कुछ दशकों से साहित्य में कई प्रकार के विमर्श सामने आ रहे हैं। इनमें दलित विमर्श प्रमुखता से उभर कर आया है। ऐसा नहीं है कि दलित चिन्तन साहित्य की मुख्यधारा में पहले था ही नहीं बल्कि यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि पिछले लगभग तीन दशकों में दलित विमर्श में उन्मुक्तता और निर्भीकता आयी है। इस विमर्श को गम्भीर दृष्टिकोण से देखा गया है, हालात कुछ बदले हैं लेकिन देखा जाये तो यह भी एक भ्रम ही है। दरअसल जिन बदलावों को दलित विमर्श के उपरान्त देखा जा रहा है, वह व्यावहारिक रूप में अब भी सपने की तरह हैं जिन्हें साकार होने के लिए सत्य का धरातल रचना होगा। इसके अभाव में यह केवल एक प्रचार तन्त्र ही न बन कर रह जाये।

श्यौराज सिंह बेचैन की ये कहानियाँ केवल अपना स्वर मज़बूत नहीं करती हैं बल्कि उस स्वर को पूरी एकाग्रता से टटोलती भी हैं। उनमें से अन्याय, असत्य और कलकित क्षुद्रताएँ  खँगाल कर अलग कर देती हैं। विमर्श के गम्भीर चक्र में से अर्थपूर्ण लेखन द्वारा एक बेहतर समाज की निर्मिति करना किसी चुनौती से कम नहीं और श्योराज सिंह बेचैन की कहानियाँ इस चुनौती का निर्वहन गरिमापूर्ण और साहित्य के उजले पक्षों को विचारधारा के केन्द्र में रखकर करती हैं।

श्योराज सिंह बेचैन कवि भी हैं इसलिए अपनी कहानियों को मितकथन, संकेतात्मकता और रूपकात्मकता की धार देते हैं।
उनके पात्र अतिक्रान्तिकारी और बेवजह आक्रामक नहीं हैं बल्कि उनके संवादों में भी दलित विमर्श का सत्व और अम्बेडकरवाद ऐसे मौजूद मिलता है कि उसे अलग से इंगित नहीं कर सकते। विमर्श उनकी कथाओं में सहजता से अन्तर्विन्यस्त है।

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