{"title":"Sunil Atolia 'Kalu' Books","description":"","products":[{"product_id":"main-behar-mein-hoon","title":"Main Behar Mein Hoon","description":"\u003cspan style=\"color: #0f1111; font-family: 'Amazon Ember', Arial, sans-serif;\"\u003eमैं बहर में हूँ - पढ़ने-लिखने का शौक़ मुझे बचपन से ही रहा है। संयोग से मेरा जन्मदिन उसी दिन है जिस दिन मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म हुआ था। फ़ितरत कहूँ या सोहबत का असर, कॉलेज के दिनों से मुझे टीवी पर कवि सम्मेलन और मुशायरे देखना और मौक़ा मिलने पर ऐसे आयोजनों में जाना मुझे हमेशा ही अच्छा लगा। जगजीत सिंह जी की ग़ज़लों को सुनना और टीवी पर देखा हुआ मिर्ज़ा ग़ालिब सीरियल, मेरे सिर पर ग़ज़लों का भूत ऐसा चढ़ा कि अब चाहकर भी मैं इनसे दूर नहीं हो सकता। मुझे यह याद नहीं है कि मैंने पहला शेर कौन-सा लिखा और मेरी पहली ग़ज़ल कौन-सी है। शुरुआती दौर में जो कुछ कच्चा-पक्का लिखा उन पन्नों को फाड़ने का साहस अभी तक नहीं कर पाया हूँ। कोविड ने मेरी अतृप्त इच्छाओं को फिर से जगा दिया जो मैं लगभग भूल चुका था। यह दौर जहाँ पूरी दुनिया के लिए कई नयी चुनौतियाँ खड़ी कर रहा था, वहीं पर यह न जाने कितनी अनगिनत सम्भावनाएँ सँजोये था। जैसे न जाने कितने लोगों ने इस दौर में अपने आपको खंगाला और सागर मन्थन की तरह ना जाने अन्दर से क्या-क्या ढूँढ़ निकाला था। यह मेरे लेखन के पुनर्जीवन का अवसर था और मैंने इसका पूरी तरह फ़ायदा उठाया भी है। लिखना अब मेरे लिए शौक से बढ़कर ज़रूरत बन गया है और कुछ सालों बाद मिलने वाले ख़ाली समय के सदुपयोग का इससे बेहतर साधन अभी तक तो मेरी निगाह में नहीं है । कोविड के दौर की मुश्किलें तो पूरी दुनिया के लिए थीं पर इसके बाद की मेरी मुश्किलों का दौर मेरे अपने अज्ञान का परिणाम था। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे अपने आप पर हँसी आती है। यह जानते हुए भी कि उर्दू मेरी मातृभाषा और तालीम का हिस्सा कभी नहीं रही थी, अपनी पहली किताब 'हफ़्ते दर हफ़्ते' के प्रकाशन का जोखिम उठा लिया। ज़िन्दगी कोई साँप-सीढ़ी का खेल नहीं है जिसमें गिरना और चढ़ना भाग्य के भरोसे हो। अपनी कामयाबी और नाकामी के लिए इन्सान पूरी तरह से खुद ज़िम्मेदार होता है और जो लोग भाग्य को दोष देते हैं वो खुद से बचना चाहते हैं। किसी इन्सान के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान तब होती है जब वो मुश्किल समय से गुज़र रहा होता है। जब मुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ, तब मेरे पास दो रास्ते थे या तो जैसा चल रहा है वैसा ही चलने दूँ या फिर अपनी ग़लतियों को सुधारूँ। सो अपने आपको सुधारने की कोशिश (जो अभी जारी है और हमेशा जारी रहेगी) आपके सामने रखकर कहता हूँ : ठुकराओ अब कि वाह करो मैं बहर में हूँ\u003c\/span\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47603582566637,"sku":null,"price":286.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/files\/Lfm956wCfD.jpg?v=1736395328"},{"product_id":"ganga-jamuni-tehzeeb-2-books-set","title":"Ganga Jamuni Tehzeeb (2 Books Set)","description":"\u003cdiv\u003eहमारे देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब पारस्परिक मेल-जोल का अनूठा उदाहरण रही है हालाँकि असहिष्णुता की भावना के चलते रंग, भाषा, त्योहार, खान-पान, वेशभूषा आदि को धर्म विशेष से जोड़कर लोगों को बाँटने के प्रयास हमेशा से किये जाते रहे हैं। एक साहित्यकार का यह दायित्व बनता है कि वह समाज को जोड़ने का काम करे पर समाज में व्याप्त असहिष्णुता साहित्य पर भी हावी होती जा रही है। भाषा आपस में जोड़ने का माध्यम है पर इसे भी बाँटने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। ग़ज़ल लिखने में हिन्दी शब्दों से और हिन्दी कविता या गीत में उर्दू शब्दों से परहेज़ किया जाता है।\u003c\/div\u003e\u003cdiv\u003eसाहित्य को न केवल समाज का दर्पण होना चाहिए बल्कि समाज के अधिकांश लोगों के लिए होना चाहिए। कठिन भाषा के प्रयोग से साहित्य अलंकृत तो हो सकता है पर इसकी पहुँच आम आदमी तक नहीं हो पाती। दुष्यन्त कुमार ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से एक परम्परा शुरू तो की थी पर यह इक्का-दुक्का लेखकों तक ही सीमित रही है। जब तक हिन्दी और उर्दू अपने आभिजात्य आवरण और एक-दूसरे पर अपनी श्रेष्ठता दिखाने के प्रयासों को छोड़कर आम आदमी की सरल भाषा का प्रयोग नहीं अपनायेंगी तब तक उस गंगा-जमुनी तहज़ीब से दूरी बढ़ती रहेगी और साहित्य पर अंग्रेज़ी भाषा का प्रभुत्व बढ़ता चलेगा।\u003c\/div\u003e\u003cdiv\u003eमेरी शिक्षा और जीवन-यात्रा में उर्दू भाषा को पढ़ने-सीखने के अवसर बहुत कम रहे पर ग़ज़ल और नज़्म के प्रति मेरे लगाव के चलते मुझे पिछले कुछ वर्षों में थोड़ी-बहुत उर्दू पढ़ने-लिखने का मौक़ा मिला। सो मेरी हिन्दी और उर्दू भाषा की पकड़ लगभग उतनी ही है जितनी उत्तर भारत के एक आम आदमी की हो सकती है। ग़ज़ल में हिन्दी शब्दों का प्रयोग भले ही नयी बात न हो पर दोहे में आम बोलचाल में इस्तेमाल उर्दू शब्दों का प्रयोग एक नवीन प्रयोग है।\u003c\/div\u003e\u003cdiv\u003eआशा है कि आप सभी के माध्यम से मेरा ये दो किताबों का जोड़ा, जिसमें ग़ज़ल-संग्रह ‘मैं बहर में हूँ’ और दोहा-संग्रह ‘दोहे मोहे सोहे’ शामिल हैं, गंगा-जमुनी तहज़ीब को बचाये रखने में मेरा एक छोटा-सा प्रयास साबित होगा।\u003c\/div\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47702897656045,"sku":null,"price":771.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/files\/Kl2NcN0fcK.jpg?v=1738590021"},{"product_id":"dohe-mohe-sohe","title":"Dohe Mohe Sohe","description":"\u003cdiv style=\"text-align: justify; padding-left: 30px;\"\u003e\u003c\/div\u003e\u003cdiv style=\"text-align: justify;\"\u003eदोहे मोहे सोहे - किसी भी देश की संस्कृति में होने वाले परिवर्तन का पहला प्रभाव लिखे और पढ़े जाने वाले साहित्य पर पड़ता है। एक समय ऐसा था जब दोहे हमारे साहित्य की पहचान करते थे। तुलसी, सूर, कबीर, रहीम, रसख़ान और बिहारी के दोहे एक ज़माने हुआ मैं बच्चे-बच्चे को याद हुआ करते थे। हिन्दी विषय की पुस्तकों में दोहे विशेष रूप से पढ़े जाते थे और परीक्षा में दोहों के शब्दार्थ एवं भावार्थ पर कई प्रश्न आते थे। दोहों का महत्त्व इसलिए भी रहा कि अधिकतर दोहे जीवन में कुछ नयी सीख देने वाले हैं।\u003c\/div\u003e\u003cdiv style=\"text-align: justify;\"\u003eसमय बदलने के साथ ही दोहों का प्रयोग कम होता चला गया और इसी कारण इसके लेखकों की संख्या भी घटती गयी है। अधिकांश लेखकों ने प्रयोगात्मक तौर पर कुछ दोहे लिखे हैं जिनमें निदा फ़ाज़ली जी के दोहे ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह जी द्वारा गाये जाने के कारण काफ़ी मशहूर भी हुए। प्रसिद्ध हास्य व्यंग्य लेखक हुल्लड़ मुरादाबादी द्वारा सात सौ से अधिक दोहों की सतसई भी प्रकाशित हुई पर यह आश्चर्य और शोध का विषय है कि अभिव्यक्ति का इतना सशक्त माध्यम होने के बावजूद आम जीवन में दोहों का प्रयोग लगभग नगण्य हो चला है। साहित्य के विभिन्न मंचों और कवि सम्मेलनों में भी अब दोहे सुनाई नहीं देते हैं।\u003c\/div\u003e\u003cdiv style=\"text-align: justify;\"\u003eग़ज़ल लिखने की असफलता के दौर में मेरा ध्यान दोहा लेखन पर गया क्योंकि शेर की तरह हर दोहा अपने आप में परिपूर्ण होता है और इसे लिखने में भी कुछ विशेष नियमों का पालन भी करना पड़ता है। कम शब्दों में कोई बात कैसे लयात्मक रूप से कही जा सकती है दोहे इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं। चूँकि मैं आम आदमी की भाषा में हिन्दी-उर्दू मिश्रित ग़ज़लें लिखता रहा हूँ इसलिए मेरे दोहों में भी यही मिश्रण दिखाई देता है। दोहों को पुनः आम आदमी के जीवन और साहित्य के मंचों पर स्थापित करने की दिशा में यह मेरा पहला कदम है।\u003c\/div\u003e\u003cdiv style=\"text-align: justify;\"\u003eकुछ वर्ष पहले जावेद अख़्तर जी द्वारा टाटा स्काई के एक पर दोहे मोहे सोहे नाम से एक कार्यक्रम आता था जिसमें दोहों की व्याख्या और गायन होता था पर यह एक अलग से भुगतान किया जाने वाला चैनल था जिसे शायद बहुत ही कम लोगों द्वारा देखा जाता था। मुझे यह कार्यक्रम बेहद पसन्द था इसलिए अपनी इस किताब के लिए इससे अच्छा शीर्षक मुझे सुझाई नहीं दिया। सो दोहे मोहे सोहे आपको इस आशा और विश्वास के साथ समर्पित कि 'दोहे सबको सोहे'।\u003c\/div\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":47702906765549,"sku":null,"price":286.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/files\/1cpVLVL53i.jpg?v=1738590477"}],"url":"https:\/\/rekhtabooks.com\/hi\/collections\/sunil-atolia-kalu-books.oembed","provider":"Rekhta Books","version":"1.0","type":"link"}