{"title":"Lokpriya Kahaniyan: Must-Read Stories by Popular Indian Writers","description":"","products":[{"product_id":"leo-tolstoy-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Leo Tolstoy Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"‘‘क्या वे लोग खेत जोत रहे हैं? क्या उन लोगों ने अपना काम खत्म कर लिया?’’‘‘उन लोगों ने आधे से अधिक खेत जोत लिये हैं।’’‘‘क्या कुछ भी काम बचा नहीं है?’’‘‘मुझे तो नहीं दिखा; पर उन्होंने जुताई अच्छी तरह से की है। वे सभी डरे हुए हैं।’’‘‘ठीक है। अब तो जमीन ठीक हो गई है न?’’‘‘हाँ, अब खेत तैयार हैं और उनमें अफीम के पौधों के बीज डाले जा सकते हैं।’’मैनेजर थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोला, ‘‘वे लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं? क्या वे मुझे गाली देते हैं?’’बूढ़ा कुछ हकलाने लगा, पर माइकल ने उसे सच बोलने के लिए कहा, ‘‘तुम मुझे सच बताओ। तुम अपने शब्द नहीं, बल्कि किसी और के शब्द बोल रहे हो। यदि तुम मुझे सच-सच बताओगे, तब मैं तुमको इनाम दूँगा; और अगर तुम मुझे धोखा दोगे तो ध्यान रखना, मैं तुम्हें बहुत मारूँगा। कर्तुशा! इसे एक गिलास वोदका दो, ताकि इसमें साहस पैदा हो।’’—इसी संग्रह से • सुप्रसिद्ध रूसी कथाकार लियो टॉलस्टॉय ने जीवन के सभी पक्षों पर प्रभावी रचनाएँ की हैं। उन्होंने धर्म में व्याप्त पाखंड तथा तत्कालीन कुरीतियों को अनावृत किया। मनोरंजन के साथ-साथ मन को उद्वेलित करनेवाली सरस टॉलस्टॉय की लोकप्रिय कहानियों का संग्रह।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43921948541165,"sku":null,"price":166.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789350488393_main.jpg?v=1674025027"},{"product_id":"premchand-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Premchand Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"प्रेमचंद की श्रेष्‍ठ कहानियाँ-मुकेश नादानदस-बारह रोज और बीत गए। दोपहर का समय था। बाबूजी खाना खा रहे थे। मैं मुन्नू के पाँवों में पीनस की पैजनियाँ बाँध रहा था। एक औरत घूँघट निकाले हुए आई और आँगन में खड़ी हो गई। उसके वस्‍‍त्र फटे हुए और मैले थे, पर गोरी सुंदर औरत थी। उसने मुझसे पूछा, ‘‘भैया, बहूजी कहाँ हैं?’’ मैंने उसके निकट जाकर मुँह देखते हुए कहा, ‘‘तुम कौन हो, क्या बेचती हो?’’ औरत-‘‘कुछ बेचती नहीं हूँ, बस तुम्हारे लिए ये कमलगट्टे लाई हूँ। भैया, तुम्हें तो कमलगट्टे बड़े अच्छे लगते हैं न?’’ मैंने उसके हाथ में लटकती हुई पोटली को उत्सुक आँखों से देखकर पूछा, ‘‘कहाँ से लाई हो? देखें।’’ स्‍‍त्री, ‘‘तुम्हारे हरकारे ने भेजा है, भैया!’’ मैंने उछलकर कहा, ‘‘कजाकी ने?’’ स्‍‍त्री ने सिर हिलाकर ‘हाँ’ कहा और पोटली खोलने लगी। इतने में अम्माजी भी चौके से निकलकर आइऔ। उसने अम्मा के पैरों का स्पर्श किया। अम्मा ने पूछा, ‘‘तू कजाकी की पत्‍नी है?’’ औरत ने अपना सिर झुका लिया।-इसी पुस्तक सेउपन्यास सम्राट् मुंशी पेमचंद के कथा साहित्य से चुनी हुई मार्मिक व हृदयस्पर्शी कहानियों का संग्रह।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":43921955389677,"sku":null,"price":333.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789380823386.main.png?v=1680030047"},{"product_id":"ravindra-nath-tagore-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Ravindra Nath Tagore Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"रवींद्रनाथ टैगोर की श्रेष्‍ठ कहानियाँपुलिस ने आकर जोरों से तहकीकात करनी शुरू कर दी। आस-पास के लगभग सभी लोगों के मन में यह बात घर कर गई थी कि चंदा ने ही जिठानी की हत्या की है। सभी गाँववालों के बयानों से ऐसा ही सिद्ध हुआ।पुलिस की ओर से चंदा से जब पूछा गया तो उसने कहा, ‘‘हाँ, मैंने ही खून किया है।’’‘‘क्यों खून किया?’’‘‘मुझसे वह डाह रखती थी।’’‘‘कोई झगड़ा हुआ था?’’‘‘नहीं।’’‘‘वह तुम्हें पहले मारने आई थी?’’‘‘नहीं।’’‘‘तुम पर किसी किस्म का अत्याचार किया था?’’‘‘नहीं।’’इस प्रकार का उत्तर सुनकर सब देखते रह गए।छदामी एकदम घबरा गया। बोला, ‘‘यह ठीक नहीं कह रही है। पहले बड़ी बहू...’’-इसी पुस्तक सेनोबेल पुस्कार विजेता, विश्‍व-प्रसिद्ध साहित्यकार गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की कहानियों से चुनी नई श्रेष्‍ठ कहानियों का संग्रह। आशा है, पाठक इन कहानियों के माध्यम से गुरुदेव के कहानीकार रूप का दिग्दर्शन कर सकेंगे।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":43921956241645,"sku":null,"price":333.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789380823362_main_29543b4b-3729-44a9-ab32-b85bbb82b725.jpg?v=1680030106"},{"product_id":"shakespeare-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Shakespeare Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"विलियम शेक्सपियर—शेक्सपियरसदी के महान् नाटककार विलियम शेक्सपीयर का जन्म 26 अप्रैल, 1564 को इंग्लैंड में हुआ।कुछ लोग मानते हैं किसान का बेटा किसान होता है, डॉक्टर का डॉक्टर और सैनिक का सैनिक आदि-आदि। लेकिन शेक्सपीयर के खानदान का लेखन से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। उनके पिता पेशे से किसान थे, लेकिन शेक्सपीयर को खेती-किसानी नहीं भाई; बल्कि बचपन में उन्होंने एक नाटक देखा और शायद तभी फैसला  कर लिया कि वह भी नाटककार बनेंगे। उनका सपना वर्ष 1592 में साकार हुआ, जब वह लंदन में थिएटर से जुड़े और जल्दी ही एक सफल अभिनेता व कलाकार के रूप में लोकप्रिय हो गए।उन्होंने दुखांत, सुखांत, मजाकिया—हर तरह के नाटक किए। उनके प्रसिद्ध नाटकों में ‘द कॉमेडी ऑफ एरर’,‘ रोमियो एंड जूलियट’, ‘द मर्चेंट ऑफ वेनिस’, ‘एज यू लाइक इट’, ‘हैमलेट’, ‘जूलियस सीजर’ इत्यादि शामिल हैं।आज लगभग 400 साल बाद भी उनके नाटकों के प्रति लोगों का जुनून बरकरार है। प्रस्तुत जीवनी उन्हीं महान् नाटककार के जीवन की घटनाओं से हमें परिचित कराती है।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43921957945581,"sku":null,"price":190.0,"currency_code":"INR","in_stock":false},{"title":"Hardcover","offer_id":43921957978349,"sku":null,"price":285.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789383110629.main.png?v=1680030202"},{"product_id":"sharat-chandra-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Sharat Chandra Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"शरतचंद्र की श्रेष्‍ठ कहानियाँभारतीय भाषाओं के साहित्य में बँगला साहित्य की अपनी अलग पहचान है। इस भाषा के अनेक रचनाकारों ने अपनी लेखनी के दम पर विश्‍व साहित्य पर प्रभुत्व स्थापित किया। ऐसे ही रचनाकारों में बाबू शरतचंद्र चटर्जी का नाम अजर-अमर है। उनका संपूर्ण साहित्य विश्‍व की अनेक भाषाओं में अनुवादित होकर जन-जन में प्रचारित व प्रसारित हुआ। ‘देवदास’, ‘चरित्रहीन’, ‘श्रीकांत’, ‘काशीनाथ’ जैसी रचनाओं का नाम सामने आते ही शरतचंद्र का संपूर्ण व्यक्‍तित्व मानो साकार हो जाता है।शरतचंद्र ने अपने साहित्य में भारतीय समाज की मान्यताओं व परंपराओं को उनके आदर्श़ों सहित यथार्थ रूप में चित्रित किया है। उन्होंने अपने साहित्य में सामाजिक व राजनीतिक समस्याओं के बीच अपनी रोमांटिक प्रवृत्ति की छाप अवश्य छोड़ी है; समाज की कुरीतियों व कुचेष्‍टाओं पर प्रबल प्रहार किए हैं, साथ ही नारी-मन के अंतर्द्वंद्व व पीड़ा का भी मार्मिक चित्रण किया है।शरत बाबू की इन कहानियों में समाज में व्याप्‍त बुराइयों, समस्याओं, पारिवारिक उलझनों को अलग-अलग प्रकार से चित्रित किया गया है। अनेक कहानियाँ ऐसी हैं, जो कभी भुलाई नहीं जा सकेंगी।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":43921958338797,"sku":null,"price":333.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789380823393_main.png?v=1680030200"},{"product_id":"shrilal-shukla-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Shrilal Shukla Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"श्रीलाल शुक्ल जितने बड़े व्यंग्यकार हैं, उतने ही सशक्त कहानीकार भी, जिनकी कहानियों का बिल्कुल अलग अंदाज है, जिनमें एक धीमा-धीमा व्यंग्य अकसर घुला-मिला होता है। इससे कहानी जो कुछ कहती है, उसके अलावा भी कई और दिशाएँ और आशय खुलते हैं, जिनमें जीवन की विसंगतियाँ, मनुष्य की भीतरी उधेड़बुन और न कही जा सकने वाली मानव-मन की गुत्थियाँ भी शामिल हैं। श्रीलाल शुक्ल ने गाँव हो या शहर, महानगरीय उच्च वर्ग का अहं हो या निचले और मेहनतकश वर्ग की गहरी तकलीफें, सबको बहुत पास से देखा और सबकी भीतर की सचाइयों पर उनकी पैनी नजर रखी। इसी से उनकी कहानियों में यथार्थ के इतने बहुविध रूप सामने आते हैं कि ताज्जुब होता है।और यही नहीं, श्रीलालजी की कहानियों में शिल्प के इतने रूप हैं कि आप कह सकते हैं कि अपनी हर कहानी में वे शिल्प की एक अलग काट और भाषा के अलग अंदाज के साथ उपस्थित हैं। यह क्षमता और कलात्मक सामर्थ्य बहुत कम कथाकारों में देखने को मिलती है। ‘छुट्टियाँ’ और ‘यह घर मेरा नहीं है’ में उनकी भाषा का जो रंग है, वही ‘लखनऊ’, ‘कुत्ते और कुत्ते’, ‘यहाँ से वहाँ’ या ‘नसीहतें’ कहानियों में नहीं है और ‘उमरावनगर में एक दिन’ कहानी में तो श्रीलालजी भाषा के खिलंदड़ेपन के साथ सचमुच एक नया ही शिल्प गढ़ते नजर आते हैं।सच तो यह है कि श्रीलाल शुक्ल के कहानीकार को ठीक-ठीक समझा ही नहीं गया। इस संचयन में उनकी कुल पंद्रह कहानियाँ शामिल हैं, जिनमें सभी का रंग और अंदाज अलग-अलग है और कोशिश रही है कि उनके कहानीकार का हर रंग और अंदाज पाठकों के आगे आए।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":43921959452909,"sku":null,"price":333.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789352662920.main.png?v=1680030241"},{"product_id":"devendra-satyarathi-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Devendra Satyarathi Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"हिंदी के विलक्षण यायावर साहित्यकार देवेंद्र सत्यार्थी जितने बड़े लोक-साधक हैं, उतने ही बड़े और ऊँचे कद के कथाकार भी। पूरे बीस बरस तक लोकगीतों की तलाश में गाँव-गाँव भटककर हिंदुस्तान के चप्पे-चप्पे की धूल छान लेनेवाले सत्यार्थीजी के कथा-साहित्य की खासी धूम रही है। सत्यार्थीजी की कहानियों में जीवन की घुमक्कड़ी के इतने बीहड़, कठोर और दुस्साहसी अनुभव हैं कि मन उनके साथ बहता चला जाता है। उनकी कहानियों में लोकगीतों का आस्वाद और रस-माधुर्य ही नहीं, फसलों की लहलहाती गंध, खेतों की मिट्टी की खुशबू, गरीब किसान-मजदूरों के लहू और पसीने की गंध, शोषण की आकुल पुकारें तथा दुःख और पीड़ाओं का सैलाब भी है। इसीलिए मंटो ने बड़ी हसरत के साथ उन्हें पत्र लिखा था—‘‘काश, मैं खुशिया होता और आपके साथ-साथ यात्रा करता!’’ धरती और खानाबदोशी की गंध लिये ये स्वच्छंद कहानियाँ सिर्फ एक लोकयात्री की कहानियाँ ही हो सकती हैं, जिसने धरती को बड़ी शिद्दत से प्यार किया है और जिंदगी के नए-नए रूपों की तरह अपनी कहानियों को भी नित नए-नए रूपों में सामने आने के लिए खुला छोड़ दिया है। यही वजह है कि सत्यार्थीजी की कहानियाँ औरों से इतनी अलग हैं और वे बीसवीं शताब्दी के समूचे इतिहास तथा लोकजीवन को अपने आप में समोए, अपने समय के अनमोल दस्तावेज सरीखी हैं। बेशक सत्यार्थीजी की कहानियों को पढ़ना अपने समय और इतिहास की गूँजती आवाजों को सुनने की मानिंद है।—प्रकाश मनु","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43922172412141,"sku":null,"price":143.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789351862918_main_ae1144a7-a53f-40fb-83b4-c4254f9f2bff.jpg?v=1680030663"},{"product_id":"bangla-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Bangla Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"बाग्ला साहित्य बड़ा सरस और क्रांतिकारी रहा है। बांग्ला में उपन्यास तथा कहानी विधा को खूब प्रश्रय मिला। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय उपन्यास के साथ-साथ छोटी कहानियाँ भी लिखते रहे। स्वर्णकुमारी देवी एवं कुछ अन्य महिलाएँ भी पत्र-पत्रिकाओं में बांग्ला कहानियाँ प्रकाशित करवाती रहीं। किंतु बांग्ला कहानी, गल्प-रचना के आदर्श रूप का प्रकाशन 1877 ईस्वी में प्रकाशित ‘रामेश्वरेर अदृश्य’ नामक कहानी द्वारा हुआ, जिसे संजीव चंद चट्टोपाध्याय ने प्रकाशित करवाया था। अंग्रेजी लघु-कथाओं के समानांतर बांग्ला कहानी का अपना खुद का रचना-विधान-शिल्प और कथ्य सर्वप्रथम कवि रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी ‘क्षुधित पाषाण’ से सन् 1890 ई. में स्वाभाविक रूप से संरचित हुआ। कहानी की आकृति और प्रकृति निश्चित हो जाने के उपरांत बांग्ला कहानी क्रमश: एक से एक ऊँचाइयाँ छूती गई। ऐसे ही कथारस से परिपूर्ण बांग्ला के श्रेष्ठ कथाकारों की लोकप्रिय कहानियाँ इस संग्रह में संकलित हैं। ये कहानियाँ एक ओर जहाँ बांग्ला समाज के उत्थान, विसंगति एवं ऊहापोह को दिग्दर्शित करती हैं, वहीं रोचक होने के कारण पाठकों का भरपूर मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन भी करती हैं।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":43951563342061,"sku":null,"price":380.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789355620231.main_6d132e0b-3caa-45b6-88a7-2b01ab553155.jpg?v=1680031131"},{"product_id":"bangla-ki-lokpriya-kahaniyan-1","title":"Bangla Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"बाग्ला साहित्य बड़ा सरस और क्रांतिकारी रहा है। बांग्ला में उपन्यास तथा कहानी विधा को खूब प्रश्रय मिला। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय उपन्यास के साथ-साथ छोटी कहानियाँ भी लिखते रहे। स्वर्णकुमारी देवी एवं कुछ अन्य महिलाएँ भी पत्र-पत्रिकाओं में बांग्ला कहानियाँ प्रकाशित करवाती रहीं। किंतु बांग्ला कहानी, गल्प-रचना के आदर्श रूप का प्रकाशन 1877 ईस्वी में प्रकाशित ‘रामेश्वरेर अदृश्य’ नामक कहानी द्वारा हुआ, जिसे संजीव चंद चट्टोपाध्याय ने प्रकाशित करवाया था। अंग्रेजी लघु-कथाओं के समानांतर बांग्ला कहानी का अपना खुद का रचना-विधान-शिल्प और कथ्य सर्वप्रथम कवि रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी ‘क्षुधित पाषाण’ से सन् 1890 ई. में स्वाभाविक रूप से संरचित हुआ। कहानी की आकृति और प्रकृति निश्चित हो जाने के उपरांत बांग्ला कहानी क्रमश: एक से एक ऊँचाइयाँ छूती गई। ऐसे ही कथारस से परिपूर्ण बांग्ला के श्रेष्ठ कथाकारों की लोकप्रिय कहानियाँ इस संग्रह में संकलित हैं। ये कहानियाँ एक ओर जहाँ बांग्ला समाज के उत्थान, विसंगति एवं ऊहापोह को दिग्दर्शित करती हैं, वहीं रोचक होने के कारण पाठकों का भरपूर मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन भी करती हैं।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43951563538669,"sku":null,"price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789355212245_main_0623fb65-611b-4685-9ef5-402f49a11322.jpg?v=1680031143"},{"product_id":"asamiya-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Asamiya Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"भारतवर्ष में जो विविध भाषा-परिवारों की अनेक भाषाएँ आधुनिक काल में प्रचलित हैं, उनमें सभी में गद्य विधा सबसे पहले असमीया भाषा में ही शुरू हुई, अत: उसका गल्प-साहित्य भी काफी पुराना है। प्रस्तुत पुस्तक में आधुनिक काल की श्रेष्ठ कहानियों को संकलित किया गया है। इनमें असमीया भाषा के प्रतिष्ठित कथाकारों की लोकप्रिय कहानियाँ संकलित की गई हैं, जो अपने कथ्य, शिल्प, भाव, रोचकता, पठनीयता और सामाजिक सरोकारों केचलते पाठकों को बाँध लेंगी।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43951563571437,"sku":null,"price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789355212238_main_9b675a2a-0d89-4ced-b510-df7cc85f1ac5.jpg?v=1680031143"},{"product_id":"sindhi-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Sindhi Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"अखंड भारत के भूखंड सिंध की मिट्टी में पल्लवित-पुष्पित कहानियाँ ही प्रमुख रूप से सिंधी कहानियों की अविरल बहती धारा का उद्गम बिंदु है। सिंधु नदी की निर्मल जलधारा की भाँति ही सिंधी कहानियाँ भी अपनी गति के साथ निर्बाध रूप से बह रही हैं। भारत-विभाजन के भूचाल से सिंध का सामाजिक, सांस्कृतिक व भौगोलिक ताना-बाना तहस-नहस हो गया। सिंध का हिंदू समाज निर्वासित हो गया। निर्वासन की इस पीड़ा का प्रभाव सिंधी कहानियों के विकास की गति पर भी पड़ा। सिंधी समाज का हर वर्ग खंडित भारत भूखंड में ‘अटो, लटो, अझो’, अर्थात् रोटी, कपड़ा और मकान के चक्कर में फँस गया। इससे लेखक वर्ग भी अछूता न रहा, उनका जीवन भी प्रभावित हुआ।कुछ ही वर्षों के अंतराल में कहानी लेखन की गति फिर बढ़ने लगी। अब कहानी जगत् के विषय भी अनेक थे। सिंध की भूमि से प्रेम, बिछोह, यादें, दर्द, पीड़ा, सरकारी निर्णय की निंदा के साथ-साथ विस्थापितों के कैंप में रहने के अनुभव, स्थानीय समाज के व्यवहार, संबंध, जीवन की संवेदनाएँ, कोमल व कठोर भावनाएँ सिंधी लेखक की कहानियों के विषय बने हैं।सिंध की लोकप्रिय कहानियों के इस संकलन में विविध विषयों, शैलियों को समेटने का प्रयास किया गया है। सिंधी कहानियों का आसमान अति विशाल है; उसमें से कुछ रत्न यहाँ हिंदी पाठकों के लिए इस पुस्तक में संकलित किए गए हैं।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43951563735277,"sku":null,"price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789355211941_main_57e86dbd-0514-4d9e-b39b-cd88aaf7b194.jpg?v=1680031150"},{"product_id":"asamiya-ki-lokpriya-kahaniyan-1","title":"Asamiya Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"भारतवर्ष में जो विविध भाषा-परिवारों की अनेक भाषाएँ आधुनिक काल में प्रचलित हैं, उनमें सभी में गद्य विधा सबसे पहले असमीया भाषा में ही शुरू हुई, अत: उसका गल्प-साहित्य भी काफी पुराना है। प्रस्तुत पुस्तक में आधुनिक काल की श्रेष्ठ कहानियों को संकलित किया गया है। इनमें असमीया भाषा के प्रतिष्ठित कथाकारों की लोकप्रिय कहानियाँ संकलित की गई हैं, जो अपने कथ्य, शिल्प, भाव, रोचकता, पठनीयता और सामाजिक सरोकारों केचलते पाठकों को बाँध लेंगी।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt 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पर एक तसवीर थी, लेकिन उसका नाम अब तक वह नहीं जान पाई थी। इतना जानती थी कि वे उसके पिता के स्कूल के दोस्त थे।—इसी पुस्तक सेप्रसिद्ध कथाकार जेम्स ज्वॉइस अपनी किस्सागाई के लिए ख्यात हैं। उनकी कहानियों में मानव मन एवं भावनाओं का गहराई से विश्लेषण देखने को मिलता है। उनकी लोकप्रिय कहानियों का पठनीय संकलन।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43951568814317,"sku":null,"price":285.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789355212184.main_ad28aefd-66a7-495a-9504-48d42cbd15ca.jpg?v=1680031436"},{"product_id":"henry-james-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Henry James Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"वह पिछली पीढि़यों के बारे में जानती थी। लकड़ी काटनेवाले रईस और पगड़ी पहननेवाली उनकी पत्नियाँ तथा गोल आँखोंवाली उनकी बेटियाँ, जो अन्य दिनों में नीरस, ऊबाऊ एवं व्यापारविहीन शहरों की रौनक बढ़ाती थीं। ठोस वर्गाकार मकान व चौड़ी दीवारवाले बगीचे, हरी-भरी गलियाँ, जिनमें चर्चाओं का बाजार गरम रहता था और स्थानीय सीजन की ऐसी ही तसवीर दिखती थी। उनके पास सभाओं, डिनर, जमकर मद्यपान के निमंत्रण हुआ करते थे। अँधेरा ढलते ही चिरागों से रोशन होनेवाले पार्लर, धूल-धूसरित पुराने वाहन, पिस्तौलदान, राजमार्गों पर चलनेवाले लोग। वह एक उँगली उसकी ही तरह से महत्त्वपूर्ण स्थान पर रखती थी, जो सारी चीजों की समृद्ध सौम्यता को दरशाती थी।—इसी पुस्तक सेहेनरी जेम्स संसार के प्रसिद्ध लेखकों में गिने जाते हैं। उन्होंने उच्च कोटि का कालजयी साहित्य रचा। उनकी कहानियों में संभ्रांत वर्ग की रंगीनी, सभा-समारोह, मद्य पार्टियों का जिक्र विशेष रूप से आता है। तत्कालीन सामाजिक परिवेश और ताने-बाने की बानगी देती पठनीय कहानियों का संकलन।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43951568912621,"sku":null,"price":285.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789355212177.main_177150d7-b599-46a9-861e-057c24400e6d.jpg?v=1680031439"},{"product_id":"jack-london-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Jack London Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"एक बार फिर उसने चारों ओर दृष्टि घुमाकर देखा, यह बहुत हर्षदायक नजारा नहीं था। चारों ओर एक धुँधली आकाशरेखा था। सारे पहाड़ नीचे थे। कहीं पर भी कोई पेड़, झाड़ी या घास नहीं दिख रही थी। यहाँ तो केवल विशाल और भयंकर अकेलापन था, जिससे उसके अंदर एक भय की लहर सी दौड़ गई थी।वह दुधिया पानी में थोड़ा झुक गया, जैसे कि वह विशाल जलधारा उसके ऊपर ही चढ़ी आ रही थी और उसको निर्दयता से कुचले दे रही थी, उसकी सुषुप्ति से। वह बहुत जोर-जोर से हिलने लगा, जैसे उसको दौरा आ गया हो और उसकी बंदूक हाथ से छूटकर गिर पड़ी। वह अपने भय से लड़ा, अपने को सीधा किया तथा पानी में अपनी बंदूक खोजने लगा और फिर उसे पुनः वापस पा लिया। उसने अपने बैकपैक को बाएँ कंधे की ओर कर लिया, जिससे उसके घायल टखने को कुछ आराम मिल सके। फिर वह धीरे-धीरे दर्द से सिकुड़ते हुए आगे तट की ओर बढ़ने लगा।—इसी पुस्तक सेजैक लंडन ने बहुत सारे साहसिक अभियान किए, जिससे नदी, पहाड़, जंगल और जंगल के जीवों ने उनकी कहानियों में प्रमुखता से स्थान बना लिया। उनकी ये कहानियाँ साहस और रोमांच से भरपूर हैं, जो पाठकों को रोमांचित कर देती हैं।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43951570419949,"sku":null,"price":285.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789355212146.main_3837da34-3c3d-40bb-a2eb-aad2c0d5ebf0.jpg?v=1680031506"},{"product_id":"edgar-allan-poe-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Edgar Allan Poe Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"एलेनोरा की सुंदरता और मासूमियत एक सेराफिम एंजेल की तरह थी, वह एक कुँआरी कन्या थी, जो कृत्रिमता से कोसों दूर थी और फूलों के बीच अपनी छोटी सी निर्दोष जिंदगी गुजार रही थी। उसके भीतर कोई छल-कपट नहीं था, सिर्फ एक गहरा जुनूनी अहसास था, जो सिर्फ दिल से महसूस किया जा सकता था। उसने मुझे अपने दिल की गहराइयों से देखा, जब हम घाटी में रंग-बिरंगी घास पर साथ में चल रहे थे। हमारे इस फैसले से जो बदलाव हुए थे, हम उसके बारे में बात कर रहे थे।उस दिन एक-दूसरे से लिपटे हुए, उसके बारे में लंबी बातचीत करने के दौरान एकबारगी तो उसकी आँखों में आँसू आ गए और वह उदास हो गई कि कहीं यह मानवता के खत्म होने से पहले के आखिरी पल तो नहीं, जो वे बिता रहे थे। वह उस पल केवल उन्हीं दुःख भरी बातों को लेकर बैठ गई, जो हमारी बातों के बीच में बार-बार उन छवियों जैसी उभर रही थी, जैसे कवि शिराज के गीतों के वाक्यांश की हर प्रभावशाली भिन्नता में बार-बार घटित होती थी।—इसी पुस्तक सेएडगर एलन पो ने मृत्यु जैसे गूढ़ विषयों पर गहन चिंतन किया और इसे ही अपने लेखन का विषय बनाया। उनकी कहानियाँ मानवीय संबंधों के साथ-साथ कल्पनाओं की उड़ान, अय्यारी तथा जादूगरी की रोचकता से भरी हैं, जो पाठकों को बाँधे रखती हैं।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43951570452717,"sku":null,"price":285.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789355212139.main_f940b66e-ff8a-4ca4-9b05-43aa6a0948d8.jpg?v=1680031512"},{"product_id":"virginia-woolf-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Virginia Woolf Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"सच कहूँ तो तुम्हारे साथ रहते हुए मुझे ऐसा महसूस होता कि मिलानचोली नदी हमें बरदाश्त कर रही थी। चाँदनी रात में चाँद की रोशनी तुम्हारे चेहरे पर पड़ने के कारण मैं तुम्हारे चेहरे को और उस पर आनेवाले भावों को देख रहा था, तुम्हारी आवाज को सुन पा रहा था। बिस्तर पर हम तब तक एक साथ पड़े रहते, जब तक चिडि़यों के चहचहाने की आवाज नहीं सुनाई देने लगती।लेकिन अगर ऐसा है, तो फिर मन के अंदर यह शोक क्यों है? मैं असंतुष्ट क्यों हूँ? जबकि मैं यह अच्छी तरह से जानता हूँ कि एक दिन हर किसी को गुलाब की पत्तियों के नीचे सुकून की नींद सोना है। जहाँ सोने के बाद आप गुब्बारे की तरह से हलके होकर सारे दुःख-तनाव को छोड़कर आसमान में गोते लगाएँगे। उस समय आप एक ऐसी दुनिया में पहुँच चुके होंगे, जहाँ हम तक कोई चाहकर भी पहुँच नहीं पाएगा।—इसी पुस्तक सेअपने समय की चर्चित लेखिका वर्जिनिया वूल्फ ने विपुल मात्रा में लेखन किया। स्त्री-विमर्श उनके लेखन के केंद्र में रहा। स्त्रियों के मन की सुप्त भावनाओं, दुःख, उदासी तथा विडंबनाओं को प्रमुखता से अपनी कहानियों में प्रस्तुत किया है। मन को झकझोरने और संवेदनाओं को संपुष्ट करनेवाली कहानियों का पठनीय संकलन।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43951570583789,"sku":null,"price":285.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789355212122.main_891864ac-ae10-4f0c-9ac8-886d5ca93eb7.jpg?v=1680031513"},{"product_id":"d-h-lawrence-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"D.H. Lawrence Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"‘डी. एच. लॉरेंस की लोकप्रिय कहानियाँ’ साहित्य के विविध रस समेटे हुए हैं। इस कहानी-संकलन में उनके इस वैशिष्ट्य को परखा जा सकता है। भाग्य और वैभव की लोलुपता मनुष्य को किस त्रासदी तक ले जाती है, इसका साक्ष्य ‘काठ का अनाम घोड़ा’ कहानी है। उनकी चर्चित कहानी ‘अंतर्ध्वनि’ स्त्री-पुरुष के मानवीय संबंध के संदर्भ में धार्मिक अवधारणा के सापेक्ष सहज स्वातंत्र्य को वरीयता देती है। ‘वन मानुष’ कहानी आज भी पुरुष के आदिमानव जैसी पाशविकता वाले स्वभाव की ओर संकेत करती है। लॉरेंस की कहानियाँ मनोविज्ञान और दार्शनिकता का कलेवर लिये जिस तरह पाठक तक सहजता से पहुँचती हैं, वह विरल है। पैंतालीस वर्ष से भी छोटे जीवन में उन्होंने साहित्य-जगत् को जो दिया, वह विपुल तो है ही, गुणात्मक स्तर पर भी अद्भुत कहा जाता है।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43951570649325,"sku":null,"price":285.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789355212115.main.jpg?v=1680031522"},{"product_id":"pearl-buck-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Pearl Buck Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"कभी-कभी उसे लगता कि वे दोनों एक-दूसरे को थोड़ा कम जान पाते हैं। यदि वह उसके परिवार की पुरानी पीढि़यों के बारे में न जानती। उसके माता-पिता गरिमामय और आनंदित रहनेवाले थे। लियू भी उसके पीछे उसके परिवार को देखता था; हालाँकि उसने कभी ऐसा कहा नहीं था। वह थोड़ा कम औपचारिक था या उसके मुकाबले में कम संवेदनशील भी। वह उसे आसानी से यह बात कह सकता था, अगर वह मँगनी तोड़ना चाहता तो...! नहीं, नहीं, वह उससे बहुत प्यार करता है, उसे इस बारे में कोई संदेह नहीं था।—इसी पुस्तक सेपर्ल बक ने लंबे समय तक एक मिशनरी के रूप में समाज-कार्य किया। उस गहन अनुभव को इनकी कहानियों में साफ देखा जा सकता है। जन-समाज की ऊहापोह, पारस्परिक संबंध तथा संबंधों के बीच के प्रेम और टकराव को बड़ी खूबसूरती से उन्होंने अपनी कहानियों में उकेरा है। पठनीयता से भरपूर ये कहानियाँ पाठक के मन को छूनेवाली हैं।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43951570878701,"sku":null,"price":285.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789355212061.main_235cd011-34da-4633-aafe-70269610cea1.jpg?v=1680031520"},{"product_id":"arthur-conan-doyle-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Arthur Conan Doyle Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"उस पुराने फौजी के सिर के पिछले भाग में कोई दो इंच लंबा-गहरा घाव था, जो स्पष्ट रूप से किसी धारदार हथियार के वार से किया गया लगता था पर यह अनुमान लगाना कठिन था कि वह हथियार क्या रहा होगा! फर्श पर, जहाँ पहले शव था, उसके पास नक्काशीदार लकड़ी का एक भारी डंडा पड़ा था। कर्नल के पास तरह-तरह के हथियारों का संग्रह था, जो उन देशों से लाए गए थे, जहाँ वह लड़ा था; और पुलिस का अनुमान था कि वह डंडा उसके पदकों में से एक था। नौकरों ने इस बात से इनकार किया कि उन्होंने उस डंडे को पहले कभी देखा था, परंतु यह संभव है कि अजीब चीजों से भरे उस घर में उनका ध्यान उस तरफ न गया हो।—इसी पुस्तक सेप्रतिष्ठित लेखक सर आर्थर कॉनन डॉयल ने अनेक प्रसिद्ध उपन्यास और कहानियाँ लिखकर एक बडे़ पाठकवर्ग को अपना प्रशंसक बनाया। जासूसी, रोमांच और अपराधों पर केंद्रित उनकी कहानियाँ बहुत पसंद की गईं। इस संग्रह में उनकी अत्यंत लोकप्रिय कहानियाँ संकलित हैं।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":43951570911469,"sku":null,"price":285.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789355212054.main_e18edfc8-c8be-42b4-b982-c345e9e56c11.jpg?v=1680031527"},{"product_id":"jainendra-kumar-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Jainendra Kumar Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"जैनेन्द्र अपने समय के सर्वाधिक पढ़े जानेवाले लेखक रहे हैं। उनके द्वारा लिखी गई ‘जनता में’, ‘पत्नी’, ‘तत्सत्’, ‘पाजेब’ तथा ‘पढ़ाई’ आदि कहानियों में कुछ नए कथा-प्रसंग हैं। ‘जनता में’ कहानी रेल के तीसरे दर्जे के डिब्बे में यात्रा करने का अनुभव है। इसमें भी एक बालक है, जो दस यात्रियों के आकर्षण का केंद्र है, पर लेखक अंत में लोक-संशय से हिंदू-मुसलमान का प्रश्न उठा देता है। ‘पत्नी’ कहानी में पत्नी की सेवा, विवशता तथा भारतमाता की स्वतंत्रता के लिए हिंसा या अहिंसा के रास्ते पर मित्रों में बहस होती है। कालीचरण का मत है कि आतंक विवेक को कुंठित करता है और उसके मित्रों का मत है कि बाघ को मारने के लिए आतंकवाद जरूरी है। ‘तत्सत्’ एक दार्शनिक कहानी है, जो आदमी तथा जंगल के वृक्षों तथा जानवरों के माध्यम से कही गई है। बड़ दादा नायक है और सभी इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वह ही अर्थात् ब्रह्म ही सर्वत्र है।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":47008894976237,"sku":"","price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true},{"title":"Hardbound","offer_id":47008895009005,"sku":"","price":380.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789355210012-front_d229e1a7-acc0-4304-bb80-b762c5b5531f.jpg?v=1680031920"},{"product_id":"sherlock-holmes-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Sherlock Holmes Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"होम्स ने घंटी बजाते हुए जवाब दिया, ‘‘कुछ ठंडा मीट और एक गिलास बियर हो जाए, मैं इतना व्यस्त था कि मैं खाने के बारे में सोच भी न सका और मेरी आज की शाम के भी व्यस्त रहने की संभावना है। डॉक्टर, मुझे तुम्हारे साथ की जरूरत होगी।’’ ‘‘मुझे इसमें खुशी होगी।’’‘‘तुम्हें कानून तोड़ना बुरा तो नहीं लगेगा?’’‘‘बिलकुल नहीं।’’‘‘गिरफ्तार होने की संभावना से भी नहीं?’’‘‘अच्छे कारण के लिए, बिलकुल नहीं।’’‘‘हाँ, कारण तो बहुत ही अच्छा है।’’ ‘‘तब तो मैं तुम्हारा ही आदमी हूँ।’’‘‘मुझे यकीन था कि मैं तुम पर भरोसा कर सकता हूँ।’’‘‘मगर, तुम चाहते क्या हो?’’—इसी संग्रह से शेरलॉक होम्स की कहानियाँ दुनिया भर में जासूसी और साहसिक कारनामों के लिए जानी जाती हैं। कहानी के अंत तक रोमांच तथा सस्पेंस बना रहता है। बेहद पठनीय एवं रोमांच से भरपूर सर आर्थर कॉनन डॉयल सृजित पात्र शेरलॉक होम्स की लोकप्रिय कहानियों का पठनीय संग्रह।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":44038998163693,"sku":null,"price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789389982152_main.jpg?v=1680170448"},{"product_id":"ajneya-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Ajneya Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"स.ही. वात्स्यायन ‘अज्ञेय’(1911-1987)स.ही. वात्स्यायन ‘अज्ञेय’(1911-1987)कुशीनगर (देवरिया) में सन् 1911 में जन्म। पहले बारह वर्ष की शिक्षा पिता (डॉ. हीरानंद शास्त्री) की देख-रेख में घर ही पर। आगे की पढ़ाई मद्रास और लाहौर में। एम.ए. अंग्रेजी में प्रवेश, किंतु तभी देश की आजादी के लिए एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन में शामिल होना। शिक्षा में बाधा तथा सन् ’30 में बम बनाने के आरोप में गिरफ्तारी। जेल में रहकर ‘चिंता’ और ‘शेखर : एक जीवनी’ की रचना। क्रमशः सन् ’36-37 में ‘सैनिक’, ‘विशाल भारत’ का संपादन। सन् ’43 से ’46 तक ब्रिटिश सेना में भर्ती। सन् ’47-50 तक ऑल इंडिया रेडियो में काम। सन् ’43 में ‘तार सप्तक’ का प्रवर्तन और संपादन। क्रमशः दूसरे, तीसरे, चौथे सप्तक का संपादन। ‘प्रतीक’, ‘दिनमान’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘वाक्’, ‘एवरीमैन’ पत्र-पत्रिकाओं के संपादन से पत्रकारिता में नए प्रतिमानों की सृष्टि।देश-विदेश की अनेक यात्राएँ, जिनसे भारतीय सभ्यता की सूक्ष्म पहचान और पकड़, विदेश में भारतीय साहित्य और संस्कृति का अध्यापन। कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित, जिनमें ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ सन् ’79, यूगोस्लाविया का अंतरराष्ट्रीय कविता सम्मान ‘गोल्डन रीथ’ सन् ’83 भी शामिल। सन् ’80 से वत्सल निधि के संस्थापन और संचालन के माध्यम से साहित्य और संस्कृति के बोध निर्माण में कई नए प्रयोग।अज्ञेय का संपूर्ण रचना-संसार डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल के संपादन में प्रकाशित है।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt 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रहती?मैंने चाहे कहानियाँ लिखीं हों या उपन्यास या नाटक—भाषा के मामले में शुरू से ही मेरा नजरिया एक जैसा रहा है। शुरू से ही मैं पारदर्शिता को कथा-भाषा की अनिवार्यता मानती आई हूँ। भाषा ऐसी हो कि पाठक को सीधे कथा के साथ जोड़ दे...बीच में अवरोध या व्यवधान बनकर न खड़ी हो। ","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardbound","offer_id":44039010648301,"sku":null,"price":380.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390923991.main.jpg?v=1680171549"},{"product_id":"kamleshwar-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Kamleshwar Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"भारतीय कथाकारों में कमलेश्वर की लोकप्रियता का कोई जवाब नहीं। न तो उनसे पहले, न ही उनके बाद वैसी लोकप्रियता किसी और को हासिल हो सकी। उन्होंने आरंभ में ही ‘दूरदर्शन’ में लोकप्रिय कार्यक्रम ‘परिक्रमा’ शुरू किया। बाद में ‘दूरदर्शन’ के महानिदेशक भी बने। आँधी, मौसम, डाक बँगला, द बर्निंग ट्रेन, राम-बलराम जैसी सौ के करीब फिल्में और चंद्रकांता संतति जैसे तमाम सीरियल लिखनेवाले कमलेश्वर ने ‘सारिका’, ‘कथायात्रा’, ‘गंगा’ और ‘श्रीवर्षा’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया। जीवन के आखिरी समय तक अखबारों में कॉलम लिखनेवाले कमलेश्वर की कलम उनके हाथ से कभी छूटी नहीं।कमलेश्वर की पहली कहानी ‘फरार’ सन् 1946 में कानपुर से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक ‘जय भारत’ में छपी थी, जबकि ‘कॉमरेड भारती’ सन् 1948 में छपी, जिसे उनकी पहली कहानी मान लिया गया था। उन्होंने ढेर सारी कहानियाँ लिखीं, जिनमें से उनकी कुछ लोकप्रिय कहानियाँ इस संग्रह में प्रस्तुत हैं। कहानियाँ अलग-अलग आस्वाद लिये हुए हैं। आशा है सुधी पाठकों को ये कहानियाँ रुचेंगी और अपनी सी लगेंगी।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt 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समझने का आपका नजरिया भी बदल जाएगा।इन कहानियों के पठन, चिंतन व मनन के बाद आप स्वयं को एक नए इनसान के रूप में पाएँगे, जिसका दुनिया में कोई वैरी नहीं होगा।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardbound","offer_id":44039010975981,"sku":null,"price":380.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390923762.main.jpg?v=1680171560"},{"product_id":"subhadra-kumari-chauhan-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Subhadra Kumari Chauhan Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कहानियों में दहेज, परदा प्रथा, छुआछूत, स्त्री की पीड़ा का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है। उनकी कहानियों का फलक बहुत विस्तृत है। उनकी कहानियाँ बहुरंगी हैं। जहाँ एक ओर आजादी की लड़ाई के संदर्भों को रेखांकित करनेवाली कहानियाँ हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक कुरीतियों को उकेरनेवाली कहानियाँ भी हैं।सुभद्राजी की कहानियों में कहानीपन है, भाषा की रवानगी है, शब्दों का सटीक प्रयोग है और कहानी कला की दृष्टि से श्रेष्ठ कहानियों को द्योतित करनेवाले संवाद की शैली है।घरेलू जीवन की अंतरंग झाँकियाँ और अपने व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा के लिए व्यग्र स्त्री की छटपटाहट पहली बार किसी स्त्री की लेखनी द्वारा व्यक्त की गई। सुभद्राजी की कहानियों में भोगे हुए यथार्थ की अभिव्यक्ति है। कल्पना की झलक का दृष्टिगत होना तो रचनाओं में स्वाभाविक ही है। उनकी कितनी ही कहानियों में उनके अपने जीवन-प्रसंग या अनुभूति के मार्मिक अंश कथा का हलका सा आवरण ओढ़े आ ही गए हैं। सुभद्राजी की कहानियाँ कहानी-कला की दृष्टि से श्रेष्ठ कहानियाँ हैं, जिनमें उत्साह है, उमंग है, हर्ष है, विषाद है। जीवन के हर पहलू को आत्मसात् करती कहानियों का यह संग्रह पठनीय ही नहीं, संग्रहणीय भी है।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":47235657138413,"sku":"","price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true},{"title":"Hardbound","offer_id":47235657171181,"sku":"","price":380.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390923328.main.jpg?v=1680171561"},{"product_id":"jainendra-kumar-ki-lokpriya-kahaniyan-1","title":"Jainendra Kumar Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"जैनेन्द्र अपने समय के सर्वाधिक पढ़े जानेवाले लेखक रहे हैं। उनके द्वारा लिखी गई ‘जनता में’, ‘पत्नी’, ‘तत्सत्’, ‘पाजेब’ तथा ‘पढ़ाई’ आदि कहानियों में कुछ नए कथा-प्रसंग हैं। ‘जनता में’ कहानी रेल के तीसरे दर्जे के डिब्बे में यात्रा करने का अनुभव है। इसमें भी एक बालक है, जो दस यात्रियों के आकर्षण का केंद्र है, पर लेखक अंत में लोक-संशय से हिंदू-मुसलमान का प्रश्न उठा देता है। ‘पत्नी’ कहानी में पत्नी की सेवा, विवशता तथा भारतमाता की स्वतंत्रता के लिए हिंसा या अहिंसा के रास्ते पर मित्रों में बहस होती है। कालीचरण का मत है कि आतंक विवेक को कुंठित करता है और उसके मित्रों का मत है कि बाघ को मारने के लिए आतंकवाद जरूरी है। ‘तत्सत्’ एक दार्शनिक कहानी है, जो आदमी तथा जंगल के वृक्षों तथा जानवरों के माध्यम से कही गई है। बड़ दादा नायक है और सभी इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वह ही अर्थात् ब्रह्म ही सर्वत्र है।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardbound","offer_id":44039011041517,"sku":null,"price":380.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390923403.main.jpg?v=1680171563"},{"product_id":"shivprasad-singh-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Shivprasad Singh Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"नई कहानी आंदोलन के समय में डॉ. शिवप्रसाद सिंह की चर्चा ‘नन्हों’ और ‘दादी माँ’ जैसी कहानियों के कारण हुई। कहानियों से उन्हें भरपूर प्रतिष्ठा मिली। इन दोनों कहानियों के साथ ही ‘धरातल’ और ‘बेहया’, ‘कर्मनाशा की हार’, ‘मुर्दासराय’, ‘आर-पार की माला’, ‘इन्हें भी इंतजार है’, ‘वृंदा महाराज’ आदि कहानियाँ भी काफी चर्चित हुईं।डॉ. शिवप्रसाद सिंहजी की कहानियाँ प्रायः ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। उन्होंने लिखा भी है—‘‘मेरी जिंदगी में गाँव एक ऐसी हकीकत है, जिसे मैं चाहकर भी काट नहीं सकता। गाँव की अछोर हरियाली में डूबे सीमांत, फसलों के रंग-बिरंगे गलीचे बिछाकर किसी अनागत की प्रतीक्षा में डूबी धरती, सरसों, जलकुंभी और झरबेरी के जंगली फूलों से मदहोश वातावरण के बीच अपनी सामान्य जिंदगी के लिए संघर्षरत किसान मेरी कहानियों के अविभाज्य अंग हैं। शहर के जीवन ने जहाँ एक ओर मेरे आधुनिकता-बोध को निरंतर तीन और सक्रिय बनाया है, वहीं गाँव के जीवन की धड़कनें, जो अब भी सड़ी-गली परंपरा और कूटस्थ रूढि़यों का कचरा ढोती हुई कराह रही हैं, मेरे कहानीकार के लिए सदा एक चुनौती रही हैं।’’वरिष्ठ कथाकार डॉ. शिवप्रसाद सिंह की संवेदनशील, मार्मिक तथा युग-प्रर्वतक लोकप्रिय कहानियों का पठनीय संकलन।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardbound","offer_id":44039011139821,"sku":null,"price":380.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390923243.main.jpg?v=1680171571"},{"product_id":"roop-singh-chandel-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Roop Singh Chandel Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चंदेल बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। कहानी, उपन्यास, संस्मरण, आलोचना आदि गद्य की अनेक विधाओं में उन्होंने सृजन किया है। आलोचकों ने उन्हें लोकधर्मी कथाकार कहा है। युवा आलोचक डॉ. बिभा कुमारी के अनुसार, कथाकार रूपसिंह चंदेल की कथाओं में एक ओर मिट्टी की सोंधी खुशबू की अनुभूति प्राप्त होती है तो दूसरी ओर महानगरीय जीवन, टूटते संबंध, मशीनी जीवन, मनुष्य द्वारा मनुष्य का उपयोग किया जाना इत्यादि विसंगतियों का जीवंत और साक्षात् चित्रण है। वरिष्ठ आलोचक डॉ. पंकज साहा के अनुसार, विश्व के महान् लेखक अल्बेयर कामू के लेखन में हिंसा, अत्याचार एवं क्रूरता के खिलाफ जो स्वर हैं, वही स्वर चंदेलजी की रचनाओं में भी देखने को मिलते हैं। कामू की तरह चंदेलजी की भी सृजनात्मक पारदर्शिता अपने समय की मानवीय चेतना एवं उसकी समस्याओं का उद्घाटन करती है। युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार मानते हैं कि रूपसिंह चंदेल अपनी कहानियों में जब यथार्थ का चित्र प्रस्तुत करते हैं, तब वे कतई आदर्शवादी नहीं रहते हैं, न ही वे सच को छिपानेवाले आदर्श से सम्मोहित हैं। यथार्थ यहाँ कटु यथार्थ के रूप में आता है और वह पाठक को झकझोरते हुए झूठी मान-मर्यादा, नैतिक पतन, मूल्यहीनता और शोषण में संलग्न लोकतंत्र के प्रहरियों पर प्रहार करता है।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardbound","offer_id":44039011205357,"sku":null,"price":380.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390923168.main.jpg?v=1680171579"},{"product_id":"pandey-bechan-sharma-ugra-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Pandey Bechan Sharma Ugra Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ असाधारण रचनाकार और सृजक थे। सारा हिंदी जगत् एक अरसे तक ‘उग्र’ की उग्रता से काँपता रहा, उनसे लोहा लेने में डरता रहा; मगर ‘उग्र’ जी का बाह्य व्यक्तित्व देख हिंदी जगत् ने उन्हें जीते जी उपेक्षा के गर्त में और विरोध की खाइयों में ढकेल दिया। यह उनके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी व विडंबना थी। उनके अंतरंग कोमल पक्ष को, जो नारियल की तरह बाहर से कठोर और अंदर से मृदु व कोमल था, कोई नहीं जान पाया।‘उग्र’ के संपूर्ण व्यक्तित्व पर विगत 44 वर्षों से अनथक अनवरत परिश्रम करते हुए उनके कृतित्व के अनछुए पहलुओं पर कार्य किया है। अब तक ‘उग्र’ पर, उनके साहित्य पर मेरी 24 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनका हिंदी जगत् ने सम्यक् स्वागत किया है। हाँ, समीक्षकों से अवश्य हमेशा की तरह जैसा ‘उग्र’ के साथ हुआ, ‘उग्र’ के साहित्य को भी उपेक्षा और अवमूल्यन मिला है। खैर—मेरे लबों पे दुआउसके लबों पे गाली,जिसके अंदर जो था वही तो बाहर निकला।इस क्रम में निवेदित है ‘उग्र’ की कलम से निःसृत मार्मिक और हृदयस्पर्शी लोकप्रिय कहानियों का संग्रह।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardbound","offer_id":44039011565805,"sku":null,"price":380.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390923083.main.jpg?v=1680171582"},{"product_id":"subhadra-kumari-chauhan-ki-lokpriya-kahaniyan-1","title":"Subhadra Kumari Chauhan Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कहानियों में दहेज, परदा प्रथा, छुआछूत, स्त्री की पीड़ा का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है। उनकी कहानियों का फलक बहुत विस्तृत है। उनकी कहानियाँ बहुरंगी हैं। जहाँ एक ओर आजादी की लड़ाई के संदर्भों को रेखांकित करनेवाली कहानियाँ हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक कुरीतियों को उकेरनेवाली कहानियाँ भी हैं।सुभद्राजी की कहानियों में कहानीपन है, भाषा की रवानगी है, शब्दों का सटीक प्रयोग है और कहानी कला की दृष्टि से श्रेष्ठ कहानियों को द्योतित करनेवाले संवाद की शैली है।घरेलू जीवन की अंतरंग झाँकियाँ और अपने व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा के लिए व्यग्र स्त्री की छटपटाहट पहली बार किसी स्त्री की लेखनी द्वारा व्यक्त की 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आता कि उस समय लिखने को लेकर बहुत जोश, बेचैनी या बेताबी जैसा कुछ था। जोश का सिलसिला तो शुरू हुआ था कहानी के छपने से, भैरवजी के प्रोत्साहन और पाठकों की प्रतिक्रिया से।किसी भी रचना के छपते ही इस इच्छा का जगना कि अधिक-से-अधिक लोग इसे पढ़ें, केवल पढ़ें ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ें भी—संवेदना के स्तर पर उसके भागीदार भी बनें, यानी कि एक की कथा-व्यथा अनेक की बन सके, बने...केवल मेरे ही क्यों, अधिकांश लेखकों के लिखने के मूल में एक और अनेक के बीच सेतु बनने की यह कामना ही निहित नहीं रहती?मैंने चाहे कहानियाँ लिखीं हों या उपन्यास या नाटक—भाषा के मामले में शुरू से ही मेरा नजरिया एक जैसा रहा है। शुरू से ही मैं पारदर्शिता को कथा-भाषा की अनिवार्यता मानती आई हूँ। भाषा ऐसी हो कि पाठक को सीधे कथा के साथ जोड़ दे...बीच में अवरोध या व्यवधान बनकर न खड़ी हो। ","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"PaperBack","offer_id":44039011729645,"sku":null,"price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390900879.main.jpg?v=1680171591"},{"product_id":"shailesh-matiyani-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Shailesh Matiyani Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"शैलेश मटियानी हिंदी के उन गिने-चुने कथाकारों में से एक हैं, जो रचना को जिंदगी से इस तरह उठा लेते हैं कि अनुभव और कल्पना एकमेक होकर एक विशेष प्रकार की दुनिया ही रचने लगते हैं। मटियानीजी का अपनी कहानी के जरिए जिंदगी को देखने का नजरिया अलग ही है। वे अपनी हर कहानी में जैसे एक नई बात खोज लाना चाहते हैं। उनके विपुल लेखन संसार में से चयनित प्रस्तुत लोकप्रिय कहानियाँ अपने-अपने कारणों तथा कथ्य की विविधता से आकर्षक हैं। इन कहानियों में वर्णित चरित्र, स्थितियाँ, परिवेश और वातावरण ऐसा है कि पाठक लंबे समय तक उनके प्रभाव में रहता है। उनकी भाषा, कहन, शिल्प और कथा की प्रस्तुति अनायास ऐसा चमत्कार पैदा करती है कि पढ़नेवाला उसी कथादेश का नागरिक हो जाता है। इतना ही नहीं, कहानी पाठक केहृदय में उतरती चली जाती हैं।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardbound","offer_id":44039011795181,"sku":null,"price":380.0,"currency_code":"INR","in_stock":true},{"title":"PaperBack","offer_id":44039011827949,"sku":null,"price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390923007.main.jpg?v=1680171592"},{"product_id":"shivprasad-singh-ki-lokpriya-kahaniyan-1","title":"Shivprasad Singh Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"नई कहानी आंदोलन के समय में डॉ. शिवप्रसाद सिंह की चर्चा ‘नन्हों’ और ‘दादी माँ’ जैसी कहानियों के कारण हुई। कहानियों से उन्हें भरपूर प्रतिष्ठा मिली। इन दोनों कहानियों के साथ ही ‘धरातल’ और ‘बेहया’, ‘कर्मनाशा की हार’, ‘मुर्दासराय’, ‘आर-पार की माला’, ‘इन्हें भी इंतजार है’, ‘वृंदा महाराज’ आदि कहानियाँ भी काफी चर्चित हुईं।डॉ. शिवप्रसाद सिंहजी की कहानियाँ प्रायः ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित हैं। उन्होंने लिखा भी है—‘‘मेरी जिंदगी में गाँव एक ऐसी हकीकत है, जिसे मैं चाहकर भी काट नहीं सकता। गाँव की अछोर हरियाली में डूबे सीमांत, फसलों के रंग-बिरंगे गलीचे बिछाकर किसी अनागत की प्रतीक्षा में डूबी धरती, सरसों, जलकुंभी और झरबेरी के जंगली फूलों से मदहोश वातावरण के बीच अपनी सामान्य जिंदगी के लिए संघर्षरत किसान मेरी कहानियों के अविभाज्य अंग हैं। शहर के जीवन ने जहाँ एक ओर मेरे आधुनिकता-बोध को निरंतर तीन और सक्रिय बनाया है, वहीं गाँव के जीवन की धड़कनें, जो अब भी सड़ी-गली परंपरा और कूटस्थ रूढि़यों का कचरा ढोती हुई कराह रही हैं, मेरे कहानीकार के लिए सदा एक चुनौती रही हैं।’’वरिष्ठ कथाकार डॉ. शिवप्रसाद सिंह की संवेदनशील, मार्मिक तथा युग-प्रर्वतक लोकप्रिय कहानियों का पठनीय संकलन।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"PaperBack","offer_id":44039012188397,"sku":null,"price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390900862.main.jpg?v=1680171603"},{"product_id":"kamleshwar-ki-lokpriya-kahaniyan-1","title":"Kamleshwar Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"भारतीय कथाकारों में कमलेश्वर की लोकप्रियता का कोई जवाब नहीं। न तो उनसे पहले, न ही उनके बाद वैसी लोकप्रियता किसी और को हासिल हो सकी। उन्होंने आरंभ में ही ‘दूरदर्शन’ में लोकप्रिय कार्यक्रम ‘परिक्रमा’ शुरू किया। बाद में ‘दूरदर्शन’ के महानिदेशक भी बने। आँधी, मौसम, डाक बँगला, द बर्निंग ट्रेन, राम-बलराम जैसी सौ के करीब फिल्में और चंद्रकांता संतति जैसे तमाम सीरियल लिखनेवाले कमलेश्वर ने ‘सारिका’, ‘कथायात्रा’, ‘गंगा’ और ‘श्रीवर्षा’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया। जीवन के आखिरी समय तक अखबारों में कॉलम लिखनेवाले कमलेश्वर की कलम उनके हाथ से कभी छूटी नहीं।कमलेश्वर की पहली कहानी ‘फरार’ सन् 1946 में कानपुर से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक ‘जय भारत’ में छपी थी, जबकि ‘कॉमरेड भारती’ सन् 1948 में छपी, जिसे उनकी पहली कहानी मान लिया गया था। उन्होंने ढेर सारी कहानियाँ लिखीं, जिनमें से उनकी कुछ लोकप्रिय कहानियाँ इस संग्रह में प्रस्तुत हैं। कहानियाँ अलग-अलग आस्वाद लिये हुए हैं। आशा है सुधी पाठकों को ये कहानियाँ रुचेंगी और अपनी सी लगेंगी।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"PaperBack \/ Paperback","offer_id":44039012221165,"sku":null,"price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390900794.main.jpg?v=1680171605"},{"product_id":"acharya-chatursen-ki-lokpriya-kahaniyan-1","title":"Acharya Chatursen Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"आज के युग की भौतिकता और यंत्रवतता से यदि आप बेजार हो गए हों तो हिंदी के यशस्वी रचनाकार आचार्य चतुरसेन की ये कहानियाँ आपको मानवीय स्वाभाविकता व संवेदनशीलता, त्याग, समर्पण एवं सेवा के सुखद संसार में ले जाएँगी।सामान्य जीवन से और जमीनी वास्तविकता से जुड़े रहना आचार्यजी की रचनाओं की अपनी ही विशेषता है, इसी कारण आप उनकी रचनाओं के पात्रों को न केवल हर रूप में पसंद करते हैं, अपितु उनको प्यार भी करते हैं। यही कारण है कि ये कहानियाँ जीवन के प्रति आपके दृष्टिकोण में न केवल परिवर्तन लाएँगी, बल्कि जीवन और जीवन की घटनाओं को देखने तथा समझने का आपका नजरिया भी बदल जाएगा।इन कहानियों के पठन, चिंतन व मनन के बाद आप स्वयं को एक नए 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हिंसा, अत्याचार एवं क्रूरता के खिलाफ जो स्वर हैं, वही स्वर चंदेलजी की रचनाओं में भी देखने को मिलते हैं। कामू की तरह चंदेलजी की भी सृजनात्मक पारदर्शिता अपने समय की मानवीय चेतना एवं उसकी समस्याओं का उद्घाटन करती है। युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार मानते हैं कि रूपसिंह चंदेल अपनी कहानियों में जब यथार्थ का चित्र प्रस्तुत करते हैं, तब वे कतई आदर्शवादी नहीं रहते हैं, न ही वे सच को छिपानेवाले आदर्श से सम्मोहित हैं। यथार्थ यहाँ कटु यथार्थ के रूप में आता है और वह पाठक को झकझोरते हुए झूठी मान-मर्यादा, नैतिक पतन, मूल्यहीनता और शोषण में संलग्न लोकतंत्र के प्रहरियों पर प्रहार करता है।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"PaperBack","offer_id":44039012450541,"sku":null,"price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390900787.main.jpg?v=1680171611"},{"product_id":"pandey-bechan-sharma-ugra-ki-lokpriya-kahaniyan-1","title":"Pandey Bechan Sharma Ugra Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ असाधारण रचनाकार और सृजक थे। सारा हिंदी जगत् एक अरसे तक ‘उग्र’ की उग्रता से काँपता रहा, उनसे लोहा लेने में डरता रहा; मगर ‘उग्र’ जी का बाह्य व्यक्तित्व देख हिंदी जगत् ने उन्हें जीते जी उपेक्षा के गर्त में और विरोध की खाइयों में ढकेल दिया। यह उनके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी व विडंबना थी। उनके अंतरंग कोमल पक्ष को, जो नारियल की तरह बाहर से कठोर और अंदर से मृदु व कोमल था, कोई नहीं जान पाया।‘उग्र’ के संपूर्ण व्यक्तित्व पर विगत 44 वर्षों से अनथक अनवरत परिश्रम करते हुए उनके कृतित्व के अनछुए पहलुओं पर कार्य किया है। अब तक ‘उग्र’ पर, उनके साहित्य पर मेरी 24 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनका हिंदी जगत् ने सम्यक् स्वागत किया है। हाँ, समीक्षकों से अवश्य हमेशा की तरह जैसा ‘उग्र’ के साथ हुआ, ‘उग्र’ के साहित्य को भी उपेक्षा और अवमूल्यन मिला है। खैर—मेरे लबों पे दुआउसके लबों पे गाली,जिसके अंदर जो था वही तो बाहर निकला।इस क्रम में निवेदित है ‘उग्र’ की कलम से निःसृत मार्मिक और हृदयस्पर्शी लोकप्रिय कहानियों का संग्रह।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"PaperBack","offer_id":44039012483309,"sku":null,"price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390900503.main.jpg?v=1680171612"},{"product_id":"ramesh-pokhriyal-nishank-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Ramesh Pokhriyal Nishank Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जी का साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। समय और समाज की विद्रूपता को रेखांकित करना, विसंगतियों को उकेरना और विषमताओं पर कलम चलाना, निशंकजी के साहित्य सृजन का एक ऐसा पक्ष है, जो साहित्य को आमजन का साहित्य बनाता है। निशंकजी की कहानियों में समाहित यथार्थ एक बदली हुई रचनाशीलता का गहरा अहसास कराता है। ये कहानियाँ हर्ष, विषाद, सुख, दुःख, संघर्ष और जिजीविषा की कहानियाँ हैं। इन कहानियों में मानव-मन की उन अतल गहराइयों को नाप लेने की ताकत भी दिखलाई देती है, जिन्हें पाकर कोई भी लेखक ‘लेखक’ हो जाने का विश्वास सँजो सकता है। कोमल शरीर और सबल आत्मा की ये कहानियाँ पढ़कर विश्वास हो जाता है कि लेखक के पास केवल आज की भयावह दुनिया का सच ही नहीं है, बल्कि उस सच को काटने के लिए पैनी कलम भी है।इस संग्रह की कहानियाँ रचनाशीलता के तथाकथित साँचों को तोड़ते हुए अत्यंत सरल भाषा और वाक्य-विन्यास से भाषावादी तराश और पच्चीकारी को नकारती हैं। भाषा से अलग तंत्र, व्यवस्था, समाज और मनुष्य की निपट निरीहता को जितने सही संदर्भों में लेखक ने समझा है, उनकी वह चेतना और जागरूकता कहानी के स्तर पर हमें दंशित करती है और हमारी नागरिक तथा सामाजिक चेतना को बुरी तरह आहत भी करती है।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardbound","offer_id":44039018545389,"sku":null,"price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true},{"title":"Paperback","offer_id":44039018578157,"sku":null,"price":380.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390378470_main.jpg?v=1680172022"},{"product_id":"sindhi-ki-lokpriya-kahaniyan-1","title":"Sindhi Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"बाग्ला साहित्य बड़ा सरस और क्रांतिकारी रहा है। बांग्ला में उपन्यास तथा कहानी विधा को खूब प्रश्रय मिला। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय उपन्यास के साथ-साथ छोटी कहानियाँ भी लिखते रहे। स्वर्णकुमारी देवी एवं कुछ अन्य महिलाएँ भी पत्र-पत्रिकाओं में बांग्ला कहानियाँ प्रकाशित करवाती रहीं। किंतु बांग्ला कहानी, गल्प-रचना के आदर्श रूप का प्रकाशन 1877 ईस्वी में प्रकाशित ‘रामेश्वरेर अदृश्य’ नामक कहानी द्वारा हुआ, जिसे संजीव चंद चट्टोपाध्याय ने प्रकाशित करवाया था। अंग्रेजी लघु-कथाओं के समानांतर बांग्ला कहानी का अपना खुद का रचना-विधान-शिल्प और कथ्य सर्वप्रथम कवि रवींद्रनाथ ठाकुर की कहानी ‘क्षुधित पाषाण’ से सन् 1890 ई. में स्वाभाविक रूप से संरचित हुआ। कहानी की आकृति और प्रकृति निश्चित हो जाने के उपरांत बांग्ला कहानी क्रमश: एक से एक ऊँचाइयाँ छूती गई। ऐसे ही कथारस से परिपूर्ण बांग्ला के श्रेष्ठ कथाकारों की लोकप्रिय कहानियाँ इस संग्रह में संकलित हैं। ये कहानियाँ एक ओर जहाँ बांग्ला समाज के उत्थान, विसंगति एवं ऊहापोह को दिग्दर्शित करती हैं, वहीं रोचक होने के कारण पाठकों का भरपूर मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन भी करती हैं।","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardbound","offer_id":44039019069677,"sku":null,"price":380.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/9789390923953.jpg?v=1680172090"},{"product_id":"malyalam-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Malyalam Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eमलयालम साहित्य की सर्वाधिक सशत, समृद्ध एवं श्रेष्ठ विधा के रूप में स्वीकृति प्राप्त कहानी विधा की प्रतिनिधि एवं लोकप्रिय कहानियों का यह संकलन पठनीयता तथा रोचकता से भरपूर है। इसमें संकलित कहानियाँ मलयालम कहानी के क्रमिक विकास तथा उस विकास यात्रा के दौरान संवेदना और संरचना के क्षेत्र में आए बदलावों को स्पष्ट रेखांकित करनेवाली हैं। मलयालम की लोकप्रिय कहानियों का यह हिंदी अनुवाद संकलन एक ओर भारतीय भाषाओं में विरचित कहानी साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन को बढ़ावा देगा तो दूसरी ओर मलयालम कहानियों के अनुवाद को अन्यान्य भाषाओं के लिए सुगम भी बना देगा। भारतीय साहित्य तथा तुलनात्मक साहित्य के अध्येताओं व शोधार्थियों के लिए यह संकलन सर्वथा उपयोगी सिद्ध होगा।\u003c\/span\u003e","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":44113657299181,"sku":null,"price":313.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/NbG7oqBLp7.jpg?v=1685427091"},{"product_id":"telugu-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Telugu Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eतेलुगु-साहित्य में छोटी कहानियों का आरंभ 16वीं शतादी के उारार्द्ध में हुआ। परंतु सबसे पहली मौलिक तेलुगु-कहानी आंध्र के महाकवि श्री गुरजाड अप्पाराव ने सन् 1610 में लिखी थी। तेलुगु-साहित्य में छोटी कहानी का श्रीगणेश अप्पारावजी ने ही किया। उनकी कहानियों में व्यंग्य की प्रधानता है। ग्राम्य-जीवन का चित्रण यों तो कई कहानीकारों ने किया है, पर श्रीकविकोंडल वेंकटेश्वरराव की कहानियों में जो चित्रण मिलता है, वह अन्यत्र नहीं।\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eतेलुगु-कहानी-साहित्य में चलम् के प्रवेश ने या भाषा, या भाव, सब में क्रांति पैदा की है। चलम् ने सभी क्षेत्रों में विद्रोह का झंडा ऊँचा किया है। श्रीसुखरम् प्रताप रेड्डी ने यद्यपि बहुत कम कहानियाँ लिखी हैं, फिर भी कहानी-साहित्य में उन्हें उच्च स्थान प्राप्त है। उन्हें तेलुगु-कहानी-साहित्य का गुलेरी कहें तो अतिशयोति न होगी। तेलुगु-कहानियों में हास्यरस का अभाव था। उसकी पूर्ति श्रीमुनिमाणियम् नरसिंहराव ने की। भवसागर को लोग दु:खमय मानते हैं, पर नरसिंहराव ने आनंदमय माना और अपनी रचनाओं से सिद्ध भी किया। इनको कुछ लोग ‘हास्य चक्रवर्ती’ मानते हैं। इनकी कहानियों में अधिकतर पारिवारिक समस्याएँ ही मिलेंगी।\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eतेलुगु-साहित्य में भावना-प्रधान तथा ऐतिहासिक प्रेम कहानियों के लिए श्री अडवि बापिराजु प्रसिद्ध हैं। इनकी कहानियों में संगीत, चित्रकला और अभिनय का वर्णन उल्लेखनीय है। \u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eतेलुगु भाषा के श्रेष्ठ कथाकारों की लोकप्रिय कहानियों का संकलन।\u003c\/span\u003e","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":44113659003117,"sku":null,"price":313.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/2ti8idotON.jpg?v=1685427239"},{"product_id":"kannad-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Kannad Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eकन्नड़ में कहानी साहित्य की अत्यंत पुरानी परंपरा है। कन्नड़ में आधुनिक कहानियों की परंपरा अन्य भारतीय भाषाओं के आधुनिक साहित्य की तरह उन्नीसवीं सदी के अंतिम भाग तथा बीसवीं सदी के आरंभकाल से शुरू होती है।\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eभारतीय साहित्य में ही प्रमुख रूप से  उभरकर  दिखनेवाले  वरिष्ठ साहित्यकारों के समकालीन होकर कई युवा लेखकों के परिश्रम के फलस्वरूप कन्नड़ साहित्य भारतीय साहित्य की अग्रपंति में खड़े होने की स्थिति में पहुँचा है। सार के दशक के बाद आगे बढ़कर महिला संवेदना से परिपूर्ण महिला जीवन के दु:ख-दर्द, शोषण, महिला-पुरुष के बीच सामाजिक दृष्टि, भू्रण हत्या, कामकाजी महिला की स्थिति को लेकर लिखी गई कहानियाँ; मुसलिम संवेदना—जैसे बोळुवार मोहम्मद कुभ, फकीर अहमद काटपाडी, रंजान, दर्गा, सारा अबूबकर जैसे लेखकों द्वारा रचित कहानियाँ कन्नड़ भाषा को भारतीय साहित्य में विशिष्ट स्थान दिलवाती हैं।\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eकन्नड़ के मूर्धन्य कथाकारों के विशिष्ट लेखन की झलक है ‘कन्नड़ की लोकप्रिय कहानियाँ’।\u003c\/span\u003e","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":44113661427949,"sku":null,"price":313.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/Ok3RU4hjo0.jpg?v=1685427393"},{"product_id":"vrindavan-lal-verma-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Vrindavan Lal Verma ki Lokpriya Kahaniyan","description":"\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eरज्जब को स्मरण हो आया कि पत्नी के बुखार की वजह से अंटी का बोझ कम कर देना पड़ा है और स्मरण हो आया गाड़ीवान का वह हठ, जिसके कारण उसको कुछ पैसे व्यर्थ ही देने पड़े थे। उसको गाड़ीवान पर क्रोध था, परंतु उसको प्रकट करने की उस समय उसके मन में इच्छा न थी।\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eबातचीत करके रास्ता काटने की कामना से उसने वार्त्तालाप आरंभ किया—\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘गाँव तो यहाँ से दूर मिलेगा।’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘बहुत दूर। वहीं ठहरेंगे।’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘किसके यहाँ?’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘किसीके यहाँ भी नहीं। पेड़ के नीचे। कल सवेरे ललितपुर चलेंगे।’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘कल का फिर पैसा माँग उठना।’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘कैसे माँग उठूँगा? किराया ले चुका हूँ। अब फिर कैसे माँगूँगा?’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘जैसे आज गाँव में हठ करके माँगा था। बेटा, ललितपुर होता तो बतला देता।’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘क्या बतला देते? क्या सेंत-मेंत गाड़ी में बैठना चाहते थे?’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘क्यों बे, रुपए लेकर भी सेंत-मेंत का बैठना कहता है! जानता है, मेरा नाम रज्जब है। अगर बीच में गड़बड़ करेगा तो यहीं छुरी से काटकर फेंक दँूगा।’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eरज्जब क्रोध को प्रकट करना नहीं चाहता था, परंतु शायद अकारण ही वह भलीभाँति प्रकट हो गया।\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e—इसी संग्रह से\u003c\/span\u003e","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":44113669718253,"sku":null,"price":313.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/dv9CKdIf8W.jpg?v=1685428126"},{"product_id":"dharamveer-bharti-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Dharamveer Bharti Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eकुबड़ी-कुबड़ी का हेराना?’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘‘सुई हेरानी।’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘‘सुई लैके का करबे?’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘‘कंथा सीबै!’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘‘कंथा सीके का करबे?’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘‘लकड़ी लाबै!’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘‘लकड़ी लाय के का करबे?’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘‘भात पकइबे!’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘‘भात पकाय के का करबे?’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘‘भात खाबै!’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e‘‘भात के बदले लात खाबे।’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eऔर इससे पहले कि कुबड़ी बनी हुई मटकी कुछ कह सके, वे उसे जोर से लात मारते और मटकी मुँह के बल गिर पड़ती। उसकी कुहनियाँ और घुटने छिल जाते, आँख में आँसू आ जाते और ओठ दबाकर वह रुलाई रोकती। \u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eबच्चे खुशी से चिल्लाते, ‘‘मार डाला कुबड़ी को! मार डाला कुबड़ी को!’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e—इसी पुस्तक से\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px;\"\u003eसाहित्य एवं पत्रकारिता को नए प्रतिमान देनेवाले प्रसिद्ध साहित्यकार एवं संपादक श्री धर्मवीर भारती के लेखन ने सामान्य जन के हृदय को स्पर्श किया। उनकी कहानियाँ मर्मस्पर्शी, संवेदनशील तथा पठनीयता से भरपूर हैं। प्रस्तुत है उनकी ऐसी कहानियाँ, जिन्होंने पाठकों में अपार लोकप्रियता अर्जित की।\u003c\/span\u003e","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":44113673289965,"sku":null,"price":313.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/4G0509KJYk.jpg?v=1685428449"},{"product_id":"satyajeet-ray-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"Satyajeet Ray Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003eअरे हाँ, क्षमा करें। भूमिका एक पादचारी (अर्थात् पैदल यात्री) की है। एक अन्यमनस्क, गुस्सैल पैदल यात्री। वैसे, क्या आपके पास कोई जाकेट है, जो गरदन तक बंद हो जाए?’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘शायद एक है। क्या पुराने रिवाज की?’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘हाँ। आप वही पहनेंगे। किस रंग की है?’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘बादामी रंग की। लेकिन गरम है।’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘वह चलेगी। कहानी जाड़ों के समय की है, इसलिए वह गरम जाकेट ठीक रहेगी। कल ठीक 8.30 बजे सुबह, फेराडे हाउस।’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003eपतोल बाबू के मन में अचानक एक महत्त्वपूर्ण सवाल उठा।\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘मैं समझता हूँ, इस भूमिका में कुछ संवाद भी होंगे?’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘निश्चित रूप से। बोलनेवाली भूमिका है। आप पहले अभिनय कर चुके हैं, क्या यह सच नहीं है?’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘खैर, वास्तव में, हाँ...’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e—इसी संग्रह से\u003c\/span\u003e","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":44113674993901,"sku":null,"price":265.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/EYVlyJ2piD.jpg?v=1685428557"},{"product_id":"r-k-narayan-ki-lokpriya-kahaniyan","title":"R.K. Narayan Ki Lokpriya Kahaniyan","description":"\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\"अरे! सिरदर्द हो रहा है।’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘‘इतवार को आवारागर्दी कम किया करो, सोमवार को सिरदर्द नहीं होगा।’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003eस्वामी जानता था कि उसके पिता कितने सख्त हैं, इसलिए उसने तुरंत दूसरा बहाना बनाया, ‘‘मैं इतनी देर से कक्षा में नहीं जा सकता।’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘‘मैं मानता हूँ, लेकिन फिर भी जाना पड़ेगा। गलती तुम्हारी है।न जाने का फैसला लेने से पहले तुम्हें मुझसे पूछना चाहिए था।’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘‘इतनी देर से जाऊँगा तो टीचर क्या सोचेंगे!’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘‘उन्हें भी बता देना कि सिर में दर्द हो रहा था, इसलिए देर हो गई।’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘‘मैं ऐसा कहूँगा तो वह मुझे मारेंगे।’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘‘मारेंगे? कौन मारेंगे? देखता हूँ। नाम बताओ उनका।’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘‘सैमुअल।’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘‘क्या वह बच्चों को मारते हैं?’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘‘बहुत! बहुत मारते हैं, खासकर उन लड़कों को जो कुछ ज्यादा ही देर से आते हैं। कुछ दिन पहले देर से आनेवाले एक लड़के को उन्होंने कक्षा के एक कोने में पूरे पीरियड घुटनों पर खड़े रखा था। इतने से भी उनका जी नहीं भरा। उसे छड़ी से छह बार पीटा और कान भी मरोड़े। मैं सैमुअल सर की क्लास में देर से बिल्कुल भी नहीं जाना चाहूँगा।’’\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e—इसी संग्रह से\u003c\/span\u003e\u003cbr style=\"margin: 0px; padding: 0px; box-sizing: border-box; outline: none; -webkit-tap-highlight-color: rgba(0, 0, 0, 0); color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e\u003cspan style=\"color: #5d5d5d; font-family: Raleway, sans-serif; font-size: 16px; text-align: justify;\"\u003e‘मालगुडी डेज’ जैसी लोकप्रिय रचना के महान् लेखक आर.के. नारायण ने उपन्यास के अलावा हमारे आस-पास के परिवेश की बहुत मर्मस्पर्शी कहानियाँ भी लिखी हैं। प्रस्तुत संग्रह में उनकी चर्चित और लोकप्रिय कहानियाँ चुनी गई हैं, जो हर आयुवर्ग के पाठकों को पसंद आएँगी।\u003c\/span\u003e","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":44113677877485,"sku":null,"price":313.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/I332TViPAP.jpg?v=1685428757"}],"url":"https:\/\/rekhtabooks.com\/hi\/collections\/lokpriya-kahaniyan-must-read-stories-by-popular-indian-writers.oembed?page=2","provider":"Rekhta Books","version":"1.0","type":"link"}