{"title":"Kuber Nath Rai Books","description":"","products":[{"product_id":"mahajagran-ka-shalaka-purush-1","title":"Mahajagran ka shalaka purush","description":"","brand":"Setu Prakashan","offers":[{"title":"Hardbound","offer_id":42956954730733,"sku":null,"price":623.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/7aB72On0lz_39ec746d-0fe1-4124-9481-d4924fc0573c.jpg?v=1680015685"},{"product_id":"ramayan-mahatirtham","title":"Ramayan Mahatirtham","description":"\u003cp\u003eरामायण महातीर्थम् - प्रख्यात ललित निबन्धकार और मनीषी चिन्तक स्व. कुबेरनाथ राय की यह पुस्तक 'रामायण महातीर्थम्' स्वयं श्री राय द्वारा संयोजित उनकी अन्तिम कृति है, अतः इसके प्रकाशन का एक ऐतिहासिक महत्त्व भी है। संयोगवश इस कृति का प्रकाशन ऐसे समय में हो रहा है जब राम विचार और विवाद दोनों के केन्द्र में हैं। इस दृष्टि से 'रामायण महातीर्थम्'  जैसे ग्रन्थ का महत्त्व और बढ़ जाता है।राम का आनन्दमय चेतना स्वरूप कुबेरनाथ राय को सदैव सम्मोहित करता रहा है। अपने अन्तिम दिनों में वे रामकथा के भावात्मक और बौद्धिक सौन्दर्य के अध्ययन और उद्घाटन में एकाग्र थे। उसी का प्रतिफल है 'रामायण महातीर्थम्' । कुबेरनाथ जी ने इसमें राम और रामकथा को नये बौद्धिक सम्मोहन से मण्डित किया है—एक नयी लालित्यपूर्ण भंगिमा के साथ। उनका मानना है कि अनहदनाद के साधना-शिखर पर स्थित राम को पहचानने का अर्थ ही भारतीयता के सारे स्तरों के आदर्श रूप को, भारत के सहज चिन्मय रूप को पहचानना है।  पुस्तक में रामकथा में निहित आर्ष भावना और विचारों का विस्तृत और गम्भीर विवेचन है। ज्ञानपीठ की एक विशेष प्रस्तुति।\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Hardbound","offer_id":43057273700589,"sku":null,"price":577.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/1iIREQsEB_2BcZu3t89gE0KVCK8GyGG1c_2c2a819e-fdb5-49ff-bee4-cd022da0679e.jpg?v=1680020223"},{"product_id":"ras-aakhetak","title":"Ras Aakhetak","description":"\u003cp\u003eकुबेरनाथ राय के निबंधों में उनके सांस्कृतिक ज्ञान की प्रतिच्छवि भरपूर रहती है और बड़ा विस्मय होता है कि अंग्रेजी के अध्यापक को भारतीय संस्कृति के विभिन्न आयामों का और प्राचीन भारतीय साहित्य का इतना गहरा मर्म क्या केवल निजी साधना के बल पर मिला।—विद्यानिवास मिश्रहिंदी की ललित निबंध परंपरा के निष्ठ प्रतिनिधि थे कुबेरनाथ राय। उन्होंने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के फक्कड़ अंदाज और खुलेपन के बदले अपनी निजी शास्त्री किस्म की रसज्ञता की राह चुनी थी। उन्होंने जो भी लिखा, वह गहरी आस्था और निष्ठा से लिखा। सांस्कृतिक समयबोध उनमें प्रभूत ज्ञान और अंततः प्रज्ञा से जुड़ा पुष्ट हुआ।—प्रभाकर श्रोत्रियकुबेरनाथ राय निबंध साहित्य, विशेषकर ललित निबंध के कीर्तिमान हैं। उन्होंने इस विधा की आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की परंपरा को अपनी गौरवशाली सृजन-शृंखला से प्रतिष्ठित किया है। इनके निबंधों में गंभीर पांडित्य, चिंतन, अन्वेषण और विश्लेषण के साथ भावावेश की अजस्र ऊर्जा लक्षित होती है। इनकी ऊँचाइयों को छानते हुए भी वे गाँव की जमीन से ��िरंतर जुड़े होते हैं, यह उनकी अन्यतम विशेषता है। ग्राम-संस्कृति के माध्यम से बृहत्तर भारतीय संस्कृति की खोज वाली विचार प्रवण दृष्टि कुबेरनाथ राय में है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। खेत-खलिहान की आत्मीयता, ग्राम-संस्कृति के सूक्ष्म रस-गंधों की पहचान, वर्तमान विकृति के भीतर से आदिम सांस्कृतिक स्रोतों का अन्वेषण और सबको वैदिक जीवन से जोड़ते हुए अप्रतिहत जीवन के प्रवाह रूप में उपस्थित करना लेखक की अद्भुत प्रतिभा का प्रमाण है।—विवेकी राय\u003c\/p\u003e","brand":"Prabhat Prakashan Pvt Ltd","offers":[{"title":"Hardbound","offer_id":44118520070381,"sku":null,"price":238.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/products\/1457759894.jpg?v=1685773689"},{"product_id":"alaukikam-ramayana","title":"Alaukikam Ramayana","description":"\u003cspan style=\"color: #0f1111; font-family: 'Amazon Ember', Arial, sans-serif;\"\u003e‘अलौकिकम् रामायण’ - प्रख्यात ललित निबन्धकार और मनीषी चिन्तक स्व. कुबेरनाथ राय की यह पुस्तक अलौकिकम् रामायण स्वयं श्री राय द्वारा संयोजित उनकी अन्तिम कृति है, अतः इसके प्रकाशन का एक ऐतिहासिक महत्त्व भी है। संयोगवश इस कृति का प्रकाशन ऐसे समय में हो रहा है जब राम विचार और विवाद दोनों के केन्द्र में हैं । इस दृष्टि से अलौकिकम् रामायण जैसे ग्रन्थ का महत्त्व और भी बढ़ जाता है । राम का आनन्दमय चेतना स्वरूप कुबेरनाथ राय को सदैव सम्मोहित करता रहा है । अपने अन्तिम दिनों में वे रामकथा के भावात्मक और बौद्धिक सौन्दर्य के अध्ययन और उद्घाटन में एकाग्र थे। उसी का प्रतिफल है अलौकिकम् रामायण । कुबेरनाथ जी ने इसमें राम और रामकथा को नये बौद्धिक सम्मोहन से मण्डित किया है—एक नयी लालित्यपूर्ण भंगिमा के साथ। उनका मानना है कि अनहदनाद के साधना-शिखर पर स्थित राम को पहचानने का अर्थ ही भारतीयता के सारे स्तरों के आदर्श रूप को, भारत के सहज चिन्मय रूप को पहचानना है । पुस्तक में रामकथा में निहित आर्ष भावना और विचारों का विस्तृत और गम्भीर विवेचन है। लेखश्री पब्लिकेशन की एक विशेष प्रस्तुति ।\u003c\/span\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Hardbound","offer_id":47205899010285,"sku":null,"price":1940.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/files\/HvJZaWgaYV.jpg?v=1728550656"},{"product_id":"priya-neelkanthi","title":"Priya Neelkanthi","description":"\u003cspan style=\"color: #0f1111; font-family: 'Amazon Ember', Arial, sans-serif;\"\u003eप्रिया नीलकण्ठी - ललित निबन्ध हिन्दी में कम ही लोगों ने लिखे हैं और ऐसे लेखक तो और भी कम हैं जिन्होंने सारी युगीन चेतना को आत्मसात् करके अभिव्यक्ति की इस एक ही विधा को समृद्ध किया है। कुबेरनाथ राय ऐसे ही विरल रचनाकार हैं, जिनका नाम ललित निबन्धों के साथ अब कुछ ऐसा जुड़ गया है कि दोनों संज्ञाएँ एक-दूसरे की पूरक-सी लगने लगी हैं। और, यही कारण है कि प्रस्तुत निबन्ध-संग्रह विशिष्ट हो गया है। भारतीय जनजीवन के परम्परागत पैटर्न में जो रूपान्तरण आज हो रहा है उसकी 'समग्र अनुभूति' प्राप्त करने की चेष्टा ही 'प्रिया नीलकण्ठी' के निबन्धों की सृजन-प्रेरणा है। इस रूपान्तरण में ग्राम संस्कृति के सूखते रस-बोध का स्थान यन्त्र युग की बौद्धिकता लेती जा रही है, जिसने आज के व्यक्ति को अभिशप्त और निर्वासित जीवन जीने के लिए विवश किया है। यह सत्य है कि औद्योगिक संस्कृति के विकास के साथ-साथ बौद्धिकता का दायरा बढ़ता जायेगा, किन्तु ग्रामीण जीवन की उल्लास-साधना इतनी हेय और उपेक्षणीय नहीं कि इसे सूखने दिया जाये। अतः आधुनिक यन्त्रबोध से उत्पन्न 'निर्वासन' के भाव को जीवन की स्वीकारात्मक स्थितियों तक ले जाने के लिए एक नया 'सम्पाती' चाहिए, जो अपने पंख जल जाने पर भी निराश न हो और सत्य को स्वर्ण-मंजूषा में बन्द कर लाने के लिए प्रतिबद्ध रहे। अवश्य ही सहज-विदग्ध शैली में लिखे गये इन निबन्धों को पढ़कर आपको परितोष मिलेगा।\u003c\/span\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":47240262942957,"sku":null,"price":145.0,"currency_code":"INR","in_stock":true},{"title":"Hardbound","offer_id":47240262975725,"sku":null,"price":387.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/files\/m92z0tZwjz.jpg?v=1729165321"},{"product_id":"dharm-nirpekshta-banam-rashtriya-sanskriti","title":"Dharm Nirpekshta Banam Rashtriya Sanskriti","description":"\u003cspan style=\"color: #0f1111; font-family: 'Amazon Ember', Arial, sans-serif;\"\u003eधर्मनिरपेक्षता बनाम राष्ट्रीय संस्कृति के अधिकतर निबन्ध समय, समाज साहित्य अर्थात् समग्र जीवन के वास्तविक सौन्दर्य के अन्वेषण में संलग्न हैं। श्री राय भारतीय दर्शन, संस्कृति, साहित्य के प्रति भरपूर सम्मान भाव रखते हैं। देशबोध और मैथिली शरण गुप्त शीर्षक निबन्ध में वे देशबोध अर्थात् भारतबोध की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। यह बोध दम, त्याग और अप्रमाद पर आधारित है और कतई संकीर्ण नहीं है। राजनीतिक मुद्दे हों, इतिहास के सवाल हों या साहित्य-विवेचन; इन सभी गम्भीर विषयों में श्री राय के बहु-पठित और गम्भीर विश्लेषक होने का प्रमाण मिलता है। भारत-बोध या देशप्रेम के आसपास विचरण करती उनकी चिन्तना अनेक पूर्वग्रहों का सतर्क उन्मूलन करती है। यह सत्य है कि धर्मनिरपेक्षता बनाम राष्ट्रीय संस्कृति के कई निबन्धों में वैचारिक गरिष्ठता अधिक है फिर भी मौलिक स्थापनाओं के चलते वे पठनीय बने रहते हैं। आज के संक्रमणशील यथार्थ और वैचारिक द्वन्द्व को समझने और वांछित सन्देश सम्प्रेषित करने में वे प्रासंगिक हैं। श्री राय के ये निबन्ध विस्मृति के आखेट बने रह जाते हैं। इन निबन्धों से असहमति की गुंजाइश कम नहीं है लेकिन श्री राय की अध्ययनशीलता, तर्कपूर्ण विश्लेषण, मौलिक वैचारिकता की उपेक्षा सम्भव नहीं है। श्री राय ने लोक साहित्य और संस्कृत वाङ्मय का बहुत सहारा न लेते हुए अपने ललित निबन्धों का जो विशेष मुहावरा गढ़ा था, वह इन रचनाओं में भी अपनी ऊर्जा और दीप्ति के साथ वर्तमान है। डॉ. वेदप्रकाश 'अमिताभ'\u003c\/span\u003e","brand":"Rajkamal","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":47240268742893,"sku":null,"price":286.0,"currency_code":"INR","in_stock":false},{"title":"Hardbound","offer_id":47240268775661,"sku":null,"price":715.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0355\/1415\/5141\/files\/7afrzm13FT.jpg?v=1729166022"}],"url":"https:\/\/rekhtabooks.com\/hi\/collections\/kuber-nath-rai-books.oembed","provider":"Rekhta Books","version":"1.0","type":"link"}